Home » Maithili & Bhojpuri Literature » बेटी बेचवा (Beti Vilap) – Bhikhari Thakur रोपेया गिनाई लिहलऽ हो बाबूजी: भिखारी ठाकुर के 'बेटी बेचवा' (बेटी विलाप) का वो रुला देने वाला सच जो आपकी रूह कंपा देगा ❓ क्या एक पिता चंद चाँदी के सिक्कों के लिए अपनी ही मासूम बेटी की जवानी का सौदा कर सकता है? जब एक बेटी मंडप में बैठकर अपने पिता से पूछती है— "नेटी काटि के बेटी भसिअवलऽ हो बाबूजी (बाबूजी, आपने मेरा गला रेत कर मुझे नदी में क्यों बहा दिया?)" —तो पत्थर दिल इंसान भी फूट-फूट कर रो पड़ता है। यही कारण है कि जब झारखंड के धनबाद में इस नाटक का मंचन हुआ, तो दर्शक रोते हुए पास के मंदिर में गए और कसम खाई कि वे अब कभी अपनी बेटियों को नहीं बेचेंगे! "गिरिजा-कुमार!, करऽ दुखवा हमार पार; ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी" — यह अमर पंक्ति है भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले लोककवि भिखारी ठाकुर (18 दिसंबर 1887 – 10 जुलाई 1971) की सबसे क्रांतिकारी रचना 'ब...
क्या हो यदि कोई भाषा केवल राजदरबारों या अभिजात्य वर्ग के दलानों तक सीमित रह जाए और अपने ही आँगन में पराई हो जाए? जब किसी समाज की संतानें अपनी माँ की लोरी, दादी के किस्से और मिट्टी की गंध को छोड़कर पराई भाषाओं की बैसाखी पकड़ लेती हैं, तब केवल एक बोली नहीं मरती—बल्कि सदियों की संचित सांस्कृतिक चेतना का लोप हो जाता है। मिथिला की धरती ने महाकवि विद्यापति से लेकर यात्री (बाबा नागार्जुन) तक ऐसी काव्य-परंपरा रची है, जिसने हर युग में जनमानस के सुख-दुख को स्वर दिया है। प्रस्तुत सदाबहार महा-संकलन में हम मातृभाषा मैथिली, मिथिला की लोक-संस्कृति और अस्मिता पर रचित 28 सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविताएं और ग़ज़लें (मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ और गहन हिंदी भावार्थ सहित) प्रस्तुत कर रहे हैं, जो प्रत्येक मैथिल और साहित्य-प्रेमी के हृदय को झकझोर कर रख देंगी।