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सुजन नयन मनि: यात्री (नागार्जुन) की मैथिली कविता | भावार्थ और विश्लेषण

क्या प्रेम में डूबा हुआ ह्रदय शब्दों की मार सह सकता है? वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" , जिन्हें हिंदी साहित्य जगत "बाबा नागार्जुन" के नाम से जानता है, अपनी विद्रोही कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन, जब वही विद्रोही 'यात्री' बनकर मैथिली में कलम उठाते हैं, तो शब्द फूल बनकर बरसते हैं। वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आज हम उनकी कालजयी रचना "सुजन नयन मनि" का पाठ और विश्लेषण करेंगे। जहाँ बादल को घिरते देखा है में वे प्रकृति के चितेरे हैं, वहीं इस कविता में वे महाकवि विद्यापति की शृंगार परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नज़र आते हैं। आइये, 2025 के परिप्रेक्ष्य में इस कविता के मर्म को समझते हैं। सुजन नयन मनि (मूल कविता) सुजन नयन मनि सुनु सुनु सुनु धनि मथित करिअ जनि पिअ हिअ गनि गनि शित शर हनि हनि, सुनु सुनु सुनु धनि मनमथ रथ बनि विपद हरिअ तनि ...