अलौकिक विवाह: एक गीत के माध्यम से मिथिला की आत्मा का दर्शन क्या आपने कभी कोई ऐसी धुन सुनी है जो महज़ एक गीत न होकर एक समय-यान (Time Machine) की तरह महसूस होती हो? मिथिला के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आँगनों में, पारंपरिक विवाह गीत ठीक यही जादुई प्रभाव रखते हैं। मैथिली लोक संगीत के विशाल सागर में, "जेहने किशोरी मोरी तेहने किशोर हे" काव्यात्मक भक्ति और वैवाहिक उत्सव के सर्वोच्च शिखर के रूप में स्थापित है। यह केवल एक गीत नहीं है; यह एक भावनात्मक धरोहर है जो मैथिल महिलाओं की पीढ़ियों द्वारा सहेजी गई है। यह अद्भुत रचना माता सीता (किशोरी) और प्रभु श्री राम (किशोर) के अलौकिक मिलन का एक अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। हमारी साहित्यशाला (Sahityashala) की जड़ों से जुड़ा यह गीत हर मैथिली विवाह की धड़कन है, जिसे शारदा सिन्हा, स्नेह लता और मैथिली ठाकुर जैसी गायिकाओं ने अमर कर दिया है। आइए इस कालजयी रचना के बोल और इसके गहरे साहित्यिक भावार्थ में गोता लगाएँ। विषय सूची (Table of Contents) ✤ ज...
चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि: एक माता की पीड़ा, वात्सल्य और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का अमर गीत कल्पना कीजिए उस ऐतिहासिक क्षण की, जब एक अत्यंत कोमल और चन्द्रमा के समान शीतल कन्या (गौरी) के द्वार पर भस्म रमे, जटाधारी, गले में सर्प और बाघम्बर पहने हुए भगवान शिव वर के रूप में पधारते हैं। एक माता के हृदय पर उस क्षण क्या बीतती होगी? अपनी फूल सी बच्ची के लिए एक ऐसा "बेमेल" और डरावना वर देखकर किस माँ का कलेजा नहीं फट पड़ेगा? यह कोई साधारण लोककथा नहीं है। भगवान शिव ने यह भयंकर रूप जानबूझकर धरा था, ताकि राजपरिवार के लौकिक अहंकार को तोड़ा जा सके और उनके समर्पण की असली परीक्षा ली जा सके। इसी गहरे वात्सल्य, सदमे, और ईश्वरीय लीला के अद्भुत मनोवैज्ञानिक संगम को महाकवि विद्यापति ने अपनी कालजयी रचना "चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि" (Chandramukhi San Gauri Hamar Chhaith) में पिरोया है। मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में इसे एक पवित्र 'महेशवाणी' (Maheshwani) के रूप मे...