मैथिली साहित्य के आधुनिक काल के स्तम्भ वैद्यनाथ मिश्रा 'यात्री' (जिन्हें हिंदी जगत नागार्जुन के नाम से जानता है) की लेखनी सदैव शोषितों और श्रमिकों की आवाज़ रही है। उनकी कविताएँ केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण हैं। आज हम उनकी एक अद्भुत कविता "पसेनाक गुण-धर्म" (Pasenak Gun-Dharm) का पाठ करेंगे। जहाँ विज्ञान पसीने को केवल रासायनिक तत्वों का मिश्रण मानता है, वहीं 'यात्री' जी एक रिक्शा चालक (Rickshaw Puller) और किसान के पसीने में जीवन के संघर्ष और ऊर्जा को देखते हैं। यह कविता नागार्जुन की मैथिली कविताओं के संग्रह में एक विशेष स्थान रखती है। श्रम और पसीने का मोल: यात्री जी की नज़र से। पसेनाक गुण-धर्म कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" क्षार-अम्ल विगलनकारी, दाहक रेचक, उर्वरक... रिक्शाबलाक पीठ दिशुका फाटल तार-तार बनियाइन ...