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आन्हर जिनगी: बाबा नागार्जुन 'यात्री' | मूल कविता, भावार्थ व विश्लेषण

आन्हर जिनगी – बाबा नागार्जुन 'यात्री' की प्रसिद्ध मैथिली कविता क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन की सबसे बड़ी पहेली दिशाहीनता क्यों है? जनकवि बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री') की यह कालजयी रचना उसी अंधकार से प्रकाश तक का अचूक दार्शनिक मार्ग है। मूल मैथिली कविता आन्हर जिनगी सेहंताक ठेंगासँ थाहए बाट घाट, आँतर-पाँतरकें खुट खुट खुट खुट.... आन्हर जिनगी चकुआएल अछि ठाढ़ भेल अछि युगसन्धिक अइ चउबट्टी लग सुनय विवेकक कान पाथिकें अदगोइ-बदगोइ आन्हर जिनगी नांगड़ि आशाकेर कान्ह पर हाथ राखि का’ कोम्हर जाए छएँ ? ओ गबइत छउ बटगवनी, तों गुम्म किएक छएँ ? त’हूँ ध’ ले कोनो भनिता ! आन्हर जिनगी शान्ति सुन्दरी केर नरम आंगुरक स्पर्शसँ बिहुँसि रहल अछि! खंड सफलता केर सलच्छा सिहकी ओकर गत्र-गत...