प्रस्तावना: क्या आपने कभी ऐसे कवि को पढ़ा है जो संसद को "घूरे" पर फेंकने की बात करता हो, और अगले ही पल मेघदूत की कोमलता को याद करता हो? हिन्दी और मैथिली साहित्य के उस वटवृक्ष का नाम है— बाबा नागार्जुन । यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध नागार्जुन (यात्री) के संपूर्ण क्रांतिकारी जीवन, उनकी भीषण गरीबी, जेल यात्राओं और साहित्य का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है। बाबा नागार्जुन (यात्री): मिथिला की विद्रोही आवाज़ हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ ही रचनाकार ऐसे हैं, जिन्हें किसी एक खांचे में बंद करना असंभव है। बाबा नागार्जुन उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे केवल कवि नहीं थे, न ही मात्र उपन्यासकार, विचारक या राजनीतिक लेखक। वे चलता-फिरता विरोध थे—ऐसा विरोध जो जीवन से उपजा था, किताबों से नहीं। संन्यासी होकर भी गहरे भौतिक, मार्क्सवादी होकर भी लोकचेतना से जुड़े, संस्कृत के विद्वान होकर भी कच्ची-पक्की देहाती भाषा के उस्ताद—नागार्जुन विरोधाभासों का ऐसा संगम थे जो टकराता नहीं, बल्कि रचनात्मक ऊर्जा पैदा करता है। नागार्जुन को पढ़ना यानी भारत...