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बूढ़ा वर: बाबा नागार्जुन 'यात्री' की सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता | Full Poem & Analysis

क्या एक मासूम बेटी का सौदा चंद रुपयों में मुमकिन है?

कल्पना कीजिये एक ऐसी 'चंपा की कली' की, जिसे एक ऐसे सूखे काठ (बूढ़े) के हवाले कर दिया जाता है जिसके मुँह में दाँत तक नहीं हैं। यह कोई डरावनी कहानी नहीं, बल्कि वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (बाबा नागार्जुन) की कालजयी मैथिली कविता 'बूढ़ा वर' (Budhaa Var) की कड़वी सच्चाई है।

A symbolic illustration of a scale representing social satire in Baba Nagarjun's Budhaa Var.
Visual metaphor for the social themes of the poem.

2026 के इस आधुनिक युग में भी जब हम स्त्री सशक्तिकरण की बात करते हैं, मिथिलांचल की यह ऐतिहासिक रचना हमें याद दिलाती है कि 'अनमेल विवाह' की जड़ें कितनी गहरी थीं। आज साहित्यशाला मैथिली पर हम इस महाकाव्य का न केवल पाठ करेंगे, बल्कि इसके पीछे छिपे उस सामाजिक दर्द को भी समझेंगे जिसे बाबा नागार्जुन ने अपनी लेखनी से बेनकाब किया था।

बाबा नागार्जुन 'यात्री': जन-जन के कवि

मैथिली साहित्य के आकाश में 'यात्री' जी एक ऐसे ध्रुव तारे हैं, जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। जहाँ महाकवि विद्यापति ने प्रेम और भक्ति की गंगा बहाई, वहीं नागार्जुन ने समाज के कुरुप चेहरों पर व्यंग्य के बाण चलाए। यदि आप उनकी अन्य रचनाओं में रुचि रखते हैं, तो नागार्जुन की प्रसिद्ध मैथिली कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं।

📜 बूढ़ा वर - मूल मैथिली पाठ


घर रहिन्ह वरक कमला कात
करै छला खेती साँझ-परात
मरि गेलथीन्ह जखन तेसरो बहु
सौख भेलन्हि बिआहक फेर की कहु

देख'मे सुखैल-पखठैल काठ
रुपैया बान्हि बूढ़ ऐला सौराठ
माथ छलन्हि औन्हल छाँछ जकाँ
जीह गाँझक गोलही माछ जकाँ

दाँत ने रहन्हि, निदंत रहथि
बूड़ि रहथि, घोघा बसंत रहथि
खा रहल छला पान तइपर
कन्यागत दई छलथीन्ह जान तइपर

देखिकै बूढ़ वरक चटक-मटक
घुमैत-घुमैत पहुँचला घटक
पान गलोठिकें उठौलन्हि बात
पूछै लगलथीन्ह परिचय पात

हाथमे हुनक नोसिदानी रहन्हि
छाता रहन्हि, टूटल कमानी रहन्हि
उसरगल छलन्हि कि दनही छलन्हि
कुकुरक चिबौल पनही छलन्हि

साठा पाग रहन्हि चूनक छाँछी जकाँ
कनपट्टीक मसुबिर्ध माछी जकाँ
निमूह धनक जड़ि कटैत रहथि
पाँजि पाटिमे चेफड़ी सटैत रहथि

घटक कहलथीन्ह - "हजारेक टका लागत,
विधि-व्यवहार सै सँ ऊपर लागत
बेसी नही, गोड़ पचासेक देब हमरो
विधाताक संग आशीर्वाद लेब हमरो
सै मे एक अछि 'कान्या', भोग होऔ
सोनमे सुगंधिक संयोग होऔ ।"

हम अजग्गि, बाप उताहुल रहथि
व्यौला रहथि, बेचै लै आकुल रहथि
शेष शुद्ध दिन नौ सौ मे पटलन्हि जा क
हमर गर्दनि बाबू कटलन्हि जा क

घटक पँजियाड़ दूनू बजला मिथ्या
सिद्धान्त भेलन्हि तखन उठला विख्या
सड़लि घोड़ीक एकटा एक्का कैलन्हि
सोझै फल्लाँ गामक सड़क धैलन्हि
मुन्हारि साँझकैं पहुँचैत गेला गाम
पकैत रहइ गाछीमे भरखरि आम

पसरल सबतरि बूढ़ बरक बात
आहि रे कनिया, आहि रे अहिबात
ठाढ़ होथि त लागथि धनुष जकाँ
कथी लै बूझि पड़ता मनुष जकाँ

दाढ़ी बनाओल, कपचल मोछ रहन्हि
नाक जेना टिटहिक चोंच रहन्हि
चिक्कन माथ लगन्हि काछुक पीठ जकाँ
बूझि पड़थीन्ह असर्ध जकाँ, ढीठ जकाँ

तामसें भ गेलई घोर ओकर मन
नाक पर पसेंना, कपार पर घाम
ठकुआ गेली बेचारी ठामक ठाम

दौड़लि गेलि, बाबू कें लगलि कह'-
विषादें नोर भ' क लागलि बह'-
"ई की कैल उठाक ल आनल
कमलक कोढ़ी लै ढेंग कोकनल

बेटिकें बेचलउँ मड़ुआक दोबर
बूढ़ बकलेलसँ भरलऊँ कोबर
जनमितहिँ मारि दितिअई नोन चटा क'
कुहरए न पड़ितै घेंट कटा क' ।"

पीअर झोरी दिस आँगुर उठा क'
बाबू कहलथीन्ह रुपैया देखाक-
"दूर जाउ, शुभक बेर कनै छी की
दिन घुरलई छौंड़ीक, जनई छी की
बनति सै बीघा खेतक मलिकाइनि
हमरा बेटी सन के हएत धनिकाइनि
बहुत भेल, रहए दिअ, जुनि किछु कहू
जाउ, 'अथ-उत मे' पड़लि ने रहू
जाउ, कन्यादानक ओरिऔन करू ग
पड़िछन करू ग, चुमौन करू ग
दुसई लै, लजबंई लै, डरबई लै
बजै अछि लोक तँ की करबई लै ।"

अहुरिया कटलक, मललक हाथ
बाबू आगाँ माई झुकौलक माथ
हुनक अनटोटल बात एक दिस
झरकल सन हमर अहिबात एक दिस
करब की, सब पी गेलऊँ घोंटि क'
चम्पाक कली फेकल गेलऊँ खोंटि क'
बिआह-चतुर्थी सब भलई सम्पन्न

ओ ससुर धन्न ई जमाय धन्न
हम लोहछलि, ओ रहथि आतुर
(खिसियैल बिलाड़ि नोंचे धुरखुर)
कोहबरसँ माइ लग देह नड़ा के'

बूढा नाचै लगला हर्षे
दुरागमन भ' गेलन्हि सोझे वर्षे
मनुष रहिअन्हि अपन, ल' अनलन्हि
ताला-कुंजी सबकथु द' देलन्हि

देखिक' हमरा परभच्छय उठा अछि
कहिओ जँ नहिराक लोक अबइए
गराँमे पड़ल सोनक सूति
चलै लागल घरमे सब पर जुइत

बूझि पड़ि निचिंत, अछि खगते कथिक
साँई करैत छथि डरै सिक सिक
मुदा हृदय अछि हाहाकार करैत
कोढ़ अछि ध ध ध ध जरैत

छुच्छ कोर, आँखिमे अछि नोर भरल
ने देखल ककरो एहेन कर्म जरल
मनमे उठैत रहइए स्वाइत-
" जो रे राक्षस, जो रे पुरुषक जाति !

तोरे मारलि हम सभ मरि रहलि छी
किकिया रहलि छी, कुहरि रहलि छी
मोल लई छैं हमरा तों टका द' क'
कनबइ छैं बाप भ' क', काका भ' क'

जाइ अछि पानी जकाँ दिन हमर
जीवन भेल केहेन कठिन हमर
ककरा की कहबइ, सुनत के आई
फाट' हे धरती, समा हम जाइ !"

🧐 कविता का विश्लेषण: 2026 के संदर्भ में

'बूढ़ा वर' कविता केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि मिथिला की सामाजिक संरचना का एक 'एक्स-रे' है। यात्री जी ने इसमें उन शब्दों का प्रयोग किया है जो ग्रामीण जीवन की खुशबू और बदबू दोनों को समेटे हुए हैं।

प्रमुख विषय व्याख्या
आर्थिक त्रासदी बेटी को 'मड़ुआ के दोबर' पर बेचना। अधिक जानकारी के लिए Sahityashala Finance देखें।
सत्य का विद्रोह बेटी का 'पुरुष जाति' को राक्षस कहना पितृसत्ता पर सीधा प्रहार है।

यह कविता हमें गोठ बिचनी और नवतुरिये आबो अंगा जैसी लोक-जीवन की अन्य कविताओं की याद दिलाती है।

निष्कर्ष: क्यों यह कविता 'एवरग्रीन' है?

बाबा नागार्जुन की 'बूढ़ा वर' हमें सिखाती है कि साहित्य क्रांति का उपकरण है। वैश्विक दृष्टिकोण के लिए हमारे English Blog को भी पढ़ें।

A young Maithili bride crying, illustrating the tragedy in Budhaa Var.
Visual depiction of the emotional weight carried in the poem.

क्या आपको लगता है कि आधुनिक समाज में ऐसे विवाह आज भी मौजूद हैं? कमेंट में साझा करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'बूढ़ा वर' कविता का मुख्य संदेश क्या है?

यह कविता अनमेल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ एक सशक्त आवाज है।

2. यात्री जी ने इस कविता में 'सौराठ' का जिक्र क्यों किया है?

सौराठ मधुबनी का वह स्थान है जहाँ ऐतिहासिक रूप से विवाह तय किए जाते थे।

संदर्भ: Wikipedia (Nagarjun) | Kavita Kosh

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