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जुनि करू राम विरोग: विद्यापति गीत | भावार्थ और हिंदी अनुवाद (Lyrics & Meaning)

कल्पना कीजिए एक ऐसी रात की, जहाँ नींद में देखा गया एक सपना किसी विशाल साम्राज्य के पतन की भविष्यवाणी बन जाए। मैथिली साहित्य के अनमोल खजाने में, महाकवि विद्यापति का गीत "जुनि करू राम विरोग" एक ऐसी ही कालजयी रचना है। आमतौर पर हम महाकवि विद्यापति को उनके श्रृंगार रस या भगवान शिव की नचारी के लिए जानते हैं। लेकिन, यह गीत हमें 'रामायण' के उस प्रसंग में ले जाता है जहाँ लंका की रानी मंदोदरी (या संभवतः त्रिजटा) एक भयावह स्वप्न देखती हैं। यह स्वप्न लंका के विनाश और प्रभु श्रीराम की विजय का संकेत है। A cinematic depiction of the "Kanchan Gadh" (Golden Fortress) ablaze. सदियों से गाया जाने वाला यह गीत आज भी प्रासंगिक है। साहित्याशाला (Sahityashala) के इस ब्लॉग में, हम इस गीत के मूल बोल, इसका विस्तृत हिंदी भावार्थ और इसके साहित्यिक महत्व का विश्लेषण कर रहे हैं। गीत: एक नज़र में रचनाकार: महाकवि विद्यापति (को...