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नब नचारी (Nab Nachari) - बाबा नागार्जुन "यात्री" | Maithili Poem

नब नचारी कविता – बाबा नागार्जुन "यात्री" की प्रसिद्ध मैथिली रचना मैथिली साहित्य के जनकवि वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" की प्रखर व्यंग्य कविता यहाँ प्रस्तुत है मैथिली साहित्य के महान जनकवि बाबा नागार्जुन "यात्री" जी की कालजयी और सामाजिक व्यंग्य से भरी कविता 'नब नचारी' (Nab Nachari) । यह कविता सीधे तौर पर बाबा बैद्यनाथ (भगवान शिव) को संबोधित करते हुए रची गई है, जो समाज में व्याप्त घोर गरीबी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था की विफलता पर एक तीक्ष्ण प्रहार करती है। 'यात्री' जी की यह प्रसिद्ध मैथिली कविता (Maithili Poem) अपने बेबाक और विद्रोही अंदाज़ के लिए जानी जाती है। अगड़ाही लागउ, वज्र खसउ, बरू किच्छु होउक... नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ ! पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ ! बेत्रेक अन्न भ’ रहल आँट नेना-भुटका दुबरैल आंगुरें कल्लर सभ ...

आन्हर जिनगी: बाबा नागार्जुन 'यात्री' की मैथिलि कविता | Aanhar Jinagi Poem

🔥 बाबा नागार्जुन: जनकवि 'यात्री' का क्रांतिकारी सफर उनकी संपूर्ण जीवनी, जेल यात्रा और विद्रोही कविताएं यहाँ पढ़ें ➜ आन्हर जिनगी – बाबा नागार्जुन (यात्री) की मैथिलि कविता बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) के प्रसिद्ध मैथिली कविता "आन्हर जिनगी" — जीवनक दार्शनिक चित्रण। आन्हर जिनगी सेहंताक ठेंगासँ थाहए बाट घाट, आँतर-पाँतरकें खुट खुट खुट खुट.... आन्हर जिनगी चकुआएल अछि ठाढ़ भेल अछि युगसन्धिक अइ चउबट्टी लग सुनय विवेकक कान पाथिकें अदगोइ-बदगोइ आन्हर जिनगी — बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र “यात्री”) आन्हर जिनगी नांगड़ि आशाकेर कान्ह पर हाथ राखि का’ कोम्हर जाए छएँ ? ओ गबइत छउ बटगवनी, तों गुम्म किएक छएँ ? त’हूँ ध’ ले कोनो भनिता ! आन्हर जिनगी ...

प्रेरणा: बाबा नागार्जुन 'यात्री' की प्रसिद्ध मैथिलि कविता | Prerna Maithili Poem by Nagarjun

🔥 New Release: "संयुक्ताक्षर" (Sanyuktakshar) - Read the viral poem defining Love through Grammar प्रेरणा: बाबा नागार्जुन 'यात्री' की प्रसिद्ध मैथिलि कविता | Prerna Maithili Poem by Nagarjun जगमे सभसौं पछुआयल छी, मैथिल गण! आबहु आगु बढू; निज अवनति-खाधिक बाधक भै मिलि उन्नति-शिखरक उपर चढू। अछि हाँइ-हाँइ कै लागि पड़ल सभ अपना-अपना उन्नतिमे, उत्थानक एहि सुभग क्षणमे घर बैसि अहीं ने बात गढू। ‘राणा प्रताप, शिवराज, तिलक’ हिनका लोकनिक जीवन-कृति सैं, तजि आलसकेँ प्रिय बन्धु वृन्द! किछु सेवाभावक पाठ पढू। भाषा, भूषा ओ भेष अपन हो जगजियार झट जगभरिमे, ई अटल प्रतिज्ञा ऐखन कै पुनि मातृभूमि पर सोन मढू। - यात्री कविक बारे मे: बाबा नागार्जुन "यात्री" बाबा नागार्जुन, जिनका असल नाम वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" छल, मैथिलि आ हिन्दी साहित्यक एकटा प्रमुख स्तंभ छथि। हुनका ' जनकवि ' (जनताक कवि) केर रूप मे जानल जाइत अछि। 'यात्री' हुनकर मैथिलि उपनाम छल। हुनकर कविता मे सामाजिक चेतना, शोष...