कविक स्वप्न (Kavik Swapn) वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" (बाबा नागार्जुन) की कालजयी मैथिली कविता परिचय: 'कविक स्वप्न' बाबा नागार्जुन (मैथिली में 'यात्री') की एक अत्यंत प्रभावशाली कविता है। यह कविता केवल कल्पना की उड़ान नहीं है, बल्कि यह कवि की अंतरात्मा का वह द्वंद्व है जहाँ वह अपनी 'रोमानियत' को छोड़कर 'यथार्थ' (Social Realism) की कठोर धरती पर उतरता है। जिस तरह हिंदी साहित्य में हम रश्मिरथी के पात्रों में संघर्ष देखते हैं, वैसी ही वैचारिक क्रांति यात्री जी की इस कविता में है। जननि हे! सूतल छलहुँ हम रातिमे नीन छल आयल कतेक प्रयाससँ। स्वप्न देखल जे अहाँ उतरैत छी, एकसरि नहुँ-नहुँ विमल आकाशसँ। फेर देखल-जे कने चिन्तित जकाँ कविक एहि कुटीरमे बैसलि रही। वस्त्र छल तीतल, चभच्चामे मने कमल तोड़ै लै अहाँ पैसलि रही। श्वेत कमलक हरित कान्ति मृणालसँ बान्हि देलहुँ हमर दूनू हाथकेँ। हम संशकित आँखि धरि मुनने छलहुँ, स्नेहसँ सूँघल अहाँ ता’ ...