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मातृ गीत (Matri Geet): कालीकान्त झा ‘बूच’ रचित मैथिली कविताक सम्पूर्ण अर्थ आ विश्लेषण

'मातृ गीत' - माए केर अलौकिक महिमा पर कालीकान्त झा ‘बूच’ जीक एकटा अमर मैथिली रचना की माए केर मुसकान सचमुच ब्रह्माण्डक रूप बदलि सकैत अछि? जखन जीवन मे चारू दिस अन्हार जनि (Aanhar Janni) छितरा जाइत अछि, तखन माए केर एकटा छोट सन मुसकान कोना सभटा कष्ट केँ दूर कऽ दैत अछि? मैथिली साहित्यक विशाल सागर मे ‘मातृ गीत’ एकटा एहन अमूल्य मोती अछि जे माए केर ममता केँ साक्षात् ब्रह्माण्डक शक्तिक रूप मे स्थापित करैत अछि। विख्यात कवि कालीकान्त झा ‘बूच’ जीक ई कविता मात्र किछु शब्दक जोड़ नहि अछि, ई एकटा गहन मनोवैज्ञानिक आ आध्यात्मिक यात्रा अछि । जहिना कोनो छोट सन बच्चाक खुशी लेल हमसभ 'कनी हँसि केँ कहु' जकाँ मधुर गीत गबैत छी, तहिना ई कविता माए केर दयादृष्टि सँ भेल भगवान शिवक रूप परिवर्तन (भिखमंगा सँ महेश धरि) केँ अद्भुत रूपें दर्शाबैत अछि। आउ, ई कालजयी रचनाक गहिराई मे प्रवेश करी। मातृ गीत - सम्पूर्ण मैथिली कविता (मूल पाठ) तोरे मुँस्की मे अभिनव आनंदक अनुपम देश गय! तोरे दयादृष्टि मे नव नव सौन्दर...