आन्हर जिनगी – बाबा नागार्जुन 'यात्री' की प्रसिद्ध मैथिली कविता क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन की सबसे बड़ी पहेली दिशाहीनता क्यों है? जनकवि बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री') की यह कालजयी रचना उसी अंधकार से प्रकाश तक का अचूक दार्शनिक मार्ग है। मूल मैथिली कविता आन्हर जिनगी सेहंताक ठेंगासँ थाहए बाट घाट, आँतर-पाँतरकें खुट खुट खुट खुट.... आन्हर जिनगी चकुआएल अछि ठाढ़ भेल अछि युगसन्धिक अइ चउबट्टी लग सुनय विवेकक कान पाथिकें अदगोइ-बदगोइ आन्हर जिनगी नांगड़ि आशाकेर कान्ह पर हाथ राखि का’ कोम्हर जाए छएँ ? ओ गबइत छउ बटगवनी, तों गुम्म किएक छएँ ? त’हूँ ध’ ले कोनो भनिता ! आन्हर जिनगी शान्ति सुन्दरी केर नरम आंगुरक स्पर्शसँ बिहुँसि रहल अछि! खंड सफलता केर सलच्छा सिहकी ओकर गत्र-गत...
अतत्तह भऽ गेल… (Atattah Bha Gel) - विवेकानन्द ठाकुर की मार्मिक मैथिली कविता और उसका गहरा अर्थ क्या अपनी मातृभाषा पर गर्व करना और उसके लिए आवाज़ उठाना भयंकर अपराध है? जब आपकी अपनी मीठी बोली दूसरों के कानों में एक खटकती हुई अनजानी आवाज़ लगने लगे, तो वह पीड़ा शब्दों में कैसे बहती है? मैथिली साहित्य केवल शृंगार और प्रेम तक सीमित नहीं है, यह अपने वजूद और भाषाई अस्मिता की एक सुलगती हुई आग भी है। प्रतिष्ठित कवि विवेकानन्द ठाकुर जी द्वारा रचित कविता "अतत्तह भऽ गेल…" (Atattah Bha Gel) एक ऐसी ही साहित्यिक हुंकार है। यह उन लोगों पर एक तीखा प्रहार है जो एक समृद्ध भाषा को दरकिनार कर, उसे बोलने वालों को "गूँगा" या बेवकूफ़ (बौक) समझते हैं। जैसे प्रेमक नाजुक बंधन को समझना हर किसी के बस की बात नहीं होती, वैसे ही मातृभाषा की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने अपनी माटी से सच्चा प्रेम किया हो। आइए, 2011 में प्रकाशित पुस्तक 'चानन घन गछिया' से ली गई इस अद्भुत रचना को पढ़ें। मातृभाषा के...