क्या हो यदि कोई भाषा केवल राजदरबारों या अभिजात्य वर्ग के दलानों तक सीमित रह जाए और अपने ही आँगन में पराई हो जाए? जब किसी समाज की संतानें अपनी माँ की लोरी, दादी के किस्से और मिट्टी की गंध को छोड़कर पराई भाषाओं की बैसाखी पकड़ लेती हैं, तब केवल एक बोली नहीं मरती—बल्कि सदियों की संचित सांस्कृतिक चेतना का लोप हो जाता है।
मिथिला की धरती ने महाकवि विद्यापति से लेकर यात्री (बाबा नागार्जुन) तक ऐसी काव्य-परंपरा रची है, जिसने हर युग में जनमानस के सुख-दुख को स्वर दिया है। प्रस्तुत सदाबहार महा-संकलन में हम मातृभाषा मैथिली, मिथिला की लोक-संस्कृति और अस्मिता पर रचित 28 सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविताएं और ग़ज़लें (मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ और गहन हिंदी भावार्थ सहित) प्रस्तुत कर रहे हैं, जो प्रत्येक मैथिल और साहित्य-प्रेमी के हृदय को झकझोर कर रख देंगी।
त्वरित सारांश (TL;DR — इस महा-संकलन की मुख्य विशेषताएँ)
- संपूर्ण 28 कालजयी रचनाएँ: भारत और नेपाल के 28 प्रतिष्ठित मैथिली कवियों, गीतकारों और ग़ज़लकारों की प्रतिनिधि रचनाओं का प्रामाणिक मूल पाठ।
- कठिन शब्दार्थ एवं हिंदी भावार्थ: प्रत्येक मैथिली कविता के नीचे ठेठ मैथिली शब्दों के हिंदी अर्थ और कविता की गहन साहित्यिक व सामाजिक समीक्षा।
- चार केंद्रीय वैचारिक स्तंभ: (1) भाषा का जाति-मुक्त लोकतंत्रीकरण, (2) मातृभाषा के प्रति संवेदना व प्रतिरोध, (3) मिथिला की ग्राम्य स्मृति व लोक-संस्कृति, तथा (4) आधुनिकता बनाम सांस्कृतिक जड़ें।
- शोध एवं अकादमिक संदर्भ: भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा के समकालीन आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित।
28 सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता और ग़ज़ल: विषयगत मास्टर अनुक्रमणिका
मैथिली काव्य-धारा की इस विशाल विरासत को समझने के लिए हमने सभी 28 कवियों और उनकी रचनाओं को उनके साहित्यिक शिल्प और केंद्रीय विचार के साथ नीचे तालिकाबद्ध किया है। (यह तालिका विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पाठकों के त्वरित संदर्भ के लिए बनाई गई है।)
| क्र. | कविता / ग़ज़ल का शीर्षक | कवि / रचनाकार | विधा | केंद्रीय भाव एवं विषयवस्तु |
|---|---|---|---|---|
| 1 | मैथिलीकेँ नइँ बान्हियौ | मनोरञ्जन झा | मुक्तक छंद कविता | जाति-वर्ग से ऊपर उठकर भाषा का लोकतंत्रीकरण |
| 2 | सोनितमे कलम | राजेन्द्र विमल | मैथिली ग़ज़ल | मातृभाषा के सम्मान के लिए क्रांतिकारी संकल्प |
| 3 | जिन्दाबाद रहे | मो. अशरफ राईन | मैथिली ग़ज़ल | सामाजिक पिछड़ेपन से ऊपर मातृभाषा के प्रति समर्पण |
| 4 | ई सभक मैथिली | देवेन्द्र मिश्र | लयबद्ध कविता | सर्वसमावेशी समाज और बोली की विविधता में एकता |
| 5 | प्रेमक सीमा | धीरेन्द्र प्रेमर्षि | प्रतीकात्मक कविता | कबूतर (पड़बा) और बाज के रूपक से भाषाई स्वाभिमान |
| 6 | कोना बिसरि सकबै? | गजेन्द्र गजुर | भावप्रधान कविता | बचपन की स्मृतियाँ और पराई भाषाओं की मानसिक दासता पर प्रहार |
| 7 | तोहर बोल | विद्यानन्द वेदर्दी | आह्वान गीत | मातृभूमि और मातृभाषा की रक्षा के लिए बलिदान का जज्बा |
| 8 | माए, मैथिली आ हम | अमरेन्द्र यादव | आत्मालोचनात्मक कविता | भाषा की उपेक्षा करने वाली पीढ़ी का तीखा आत्म-मंथन |
| 9 | हे गिद्धराज लोकनि | किसलय कृष्ण | व्यंग्य-प्रतिरोध कविता | सोशल मीडिया के छद्म बुद्धिजीवियों पर प्रहार और संघर्ष |
| 10 | मातृभाषा दिवस | अमरनाथ झा | छंदबद्ध कविता | घर-परिवार के दैनिक व्यवहार में मैथिली बोलने का संदेश |
| 11 | मातृभाषा मैथिली | अयोध्यानाथ चौधरी | सांस्कृतिक गौरव गीत | विद्यापति, मंडन-भारती और लोकगीतों में जीवंत मैथिली |
| 12 | चलू जगाब' | अर्जुन प्रसाद गुप्ता 'दर्दिला' | जागरण गीत | सुप्त समाज को जगाकर मिथिला के पुनर्निर्माण का आह्वान |
| 13 | पावन मिथिला धाम | कालिकान्त झा 'तृषित' | भक्ति व महिमा गीत | जनकपुर, बिस्फी, पान-मखान और ज्ञान-परंपरा का वंदन |
| 14 | भाषा आ भेष | काशिकान्त झा | लोक-संघर्ष गीत | सीता, विद्यापति और सलहेस की विरासत के लिए संघर्ष |
| 15 | मिथिला वर्णन | ज्योती शर्मा | लोक-संस्कृति कविता | मिथिला की नदियाँ, लोक-देवता और पारंपरिक व्यंजन |
| 16 | वाह रे वालपन | जीतेन्द्र जितू | संस्मरण कविता | गाँव की गलियों, खेलों और उन्मुक्त बचपन की मधुर यादें |
| 17 | मातृभाषा | मैथिल प्रशान्त | दार्शनिक कविता | मौलिक संवेदना बनाम अनुवाद और वैश्विक सामंतवाद का संकट |
| 18 | अपन भाषामे पढ़ि नै सकलौँ | नारायण मधुशाला | शिक्षा-विमर्श कविता | मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा न मिलने की त्रासदी |
| 19 | रञ्जु | रमेश रञ्जन | श्रद्धांजलि कविता | मिथिला आंदोलन की शहीद रंगकर्मी रञ्जु झा को नमन |
| 20 | माएसँ प्रेम | रामनरेश शर्मा | व्यंग्य-चेतावनी कविता | माँ से प्रेम किंतु मातृभाषा से द्रोह के विरोधाभास पर कटाक्ष |
| 21 | मैथिली | पूनम झा मैथिली | गीतात्मक कविता | प्रकृति, अध्यात्म और लोक-जीवन में रची-बसी मैथिली |
| 22 | कदमक गाछ आ दादी | रुपा धीरु | प्रतीकात्मक कथा-काव्य | दादी और कदंब वृक्ष के रूपक से घुसपैठियों पर प्रहार |
| 23 | अस्मिताक रक्षा | विजय दत्त मणी | ग़ज़ल / दोहा शैली | आत्मघाती फूट और लोभ से अस्मिता के क्षरण पर चिंता |
| 24 | भाषाक विखण्डनमे तैनात सिपाही ! | विजेता चौधरी | ओजपूर्ण कविता | भाषाई राजनीति और मिथिला को बाँटने वाली शक्तियों को ललकार |
| 25 | मैथिल वीर सेनानी! | विन्देश्वर ठाकुर | शौर्य गीत | मातृभूमि और मैथिली ध्वज की रक्षा हेतु वीरता का उद्घोष |
| 26 | गाम, गामकेँ एहिना जोगबैए | विभूती आनन्द | यथार्थवादी लंबी कविता | वैश्वीकरण, बाजारवाद और पलायन से बदलते मैथिल गाँव का चित्रण |
| 27 | मिथिला देश निवासी हम | शेख शब्बीर अहमद 'जख्मी' | लोक-गीत | हिमालय से गंगा तक फैले मिथिला का सांप्रदायिक सौहार्द |
| 28 | गजल (माए'क बोलीके गुनगान) | हृदय नारायण यादव | मैथिली ग़ज़ल | विश्व पटल पर मातृभाषा मैथिली को सर्वोच्च सम्मान दिलाने का संकल्प |
खंड 1: भाषा का लोकतंत्रीकरण और सामाजिक समावेश (कविता 1 से 7)
मैथिली भाषा के समकालीन आंदोलन का सबसे बड़ा वैचारिक मोड़ यह है कि भाषा किसी एक जाति, वर्ग या भूगोल की बपौती नहीं होती। प्रथम सात कविताओं में कवि मनोरञ्जन झा, राजेन्द्र विमल, मो. अशरफ राईन, देवेन्द्र मिश्र, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, गजेन्द्र गजुर और विद्यानन्द वेदर्दी ने मैथिली को समाज के अंतिम व्यक्ति की झोपड़ी और कामगार की भट्ठी से जोड़कर देखा है।
1. मैथिलीकेँ नइँ बान्हियौ – मनोरञ्जन झा
आशा, उषा आ निशाक दुपट्टामे
एकरा जाए दिऔ घसछिलनीक छिट्टामे
आ भिखमंगनीक बट्टामे
नइँ ! जँ एना कंठ मोकिक' राखबै
मैथिलीकेँ झा जीकेर पानपर
मिसर जीक दलानपर
पाठक जीक मचानपर
आ चौधरी जीक खरिहानपर
तँ छिछियाक' मैथिली
पड़ेतीह लहठा बथानपर
बगलेमे बहैत छथिन कोसी
कूदिक' आत्महत्या क' लेतीह !
तेँ ....
मैथिलीकेँ जाए दिऔ
लोहारक भट्ठी आ पासवान जीक मचानपर
कामत जीक ओसरा आ महतो जीक मचानपर
मौलवी साहेबक टोपी आ यादव जीक बथानपर
सीतामढ़ीक आंगन आ पूर्णियाक दलानपर
भाषाक पानि जखन जड़िमे ढरेतै !
तखने मैथिलीक झण्डा अकासमे फहरेतै !
कठिन शब्दार्थ (Glossary): बान्हियौ = बाँधिए मत; घसछिलनीक छिट्टामे = घास छीलने वाली मेहनतकश स्त्री की टोकरी में; कंठ मोकिक' = गला घोंटकर; दलान = बैठक/चौपाल; खरिहान = खलिहान; छिछियाक' = छटपटाकर/तड़पकर; बथान = मवेशियों के रहने का स्थान; ओसरा = बरामदा; ढरेतै = ढलेगा/सींचेगा।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: आधुनिक मैथिली कविता में मनोरञ्जन झा की 'मैथिलीकेँ नइँ बान्हियौ' एक युगांतकारी घोषणापत्र है। कवि चेतावनी देते हैं कि यदि मैथिली को केवल उच्च-वर्गीय आभिजात्य प्रतीकों (पान, दलान और खलिहान) तक सीमित कर उसका गला घोंटा गया, तो यह भाषा छटपटाकर कोसी नदी में आत्महत्या कर लेगी। मैथिली का ध्वज आकाश में तभी लहराएगा जब वह घास काटने वाली स्त्री की टोकरी, लोहार की भट्ठी, पासवान, कामत, महतो, यादव और मौलवी साहब की टोपी से होते हुए सीतामढ़ी से पूर्णिया तक हर आँगन की जड़ को सींचेगी।
2. सोनितमे कलम – राजेन्द्र विमल
नस नसमे नया नश्लकेर, किछु घोरि रहल छी
रानी छलै जे माय भिखारिन बना देलक,
ओकरहिलए कब्र कलमसँ, हम कोरि रहल छी
दिन राति पिजा रहल छी हम, शब्दकेर तरुआरि,
जे खेत बिढा गेल, से फेर जोड़ि रहल छी
बाबाक छलनि स्वप्न, तकर घेँट ओ रेतलक,
ओहि स्वप्नसभक लाश हम, हँथोडि रहल छी।
सप्पत कहै छी बाबा, साराकेँ छूबि क’,
छोड़बै ने एको बीत, तेँ सङोरि रहल छी
कठिन शब्दार्थ (Glossary): सोनित = शोणित/रक्त; बोरि = डुबोकर; कोरि = खोदना; पिजा रहल छी = धार तेज करना; तरुआरि = तलवार; बिढा गेल = बंजर या बिखर गया; घेँट = गर्दन/गला; हँथोडि = टटोलना/खोजना; सारा = चिता; सङोरि = सहेजना/संगठित करना।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राजेन्द्र विमल की यह ग़ज़ल ओज और विद्रोह की पराकाष्ठा है। शायर कहता है कि वह अब स्याही में नहीं, बल्कि अपने लहू में कलम डुबोकर नई पीढ़ी की नसों में स्वाभिमान घोल रहा है। जिन षड्यंत्रकारियों ने रानी जैसी समृद्ध मातृभाषा मैथिली को भिखारिन बना दिया और पूर्वजों (बाबा) के सपनों का गला रेत दिया, कवि अपनी 'शब्द रूपी तलवार' की धार तेज करके उन बिखरे खेतों और सपनों को पुनः जोड़ने की सौगंध खाता है।
3. जिन्दाबाद रहे – मो. अशरफ राईन
अपन मायक बोल मैथिली सदति जिन्दाबाद रहे
मायक बोल सँन अनमोल भाषा कोनो नै जग में
सम्मान पहिले मातृभाषा के दोसर भाषा बाद रहे
हम भले पिछड़ल वर्ग रही ताहि सँ हमरा गम नै
हम भले बर्बाद रही बस हमर मैथिली आबाद रहे
बिनती एतबे अछि कतौ रहु बिसरू नै अपन भाषा
'अशरफ' हृदयमे सदति मिथिला - मैथिली याद रहे
कठिन शब्दार्थ (Glossary): केर = का/के; सदति = सदैव/हमेशा; सँन = समान/जैसा; कतौ रहु = कहीं भी रहिए; बिसरू नै = भूलिए मत।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: मो. अशरफ राईन की यह ग़ज़ल मिथिला की साझा संस्कृति और भाषा-प्रेम की मिसाल है। कवि का कहना है कि दुनिया में माँ की बोली से बढ़कर कोई अनमोल भाषा नहीं है, इसलिए प्रथम सम्मान मातृभाषा को मिलना चाहिए। तीसरे शेर में शायर की निस्वार्थ निष्ठा छलकती है—वे कहते हैं कि चाहे हम आर्थिक या सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग से हों और खुद कितने ही कष्ट में क्यों न रहें, हमारी बस यही कामना है कि हमारी मातृभाषा मैथिली सदैव आबाद रहे।
4. ई सभक मैथिली – देवेन्द्र मिश्र
जे अहाँ बजैछी, सएह छियै मैथिली ।।
ई हमर मैथिली, ई अहाँक मैथिली ।।
एक्के जातिक छिए ने किनल,
दछिनाहा ने पूबारि छियै ई ।
नइ काेशिकन्हा, ने दडिभङ्गिया
पछिमाहा ने उतरबारि छियै ई ।।
काेइर, कमार, चमार, दुसाधाे,
मुसहर, तेली आ हलुवाइ ।
बाभन, कैथ आ यादव, धानुख,
राजपूत, बनियाँ, गनगाइ ।।
क्याैट आ कुर्मी, माली, हलखाेर
डाेम, वैश्य, कुज्जर, कलवार ।
सुँडी, थारु, बाँतर, खतबे,
राजधाेब आ भाउर, साेनार ।।
आओर विविध जाति आ वर्गक
बाेली अप्पन अलग-अलग ।
तीन काेसपर बाेली बदलै,
भाषा नइ अछि विलग-विलग ।।
ठेठी आ देहाती कहियाै
मैथिलीक बहु डारि छियै ई ।।
विविधताकेर स्वर्ग मैथिली
फूल नइ फुलवाडि छियै ई ।।
जे-जहिना बाजी सएह छियै मैथिली ।
ई हमर मैथिली । ई अहाँक मैथिली ।।
ई सभक मैथिली । ई सभक मैथिली ।।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): जहिना बाजए = जैसे भी बोले; सएह छियै = वही है; किनल = खरीदा हुआ; काेशिकन्हा = कोसी के किनारे की बोली; विलग-विलग = अलग-अलग; डारि = डालियाँ/शाखाएँ; फुलवाडि = फुलवारी/बगीचा।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: देवेन्द्र मिश्र की प्रसिद्ध कविता 'ई सभक मैथिली' भाषाई शुद्धतावाद के अहंकार को तोड़ती है। कवि स्पष्ट करते हैं कि मैथिली किसी एक जाति की खरीदी हुई संपत्ति नहीं है, न ही यह केवल दरभंगिया, कोशिकन्हा, पूरबी या पश्चिमी मानक तक सीमित है। कोइरी, कमार, चमार, दुसाध, मुसहर, ब्राह्मण, कायस्थ, यादव, राजपूत, थारू, सोनार—मिथिला के समस्त समुदायों की अपनी-अपनी लहजे की मिठास है। 'ठेठी' या 'देहाती' कहकर जिन्हें अलग किया जाता है, वे वास्तव में मैथिली के विशाल वृक्ष की ही शाखाएँ हैं। मैथिली एक फूल नहीं, बल्कि विविधता की संपूर्ण फुलवारी है।
5. प्रेमक सीमा – धीरेन्द्र प्रेमर्षि
हमरा बड्ड नीक लगैत अछि
तेँ हम बाजोसँ प्रेम करैत छी
मुदा पड़बा हमरा सभसँ प्रिय अछि
ताहीसँ अपना आकाशमे हम
बाजक विचरणपर प्रतिबन्ध लगबैत छी
हँ, मैथिली हमर पड़बा अछि।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): चिड़इ-चुनमुन्नी = छोटी-छोटी चिड़ियाँ; बड्ड नीक = बहुत अच्छा; बाजोसँ = बाज (शिकारी पक्षी) से भी; पड़बा = कबूतर (शांति और अपनत्व का प्रतीक)।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: सुप्रसिद्ध मैथिली साहित्यकार और सांस्कृतिक चिंतक धीरेन्द्र प्रेमर्षि ने मात्र सात पंक्तियों में विश्व-साहित्य के स्तर का रूपक गढ़ा है। कवि कहते हैं कि मुझे हर चहचहाती चिड़िया (अन्य भाषाएँ) प्रिय है, यहाँ तक कि मैं बाज (प्रभुत्वशाली बड़ी भाषाओं) से भी द्वेष नहीं रखता; किंतु शांति और भोलेपन का प्रतीक 'पड़बा' (कबूतर) मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है। इसलिए अपने सांस्कृतिक आकाश में मैं शिकारी बाज के अतिक्रमण पर प्रतिबंध लगाता हूँ—क्योंकि मैथिली मेरा वह प्यारा कबूतर (पड़बा) है जिसकी रक्षा करना मेरा प्रथम धर्म है।
6. कोना बिसरि सकबै? – गजेन्द्र गजुर
नानी-दादीके खिस्सा पिहानी सुनैत
अङना-घर-ओसरामे गुड़कुनिया दैत
दिदीसङ्गे नचैत-गबैत, साथीसङ्गे खेलैत-धूपैत।
ओ भाषा कोना बिसरि सकबै?
माएक दूध पिबैत, सिखने छी जइ भाषाकेँ
दादाक पराती गबैत, सिखने छी जइ भाषाकेँ
बाबूक घुघुआ खेलैत, सिखने छी जइ भाषाकेँ
चकलेट-ललीपप चटैत, सिखने छी जइ भाषाकेँ
ओ भाषा कोना हम छोड़ि देबै?
ई मेघमे बादल कत' जाइ छै माए?
सरुज अइ कोनसँ किए उगै छै दिदी?
दादी किए आँखि मुनि लेलकै बाबू?
लोक मरलाक बाद कत' जाइ छै कका ?
सवालपर सवाल कर' सिखलहुँ जइ भाषामे
ओ भाषा कोना बिसैर सकबै?
आब माएके कोरा छूटि गेलै, आशे जिबै छी खालि
हिन्दी, अङरेजी आ नेपालीएकेँ रटै छी खालि
दिनभरि आन भाषामे अपनाकेँ बेचै छी खालि
कुसियारक खेत परती छोड़ि, चिन्नीलए दोगै छी खालि
अपन पहिचान, आत्मसम्मान कत' हरा गेल?
हम अपने भाषाकेँ कोना मारि सकबै?
हम अपने माएकेँ कोना मारि सकबै?
कहू, ओ भाषा कोना बिसैर सकबै?
कठिन शब्दार्थ (Glossary): खिस्सा-पिहानी = कहानी और पहेलियाँ; गुड़कुनिया दैत = घुटनों के बल लुढ़कते हुए; पराती = प्रातःकालीन भक्ति गीत; घुघुआ = बच्चों को पैरों पर बिठाकर झुलाने का खेल; कुसियार = गन्ना (ईख); परती = बिना जोता हुआ खाली खेत; दोगै छी = तरसते/दौड़ते हैं।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: युवा कवि व पत्रकार गजेन्द्र गजुर की यह कविता मनोवैज्ञानिक और संवेदनात्मक स्तर पर पाठक को बचपन में ले जाती है। जिस भाषा में हमने माँ का दूध पीते हुए बोलना सीखा, दादा की प्राती सुनी, और ब्रह्मांड व मृत्यु के पहले बाल-सुलभ प्रश्न पूछे—उसे हम कैसे भूल सकते हैं? कविता की सबसे मार्मिक पंक्ति है—"कुसियारक खेत परती छोड़ि, चिन्नीलए दोगै छी खालि" (अर्थात् अपने गन्ने के समृद्ध खेत को बंजर छोड़कर हम दूसरों से चीनी माँगने के लिए भटक रहे हैं)। यह पंक्ति हिंदी, अंग्रेजी और नेपाली की दौड़ में अपनी समृद्ध मातृभाषा को छोड़ने वाले समाज पर सीधा प्रहार करती है।
7. तोहर बोल – विद्यानन्द वेदर्दी
जिनगी तरि लेबौ माए गे
तोँ ढार नइ एना नोर
तोहर खौछामे, फूल खूशीके
हम त भरि देबौ माए गे
जहलमे ओकर कोर्राक सोँटसँ
बम विष्पोटसँ, गोलीक चोटसँ
रञ्जू बनि कि झगड़ू बनि
हम झगड़ि जेबौ माए गे
बहतै बिर्रो कि हएतै राँति,
बनि टेमी, बरि जेबौ माए गे
छलौँ भुथलाएल, चीत केलकै शोर
तेँ करै छी तोहर डीहपर सङोर
धरि कलम, क्रान्तीक काठी
हम रगड़ि देबौ माए गे
गबैत गीत तोहर टोले टोल,
हम ससरि जेबौ माए गे
कतबो गढ़ए ओ परपंचक पिहानी
छूटब-टूटब हमर नइँ ई निशानी
छी हमसभ तँ माटिक लाल
माटिकेँ जकड़ि लेबौ माए गे
छोड़बौ जँ हम तोहर छोर,
जीबिते मरि जेबौ माए गे
कठिन शब्दार्थ (Glossary): ठोर = होंठ; नोर = आँसू; खौछा = आँचल/खोंइछा; जहल = जेल/कारागार; बिर्रो = आँधी/तूफान; टेमी = ढिबरी/दीपक की लौ; भुथलाएल = भटका हुआ/उलझा हुआ; डीह = पैतृक वासभूमि।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: सांस्कृतिक अभियंता और कवि विद्यानन्द वेदर्दी का यह गीत मिथिला-मधेश के भाषाई संघर्ष और शहादत की गाथा है। कवि माँ मैथिली को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे माँ, तुम आँसू मत बहाओ, हम तुम्हारे खोंइछा को खुशियों के फूलों से भर देंगे। चाहे जेल के कोड़ों की मार हो या बम-गोलियों का प्रहार, हम शहीद रञ्जु झा और झगड़ू की तरह अड़ जाएंगे और तूफानी रात में 'टेमी' (छोटी मशाल) बनकर जलते रहेंगे। यदि हमने तुम्हारा आँचल छोड़ा, तो हम जीते-जी मर जाएंगे।
खंड 2: मातृभाषा की पीड़ा, अस्मिता और वैचारिक प्रतिरोध (कविता 8 से 14)
इस खंड की रचनाएँ हमें आत्म-निरीक्षण के कटघरे में खड़ा करती हैं। जब समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग अपनी ही भाषा में बात करने में हीनता अनुभव करने लगे, तब कवि की वाणी में करुणा और आक्रोश दोनों एक साथ फूटते हैं।
8. माए, मैथिली आ हम – अमरेन्द्र यादव
माए मैथिलीक शब्दकोशक नाम छियै
माए अपन स्तन पियाक'
जिया रहल है मैथिलीकेँ
माए आ मैथिलीक बीच
घनात्मक सम्बन्ध छै
जाधरि माए जीवैत रहतै
ताधरि मैथिली अमर रहतै।
मैथिली माएक दुलारू सन्तानक नाम छियै
मैथिली माएक रोगग्रस्त सन्तानक नाम छियै
मैथिली माएक कन्नारोहटिक नाम छियै
माएकेँ मार' खातिर
माहुरक जरूरत नइ
मैथिलीकेँ मारि दियौ
माए अपने मरि जेतै।
तोरा लाज होइत हेतौ माए
हमरा अपन बेटा कहैत
तोरा खातिर
तोहर मैथिली खातिर
हम जे नइ लड़लियौ
एकटा झगड़ोटा नइ बेसाहलियौ
से हम तोहर बेटा नइ छियौ
हम तोहर सपूत नइ छियौ
देश छिनेलै, भेषो छिनेलै
हम तोहर कायर बेटा
टुकुर-टुकुर ताकैत रहि गेलियौ
हम तोहर पाखण्डी बेटा
चुपचाप तमाशा देखैत रहि गेलियौ
आब मैथिली छिना रहल छै
आ हम तोहर तथाकथित सन्तानी बेटा
मूकदर्शक बनल छियौ
हम मैथिलीक हत्या
क' रहल छियौ माए
मैथिलीक हत्या मतलब
तोहर हत्या छियौ माए
मैथिलीक हत्याक मतलब
हमर आत्महत्या छियौ माए ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): जाधरि-ताधरि = जब तक - तब तक; कन्नारोहटि = करुण क्रंदन/रुदन; माहुर = जहर/विष; झगड़ोटा नइ बेसाहलियौ = एक छोटा-सा विवाद भी मोल नहीं लिया।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: अमरेन्द्र यादव की यह कविता समकालीन मैथिली साहित्य की सबसे तीखी आत्म-स्वीकृति (Confessional Poetry) है। कवि कहते हैं कि माँ को मारने के लिए जहर (माहुर) की आवश्यकता नहीं है—बस उसकी भाषा मैथिली को मार दीजिए, माँ स्वतः मर जाएगी। कवि स्वयं को 'कायर और पाखंडी बेटा' कहकर धिक्कारते हैं कि जब हमारा देश, भेष और भाषा छीनी जा रही थी, तब हम मूकदर्शक बने रहे। अंतिम पंक्तियों का निष्कर्ष कालजयी है: "मैथिली की हत्या का अर्थ माँ की हत्या है, और माँ की हत्या का अर्थ हमारी अपनी आत्महत्या है।"
9. हे गिद्धराज लोकनि – किसलय कृष्ण
अनवरत चलैत
स्वाभाविके अछि टीस
आ से कने आह की निकलल
अहाँ सभक अंतस करय लागल वाह-वाह...
हमरा बुझल अछि जे
एहि बाट पर चलैत कांट सँ
कतबो-कतबो शोणितेशोणिताम भ' जाय
हमर पएर आकि देह...
अहाँ नै करय आयब कोनो मरहम-पट्टी...
किएक तँ अहाँक गिद्धदृष्टि
टिकल अछि हमर अस्थि-मज्जा-मासु पर...
सोशलमीडियाइ संसार मे सदिखन
श्रद्धांजलि देबाक लेल उताहुल
हे हमर लेखक-चिन्तक समाज...
अहाँ प्रसन्न नहि होउ हमर टीस आ वेदना सँ
एखन हमर शोणित अपन लय मे
प्रवाहित अछि आ सुषुम सेहो...
आ तेँ हम कांट भरल बाटे नहि
लहकैत कोयला बिछाओल डगर पर सेहो
अनवरत चलैत रहब...
मातृभाषा लेल बरू गलैत रहब...
कठिन शब्दार्थ (Glossary): बाट = मार्ग/रास्ता; शोणितेशोणिताम = लहूलुहान; उताहुल = उतावला/आतुर; सुषुम = गुनगुना/उष्ण (जीवित रक्त); लहकैत = धधकता हुआ; बरू = भले ही।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कवि किसलय कृष्ण ने मातृभाषा के जमीनी कार्यकर्ताओं के दर्द पर मरहम न लगाकर केवल सोशल मीडिया पर 'श्रद्धांजलि' देने को आतुर बुद्धिजीवियों को 'गिद्धराज' कहकर संबोधित किया है। कवि कहते हैं कि काँटों और कुश से भरे भाषा-संघर्ष के पथ पर चलते हुए यदि मेरे पाँव लहूलुहान भी हो जाएँ, तो आप मरहम लगाने नहीं आएंगे क्योंकि आपकी गिद्ध-दृष्टि मेरे हाड़-मांस पर टिकी है। किंतु जब तक धमनियों में गर्म लहू बह रहा है, हम धधकते अंगारों पर भी चलते रहेंगे और मातृभाषा के लिए स्वयं को गलाते रहेंगे।
10. मातृभाषा दिवस – अमरनाथ झा
दूरहिं स', ढोल आ ताशा
स'भ तरफ सँ मिठगर लागै
अपन अपन मायके भाषा ।
भने लिखा जाउ दोसरो भाषा
होइछ कल्पना माइएक भाषा
पढ़ि लेल जाय अनेक शास्त्र पर
अर्थ बुझादै माइएक भाषा ।
अपन मातृभाषा के सदिखन
बाँचल रहै आदर सम्मान
गर्वोन्नत सिर रहतै सभदिन
रखने निज भाषाके मान ।
मायक भाषा, अप्पन भाषा
हार रत्न सम गैंथिली
बाहर हिंदी-अंगरेजी, वा जे
घरमे बजियौ मैथिली ।
मातु मैथिली भाषा प्रचलन
घर-बाहर मे हो व्यवहार
अपन घ'र मे इज्जति पओती
तखने इज्जति भरि संसार ।
आइ विश्वमातृभाषा-दिवस
पर, सभकेँ अछि शुभकाम
अपन-अपन मातृभाषाके मनमे
रखने रही सदति सम्मान ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): सोहाउन = सुहावना; रसनचौकी = शहनाई और लोक-वाद्यों की मंगल ध्वनि; मिठगर = मीठी; गैंथिली = गूँथी हुई माला।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: अमरनाथ झा की 'मातृभाषा दिवस' कविता भाषा-विज्ञान के एक मौलिक सत्य को उजागर करती है—मनुष्य चाहे दुनिया के कितने भी शास्त्र और विदेशी भाषाएँ पढ़ ले, किंतु उसकी कल्पना और समझ की मूल भाषा सदैव 'माँ की भाषा' ही होती है। कवि अत्यंत व्यावहारिक सूत्र देते हैं: बाहर आजीविका के लिए भले ही हिंदी या अंग्रेजी बोलिए, किंतु अपने घर के भीतर अनिवार्य रूप से मैथिली बोलिए; क्योंकि जब भाषा को अपने घर में सम्मान मिलेगा, तभी संसार उसका सम्मान करेगा।
11. मातृभाषा मैथिली – अयोध्यानाथ चौधरी
लखिमा रानीक भाषा, विद्वान विदुषीक भाषा
सर्बसाधारणक भाषा, पूर्ण जाग्रत भेल आशा।
आहाँ भागमन्त छी, आहाँ जीबन्त छी
प्राती आ सांझ मे, सोहर-समदाउन मे
उदासी-वटगवनीमे फागु आ नचारीमे
बच्चा क बोलमे ललना क ठोरमे बुढ क जवानमे
प्रणाम मे, सलाममे जेना मोन बाजिली
मातृभाषा मैथिली । मिथिला मे रह' बला
सब बजैछी मैथिली पाण्डित्यपूर्ण वा ठेठी
सबटा छैक मैथिली सब छी अपने खास
केओ नहि आन छी जन्मे आ संस्कार सँ
सब केओ महान् छी मिथिला क काननमे
सब केओ पुष्प छी गौर, श्याम बा कारी
कतौ एके रंग छी बिभेद सब बिसरिकय
मुक्तिगीत गाबि ली सबकेओ नियारि ली
अभियान साधि ली मोन मे अराधि ली
जय दुर्गा, जय काली सस्वर शपथ खा' ली
मैथिली, माँ मैथिली मातृभाषा मैथिली ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): भागमन्त = भाग्यवान; समदाउन = विदाई का लोकगीत; वटगवनी = राह चलते या प्रातः गाया जाने वाला पद; ललना = स्त्री; कानन = उपवन/वन।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: अयोध्यानाथ चौधरी की यह कविता मैथिली की ऐतिहासिक और लोक-सांस्कृतिक समृद्धि का दस्तावेज है। यह विद्यापति, मंडन मिश्र, विदुषी भारती और रानी लखिमा की भाषा होने के साथ-साथ सोहर, समदाउन, वटगवनी, फागु और नचारी की जीवंत भाषा है। यह 'प्रणाम' में भी है और 'सलाम' में भी; यह पांडित्यपूर्ण शास्त्रार्थ में भी है और ठेठ लोक-व्यवहार में भी। कवि सभी भेदभाव भुलाकर मिथिला के उपवन के हर फूल को एक साथ भाषा-मुक्ति का गीत गाने का आह्वान करते हैं।
12. चलू जगाब' – अर्जुन प्रसाद गुप्ता 'दर्दिला'
बिगरल मिथिला चलू बनाबऽ ।
बनल फूलवारी देखियौ उजडि गेल,
जतह उगै चाँद ओतहे अन्हार भेल,
दासक लति लतरि गेल चलु उजाडऽ ।
दाेसर भाषा ठोरपर आबि गेल,
अपन भाषा घरसँ निकलि गेल,
इहे हमरा दास बनाओत चलु भगाबऽ ।
माइ हमर गिराबै नयनसँ नाेर,
कानैत कानैत भऽ गेल कतेक भाेर,
धरति पुकारै चलु मिथिला बनाबऽ ।
सुतलाहाके चलु जगाबऽ,
बिगरल मिथिला चलू बनाबऽ ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): सुतलाहा = सोए हुए लोग; अन्हार = अंधकार; दासक लति लतरि गेल = गुलामी की बेल फैल गई है; भोर = सुबह/प्रभात।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कवि अर्जुन प्रसाद गुप्ता 'दर्दिला' का यह जागरण-गीत आत्म-विस्मृति में डूबे समाज को झकझोरता है। जहाँ कभी ज्ञान का चाँद उगता था, वहाँ आज भाषिक उपेक्षा का अंधकार छा गया है और मानसिक गुलामी की बेल (दासक लति) फैल गई है। जब अपनी भाषा घर से निकल जाती है और पराई भाषा होंठों पर कब्जा कर लेती है, तो वह समाज को सांस्कृतिक दास बना देती है। कवि रोती हुई मातृभूमि के आँसू पोंछकर मिथिला को पुनः संवारने का आह्वान करते हैं।
13. पावन मिथिला धाम – कालिकान्त झा 'तृषित'
पावन मिथिला धाम रे।
माटि जतऽ के सर्वश्रेष्ठ से,
जनकलली के गाम रे।।
आदि शक्ति अवतरण हेतुए,
अही भूमि के जखनहि चुनलनि।
सुर नर मुनि गन्धर्व सुधि जन,
एकर महत्ता सब जन बुझलनि।।
सकल तीर्थ सब सेहो बैसल,
आबि जनकपुर धाम रे
युग युगादि सँ.................
मिथिक नाम सँ चर्चित मिथिला,
अन्न जलक भंडार कहाबए।
पान मखान एतऽ अति उत्तम,
स्वर्गहु के जे मन ललचाबए।।
सुग्गा जेहि ठाँ वेद पढै छल,
घर घर गुँजित ज्ञान रे।
युग युगादि सँ..................
भक्ति गीत के सम्मोहन मे,
आबि सदेह नाथ त्रिपुरारी।
विद्यापति घर उगना अनुचर,
बनला स्वयं बघम्बरधारी।।
एहि अनुपम संयोगक साक्षी,
बिस्फी तीर्थ समान रे।
युग युगादि सँ.............
सभक मातृभाषा सर्बोपरि,
जगत विदित नहि एहि मे शंका।
जे जगदम्बे नामक भाषा,
तैं तकरे छै बाजल डंका।।
धन्य मैथिली मिथिला महिमा,
शत शत तृषित" प्रणाम रे।
युग युगादि सँ तीन भुवन मे,
पावन मिथिला धाम रे।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): जनकलली = माता सीता; सुग्गा = तोता (मंडन मिश्र के आश्रम का प्रसंग); अनुचर = सेवक; बघम्बरधारी = बाघंबर पहनने वाले भगवान शिव।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कालिकान्त झा 'तृषित' ने इस भक्तिपूर्ण गौरव-गीत में मिथिला के पौराणिक और बौद्धिक वैभव का चित्रण किया है (कालिकान्त झा की मातृ-गीत रचना यहाँ पढ़ें)। यह वह पावन भूमि है जिसे आदिशक्ति माँ सीता ने अवतरण के लिए चुना, जहाँ का पान और मखान स्वर्ग के देवताओं का भी मन ललचाता है, जहाँ मंडन मिश्र के द्वार पर तोते भी वेद-चर्चा करते थे, और जहाँ मैथिली भक्ति-गीतों के सम्मोहन में स्वयं भगवान शिव महाकवि विद्यापति के घर नौकर 'उगना' बनकर रहे।
14. भाषा आ भेष – काशिकान्त झा
हम अपन भाषा आ भेषला लरई छी
बिसरब कोनाक विदेहक ई गाम
माटिसँ उबजल अई मिथिलाके नाम
मैथिलीके घर घर संदेशला लरई छी
हम अपन===============
पहिने छी मैथिल त देशक सन्तान
सीता सन बहिन अई तकर गुमान
विद्यापतिके अवशेषला लरई छी
हम अपन===============
कोशी आ कमला अई हमरे बलान
ई सउसे परदेश अई हमरे दलान
बन्ठा आ लोरिक सलहेसला लरई छी
हम अपन==============
अनदेखी कयने अई बुझइय आन
हमरा नई खोज खबर भेलउ बिरान
हम मिथिलापति मिथिलेशला लरई छी
हम अपन================
कठिन शब्दार्थ (Glossary): लरई छी = लड़ रहे हैं; सउसे = संपूर्ण/सारा; बन्ठा आ लोरिक सलहेस = मिथिला के लोक-नायक और लोक-देवता; बिरान = बेगाना/वीरान।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: काशिकान्त झा की यह रचना प्रवासी और स्थानीय दोनों मैथिलों के संघर्ष का स्वर है। कवि कहते हैं कि हम देश और परदेश—हर जगह अपनी भाषा और भेष (पहचान) के लिए लड़ रहे हैं। हमारी विरासत में जितनी गरिमा माता सीता और विद्यापति की है, उतना ही शौर्य लोक-नायक वीर लोरिक, बन्ठा और राजा सलहेस का है। शासन-प्रशासन की अनदेखी के विरुद्ध यह कविता संपूर्ण मिथिला के सांस्कृतिक अधिकारों की आवाज उठाती है।
खंड 3: मिथिला की लोक-संस्कृति, ग्राम्य स्मृति और मौलिकता का संकट (कविता 15 से 21)
किसी भी भाषा का रस उसके भूगोल, खान-पान, लोक-पर्वों और बचपन की स्मृतियों में बसता है। इस खंड की कविताओं में जहाँ एक ओर मिथिला के दही-चूड़ा, तिलकोर के तरुआ, मखान और बचपन के खेलों का सजीव चित्रण है, वहीं दूसरी ओर मातृभाषा में शिक्षा न मिलने की पीड़ा और रंगकर्मी रञ्जु झा के बलिदान की अमर गाथा भी है।
15. मिथिला वर्णन – ज्योती शर्मा
बाटे में दर्शन भेल हमरा, कमला कोसी जीबछ आओर बलान !!
स्नान, ध्यान, मुड़न होयत देखि, रुकलहुं ओहि ठाम !
आगां बढ़ै सँ पहिने मातृभूमि मिथिला के केलहुं प्रणाम !
देखलहुं गाछ वृक्ष पर बैसल सुगा मैना अा चिडै चुन्मुन्नी !
देखलहुं पानि में इचना पोठी रहु आओर गरचून्नी !!
गहबर में देखलहुं डिहबार दिना भद्री आओर सलहेस !
एहि लोक देवताक दर्शन सँ भागि जाय सबटा क्लेश !!
भिनुसर उठिक चुरा दही चिन्नी पर कचका मिरचाय !
त्रिलोकक आनंद छै एहि में आओर कतय भेटत यौ भाई !!
दुपहरिया में भात दालि तरकारी संग तिलकोरक तरूआ !
रंग बिरंगक व्यंजन भेटत ताहि पर करैला क भरुआ !!
माछ भात के पश्चात स्वदगर लागै तिरहुतिया पान !
मखानक लावा बड्ड नीक लागै एयाह छै मिथिलाक पहचान !!
खुब सुंदर लागै एतुका चऽर चांचड़ अा खेत खरिहान !
एक बेर घुमि आउ अहूं सब एहि सँ बेसी हम की देब प्रमाण !!
कठिन शब्दार्थ (Glossary): मुड़न = मुंडन संस्कार; इचना, पोठी, रहु, गरचून्नी = मिथिला की नदियों व तालाबों में पाई जाने वाली देशी मछलियाँ; गहबर = लोक-देवताओं का पूजा-स्थल; भिनुसर = भोर/तड़के सुबह; तिलकोरक तरूआ = तिलकोर के पत्तों का पकौड़ा; चऽर-चांचड़ = जलमग्न मैदानी भूमि/चौर।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: ज्योती शर्मा की यह कविता प्रवासी मैथिल के लिए अपनी मातृभूमि की एक जीवंत चित्र-यात्रा है। कमला, कोसी, जीवछ और बलान नदियों के घाटों पर मुंडन संस्कार, पानी में तैरती पोठी और रोहू मछलियाँ, गहबर में पूजित डिहवार बाबा, दीना-भद्री और सलहेस, सुबह के नाश्ते में दही-चूड़ा-चीनी के साथ हरी मिर्च, दोपहर में दाल-भात के साथ तिलकोर का तरुआ व करेले का भरुआ, और भोजन के बाद तिरहुतिया पान व मखान का लावा—यह कविता मिथिला के संपूर्ण लोक-जीवन का विश्वकोश है।
16. वाह रे वालपन – जीतेन्द्र जितू
गल्ली कुच्ची...प्रिय मित्र मण्डली...
फैलगर हाफ पेन्ट....नमरल गंजी....
लताम, आम आ ततरिके गाछ..
झटहा, ढेपा, गाछी बलाक गाईर...
हाथमे बोरा, कांखमे किताब..
मास्टरक फटकार, करमिक सोटा..
बरदक आ बकरीक चरवाही...
गुली, क्रिकेट आ पिल्लो डण्टा...
तास आ गेनीके व्यस्तता...
सांझक उपराग, घरक फटकार..
लालटेन, डिबिया ल' बाबा लग टिसन.
रातिक खिस्सा...सिरक क,झगडा...
बाबा बिस्कुट, सन्तोलावला लमनचूस
ठकायके चटपटी, भौसीक झिलिया
नहि कोनो चिन्ता नहि तनाव
स्वतंत्र आ उन्मुक्त जिवन
वाह रे वालपन........वाह रे वालपन.......
कठिन शब्दार्थ (Glossary): फैलगर = ढीला-ढाला; नमरल गंजी = लटकी हुई बनियान; लताम = अमरूद; ततरि = इमली; झटहा/ढेपा = फल तोड़ने का डंडा और मिट्टी का ढेला; करमिक सोटा = कलमी की छड़ी; उपराग = उलाहना/शिकायत; सिरक = रजाई/लिहाफ; लमनचूस = लेमनचूस (टॉफी)।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: जीतेन्द्र जितू की 'वाह रे वालपन' 90 के दशक और ग्रामीण मिथिला के बचपन का अत्यंत सजीव कोलाज है। ढीली हाफ पैंट पहनकर अमरूद, आम और इमली के बगीचों में ढेला मारना, बगल में बैठने के लिए जूट का बोरा और किताब दबाकर स्कूल जाना, गिल्ली-डंडा (पिल्लो-डंटा) खेलना, शाम को घर आने वाली शिकायतें, रात में लालटेन और ढिबरी की रोशनी में बाबा के पास पढ़ना और रजाई खींचने का मीठा झगड़ा—यह कविता हर पाठक को उसके निश्छल बचपन में लौटा ले जाती है।
17. मातृभाषा – मैथिल प्रशान्त
अपन मातृभाषामे
नहि जानि पबैत छी
के पढ़ैत अछि हमर कविता
जे लिखने छी हम अपन मातृभाषामे
हम कविता लिखैत छी
मातरे अपन मातृभाषामे
हम जनैत छी,
आओर कतोक भाषा
हम बजैत छी,
आओर कतोक भाषा
मुदा,
मुदा हम कविता लिखैत छी
मातरे अपन मातृभाषामे
हमर भाव
हमर संवेदना
मातरे बेकछाइत अछि अपन मातृभाषामे
हम भावक अनुवाद
नहि करय चाहैत छी मौलिकताक नाओंपर
कोनो आर भाषामे
अनुवाद एकटा स्वतंत्र विधा अछि
हमरा अनुवाद नहि करय अबैत अछि
तेँ हम लिखैत छी मातरे अपन मातृभाषामे
हमर मौलिक विस्तार ओतहि समाप्त भ' जाइत अछि
जतयसँ आरंभ होइत अछि
ककरो आरक मातृभाषा
आ आरंभ होयबाक संभावना बनैत अछि
हमर कविताक अनुवाद करबाक
विश्वक बहुत रास मातृभाषा समाप्त भ' जैत"
लिखैत अछि अखबार
वैश्विक सामंतवादक चाँगुर
नछोरि रहल अछि हमरो मातृभाषाकेँ
की हमरो मातृभाषा भ' जैत समाप्त
पेटक हवन कुँडमे पहिल आहुति
की मातृभाषाकेँ देल जैत
हम चिंतित छी
हमर मातृभाषाक संगहि समाप्त भ' जैत हमर कविता
कारण हम कविता लिखैत छी
मातरे अपन मातृभाषामै ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): मातरे = केवल/मात्र; बेकछाइत अछि = खिलती है/पूर्ण रूप से अभिव्यक्त होती है; चाँगुर = पंजा/चंगुल; नछोरि रहल अछि = नोच रहा है।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: मैथिल प्रशान्त की यह दार्शनिक कविता सृजन के मनोविज्ञान और 'वैश्विक भाषिक सामंतवाद' की पड़ताल करती है। कवि कहते हैं कि मैं कई अन्य भाषाएँ जानता और बोलता हूँ, पर कविता केवल अपनी मातृभाषा में ही लिखता हूँ, क्योंकि मेरी मौलिक संवेदना केवल मातृभाषा में ही पूर्ण रूप से खिलती है। कवि गहरी चिंता व्यक्त करते हैं कि रोजी-रोटी ('पेटक हवन कुँड') की मजबूरी में सबसे पहली आहुति मातृभाषा की ही दी जा रही है। यदि वैश्विक सामंतवाद के पंजों ने मातृभाषा को समाप्त कर दिया, तो कवि की मौलिक कविता भी समाप्त हो जाएगी।
18. अपन भाषामे पढ़ि नै सकलौँ – नारायण मधुशाला
आइधरि किछ गढि नइ सकलौँ ।।
दोसरक भाषामे पढैत-पढैत जीवन बिति गेल ।
साल भरिक अर्जल ज्ञान काज नइ एल ।।
साधारण कौआके जखन हम crow रटितौँ ।
अहिँ कहुँ परिक्षामे कते अंक अरैज सकितौँ ।।
अंक अबै छल परिक्षामे साले-साल शुन्ना ।
बाबुजीक तामस बढि जाइ छल दू-गुन्ना ।।
भषेक कारण अबै छल ई स्थिती हमरा लेल ।
खुशीक बातो तऽ नइ रहै छल भेलापऽ फेल ।।
बुझैयोबाला चिज सबके चाटै परैत छल ।
सायद तैँ नइ दिमागमे किछ अरैत छल ।।
भूतमे जरि भेल अबल, एखन धरि सतेलक ।
हमहुँ आगा बढि सकितौँ, भाषा पाँछा केलक ।।
सबटा लक्ष्य हमर जरि-जरिकऽ छउर भेल ।
जीवनमे सफलताक सङ्ग भऽ नइ पाएल मेल ।।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): तामस = क्रोध/गुस्सा; चाटै परैत छल = बिना समझे रटना पड़ता था; अरैत छल = टिकता/ठहरता था; छउर = राख/भस्म।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: शिक्षा के महत्व पर केंद्रित नारायण मधुशाला की यह कविता उस शैक्षिक त्रासदी को उजागर करती है जिससे करोड़ों ग्रामीण बच्चे गुजरते हैं। जब बच्चे को प्राथमिक शिक्षा उसकी मातृभाषा में न देकर पराई भाषा में दी जाती है, तो वह समझने वाली चीजों को भी केवल तोते की तरह रटने ('चाटै') के लिए विवश हो जाता है। आँगन के परिचित 'कौआ' को 'Crow' रटने के बोझ ने बच्चे की मौलिक प्रतिभा को कुचल दिया और उसके सपने जलकर राख (छउर) हो गए।
19. रञ्जु – रमेश रञ्जन
घोघकेँ उनट'बैत अछि
समुद्री विशालता लेने
दुआरिकेँ नङ्घैत अछि
गामक चिल्होरि
काग आ कुकुरकेँ
हरक'बैत अछि
शहरक खुँखार भेड़िया
आ बाघसँ लड़ैत अछि
जे सौन्दर्यकें
निर्निमेष निहारैत अछि
कलाकेँ
भक्ति आ साधना मानैत अछि
श्वासक हरेक उच्छवासमे
सृजन आ प्रदर्शनक
लय-गति छै
जकर रोम-रोम
नव विन्यासक संग
कलारूप गढ़ै छै
जे धरती छै
अंकुरण
पोषण
सृजन
कोमल
सरस
सम्वेदना
आ करूणाक
निर्भर धारा
निष्ठा
समर्पण
आ प्रतिबद्धता
प्रतिबद्धता
अपन मातृभाषा
मातृसंस्कृति
मातृभूमि
आ परिचयक
ओ विध्वंशक
सुनामीकेँ कोना सहि सकैत छल
कोमल
सरस
सम्वेदना
आ करुणाक अथाह सागर
रज्जु ।
(मिथिला राज्य स्थापनाक आन्दोलनमे शहीद भेल प्रसिद्ध रङ्गकर्मी रञ्जु झा प्रति)
कठिन शब्दार्थ (Glossary): घोघ = घूँघट; उनट'बैत अछि = उलट देती है; नङ्घैत अछि = लाँघती है; चिल्होरि = चील; हरक'बैत अछि = भगाती/डराती है; निर्निमेष = बिना पलक झपकाए।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: नेपाल के जनकपुर में मिथिला राज्य और मैथिली भाषा आंदोलन (2012) के दौरान बम विस्फोट में शहीद हुईं प्रसिद्ध रंगकर्मी और अभिनेत्री **रञ्जु झा** की स्मृति में वरिष्ठ साहित्यकार रमेश रञ्जन की यह कविता अत्यंत मर्मस्पर्शी है। रञ्जु झा ने रूढ़िवादी 'इस्पात के घूँघट' को हटाकर और देहरी लाँघकर रंगमंच की दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी। वे कला, करुणा और मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता की प्रतिमूर्ति थीं, जिन्होंने हिंसा की सुनामी के सामने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
20. माएसँ प्रेम – रामनरेश शर्मा
हम अहाँ त मनुक्ख छी, चिड़ै चुन्नमुन्नि सेहो माएक भाषा बजैए !!
ई अजगुत मिथिले में देखल, लोक कें माए सँ प्रेम आ मातृभाषा सँ द्रोह भेलैए....
भाई बन्धु सँ आन भाषा बाजब, ई अन्याय कतओ भेलैए !
जाहि प्रेम के अधिकारिणी मैथिली, ओ प्रेम दोसर के भेटलैए !!
ई अजगुत मिथिले में देखल....
आन प्रदेश में माए प्रथम, आओर मातृभाषा प्रथम भेलैए !
मैथिलीक चिंते नहि, मुदा हिन्दी लेए सब कटमारि करैए !!
ई अजगुत मिथिले में देखल.....
मैथिली के छाती पर हिन्दी भोजपुरी खूब तांडव नांच करैए !
ई देखिकऽ सब मिथिलावासी जोर जोर सँ ताली बजबैए !!
ई अजगुत मिथिले में देखल, लोक कें माए सँ प्रेम आ मातृभाषा सँ द्रोह भेलैए....
कठिन शब्दार्थ (Glossary): सधलैयए = चुकाया जा सका है; मनुक्ख = मनुष्य; अजगुत = अद्भुत/विचित्र विडंबना; आन भाषा = पराई भाषा।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: रामनरेश शर्मा ने मिथिला समाज के सबसे बड़े विरोधाभास पर उंगली रखी है—यहाँ लोग अपनी माँ से तो असीम प्रेम का दावा करते हैं, पर अपनी मातृभाषा से द्रोह करते हैं! पशु-पक्षी भी अपनी माँ की बोली नहीं छोड़ते, और भारत के अन्य राज्यों (बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात) में लोग मातृभाषा को प्रथम स्थान देते हैं; किंतु मिथिला में लोग अपने ही सगे भाई-बंधुओं से दूसरी भाषाओं में बात कर गौरवान्वित होते हैं।
21. मैथिली – पूनम झा मैथिली
हम्मर अहाँक अभिमान मैथिली
आदिकालसँ पसरल चतरल
आई किया गुमनाम मैथिली ।
भूरुकवाक ललाम मैथिली
पुर्णिमा केर चान मैथिली
ऋतु वसंत के पांज हपाेसने
मास अगहनक धान मैथिली ।
सिया धिया के वाण मैथिली
धनुर्धर में श्रीराम मैथिली
माेहन मुरलीक तान मैथिली
सब केआे करु गुणगान मैथिली ।
अद्भुत अनुपम ज्ञान मैथिली
वेद ऋचा शास्त्र पुराण मैथिली
अपना के अप्पन जँ बुझब
लहलहयत सब ठाम मैथिली ।
काेशी कमला बलान मैथिली
मंडन जनकक दलान मैथिली
पान मखान स्वर्गाे नय भेटय
सब मैथिलक गुमान मैथिली ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): पसरल-चतरल = विस्तृत रूप से फैला हुआ; भूरुकवा = भोर का तारा (शुक्र तारा); ललाम = सुंदर/श्रेष्ठ; अगहनक धान = अगहन मास की पकी हुई धान की फसल।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कवयित्री पूनम झा 'मैथिली' ने अपनी इस संगीतमय रचना में मैथिली को प्रकृति के सुंदरतम बिंबों से सजाया है। मैथिली भोर के तारे की आभा है, पूर्णिमा का चाँद है और अगहन महीने में लहलहाते धान की खुशबू है। कवयित्री कहती हैं कि यदि हम बस 'अपने को अपना समझ लें', तो मंडन मिश्र और राजर्षि जनक की यह भाषा हर जगह पुनः लहलहा उठेगी (मिथिला के धिया सिया गीत का अर्थ यहाँ पढ़ें)।
खंड 4: बदलता गाँव, अस्मिता की रक्षा और गंगा-जमुनी तहजीब (कविता 22 से 28)
अंतिम सात रचनाओं में मैथिली काव्य की परिपक्वता अपने शिखर पर दिखाई देती है। रुपा धीरु की प्रतीकात्मक लोक-कथा शैली, विजय दत्त मणी और विजेता चौधरी का राजनीतिक प्रतिरोध, विभूती आनन्द द्वारा वैश्वीकरण से बदलते मैथिल गाँव का समाजशास्त्रीय पोस्टमार्टम, और शेख शब्बीर अहमद 'जख्मी' व हृदय नारायण यादव की समरसता—ये सभी कविताएँ मैथिली को विश्व-साहित्य के समकक्ष खड़ा करती हैं।
22. कदमक गाछ आ दादी – रुपा धीरु
बड़ सख स' रोपने रहै
पोखरिक पुबरिया महारपर
ओ कदमक गाछ
आ हमरा दादीके बड़
सेहन्ता रहै
जेठक दुपहरियामे जुड़ेबाक
अपना तुरियाक सँग
आ फदका करबाक
कदमक शीतल छाहरिमे
मुदा जहिया एलै जुड़ेबाक दिन
हमर दादीकें
तइ स' पहिने
एकटा अजोध नगिनियाँ
बास ल' लेलकै
कदमक जड़िमे
आब त' हमरा दादी
दीनोदेखार डेराइ छै
कदमक तर जाइस'।
मुदा हे हमर दादी
जेहने शुद्धंग छै
तेहने पीताहियो छै
जहिया पीत उठतै बुढियाके
तहिया ढारि देतै धीपले धीपल माड़
नगिनियाँक बीलमे
उपटा देतै हमर दादी
नगिनियाँक बसोबासकें
आ खुशफैल स' फदका करतै
हमर दादी
कदमक शीतल छाहरिमे
तोरि तोरि खेतै हमर दादी
घुघरू मट्ठासन लटकल
पीयर कपेस
कदमक फर।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): सख स' = शौक से; महार = तालाब का ऊँचा किनारा/भिंडा; सेहन्ता = साध/इच्छा; जुड़ेबाक = शीतलता पाने का; तुरिया = हमउम्र सहेलियाँ; फदका = हँसी-ठिठोली/गपशप; अजोध नगिनियाँ = विशाल नागिन; दीनोदेखार = दिनदहाड़े; शुद्धंग = सीधी-सादी; पीताहियो = क्रोधी/स्वाभिमानी; धीपले-धीपल माड़ = खौलता हुआ चावल का माड़; कपेस = गेरुआ/पीलापन लिए हुए।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कवयित्री रुपा धीरु की 'कदमक गाछ आ दादी' ठेठ मैथिली मुहावरों और उच्च कोटि के राजनीतिक-सांस्कृतिक रूपक (Allegory) का अद्भुत नमूना है। दादी ने बड़े जतन से तालाब के पूर्वी किनारे पर कदंब का पेड़ (अपनी संस्कृति व भाषा-रूपी छाँव) लगाया था ताकि जेठ की दुपहरी में सहेलियों संग उसकी शीतल छाया में बैठ सकें। किंतु छाया मिलने से पहले ही उसकी जड़ में एक जहरीली नागिन (बाहरी भाषाई-राजनीतिक अतिक्रमण) ने डेरा जमा लिया। कवयित्री चेतावनी देती हैं कि हमारी दादी जितनी सीधी हैं, उतनी ही स्वाभिमानी भी—जिस दिन उनका पित्त (क्रोध) भड़केगा, वे खौलता हुआ माड़ बिल में डालकर उस नागिन का अतिक्रमण उखाड़ फेंकेंगी और पुनः कदंब की छाँव में स्वतंत्र होकर बैठेंगी।
23. अस्मिताक रक्षा – विजय दत्त मणी
अपने पएरमे कुल्हाडि मारि रहलछी।।
लोक कहैछ देखु कान लगेल कौवा
कान छोडि कौवा खेहारि रहलछी।
अपन गराकेर सुझि रहल घेघ नहि
दोसरके टेटर निहाँरि रहलछी।।
ममोरैछी मान हम अपनेसऽ अपनाके
छिटकी लगाकऽ पछारि रहलछी।
बुद्धिके बखारीमे लागल दिवार जे
अपन घर अपने उजारि रहलछी।।
बाँकी रहल शेष सम्पति जतेक
बाढैन लए ओकरो बढारि रहलछी।
करब की रक्षा अस्मिता,पहिचानके
चुल्हामे धऽकऽ पजारि रहलछी।।
मैथिलीसँ हटिकऽ मगहीमे सटिकऽ
भाषाके दशा गुजारि रहलछी।
आनकेर इज्जति बढाबैछी शानसऽ
आ अपन धग्गी उघारि रहलछी।।
प्रतिष्ठा,पद,पाइ पाबि जे कहुना
लोभ लेल सबटा सकारि रहलछी।
रग रगमे बहैत सोनित अइ जकर
ओहि सम्बन्धके नकारि रहलछी।।
जकर दूध पीव भेल धाकरसन काया
ओकरे करेज कोँढ फारि रहलछी।
अपने सहोदर अछि बनल बेमातर
तैँ त लडाइ हम हारि रहलछी।।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): फुसिएके अइन = झूठी अकड़/शेखी; खेहारि = पीछा करना; घेघ = घेंघा रोग (बड़ा दोष); टेटर = आँख का छोटा दाना; छिटकी = अड़ंगी/टाँग अड़ाना; बखारी = अनाज की कोठी; दिवार = दीमक; बाढैन = झाड़ू; पजारि = जलाना; बेमातर = सौतेला/पराया।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: विजय दत्त मणी ने मैथिल समाज के आंतरिक दोषों—आपसी ईर्ष्या, टाँग-खिंचाई ('छिटकी लगाकऽ पछारब') और पद-पैसे के लोभ में अपनी अस्मिता बेचने की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार किया है। कवि लोक-मुहावरों का प्रयोग करते हुए कहते हैं कि बुद्धि की बखारी में दीमक लग गई है; लोग अपने गले का घेंघा देखने के बजाय दूसरों की आँख का तिनका देख रहे हैं। जब अपने ही सहोदर भाई आपस में सौतेले बन गए हैं, तो हम अस्मिता की लड़ाई कैसे जीतेंगे?
24. भाषाक विखण्डनमे तैनात सिपाही ! – विजेता चौधरी
सहि सकैत छी बरू विष्फोट
बरू अागि
मुदा किन्नहुँ नहि सहब
विखण्डन अा अन्याय
मातृभाषाक विखण्डनमे तैनात
नवका राजाक नवका सिपाहीसभ!
खबरदार!
जाहि एकताकेँ
खण्ड-खण्डमे बाँटि
ताेँ कऽ रहल छह
भाषाक राजनीति
से स्मरण रहय
चत्तुर बेंग
कतबाे फूदकतै
तँ एक्कहि बीत
मिथिला प्रान्तकेँ
कमजाेर बनबैलए
ताेँ जे कऽ रहल छह
बड़-बड़ किरदानी
अा नचा रहल छह
पटमूर्ख माेहरासभकेँ
से चेति जाह
कहिं एना ने हुअए
जे ताेहर मस्तककेर
नवका श्रीपेच उतारिकऽ
मैथिल जनता
खेदि अाबय शरहद पार
अाे दिन दूर नहि छैक ।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): किन्नहुँ नहि = किसी भी कीमत पर नहीं; बेंग = मेंढक; किरदानी = कारस्तानी/षड्यंत्र; श्रीपेच = राजमुकुट।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: कवयित्री और पत्रकार विजेता चौधरी की यह कविता भाषा की आड़ में मिथिला को खंड-खंड बाँटने वाली राजनीतिक शक्तियों को सीधी चेतावनी देती है। 'नए राजा के नए सिपाहियों' को ललकारते हुए कवयित्री कहती हैं कि हम आग और विस्फोट सह सकते हैं, पर मातृभाषा का विखंडन कभी नहीं सहेंगे। चतुर मेंढक चाहे जितना भी फुदक ले, उसकी छलाँग एक बालिश्त से अधिक नहीं होती; यदि भाषा-विखंडन का यह षड्यंत्र नहीं रुका, तो जागरूक मैथिल जनता सत्ता का यह नया मुकुट (श्रीपेच) उतार फेंकेगी।
25. मैथिल वीर सेनानी! – विन्देश्वर ठाकुर
प्रगती पथपर नइँ रुकबै
आबै केहनो बाधा-अड़चन
सफल होब'सँ नइँ चुकबै
किएकी हम
मैथिल वीर सेनानी छी।
सदिखन देशक सेवा करबै
देशहि लेल जिबै मरबै
आबै केहनो अन्हड़ि-बिर्रो
साँच कहैछी नइँ डरबै
किएकी हम-
मैथिल वीर सेनानी छी।
गहुमन, कोब्रा आ की कोनो
विषधरसँ नइँ कम छियै
माताके अस्तित्व रक्षा लेल
बुझू जे नरसिंह हम छियै
नाहकमे ककरो नइँ टेरबै
किएकी हम-
मैथिल वीर सेनानी छी।
छै करिया बादल लागल
शीघ्रहि ओकरो हटादेबै
मैथिलीक झन्डा चहुँओर
फर फर फर फर फहरादेबै
किएकी हम-
वीर मैथिल सेनानी छी
कठिन शब्दार्थ (Glossary): अन्हड़ि-बिर्रो = आँधी-तूफान; गहुमन = गेहुँअन साँप (नाग); नाहकमे = अकारण/बिना वजह; टेरबै = छेड़ेंगे/ललकारेंगे।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: विन्देश्वर ठाकुर का यह शौर्य-गीत युवाओं में आत्मविश्वास और अदम्य साहस का संचार करता है। कवि कहते हैं कि एक सच्चा मैथिल सेनानी अकारण किसी को नहीं छेड़ता ('नाहकमे ककरो नइँ टेरबै'), किंतु जब माता और मातृभाषा के अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न आता है, तो वह नरसिंह अवतार के समान उग्र हो जाता है और काले बादलों को चीरकर मैथिली का ध्वज चारों दिशाओं में फहराता है।
26. गाम, गामकेँ एहिना जोगबैए – विभूती आनन्द
ओ गाम नहि अछि
देखू कोना करोट फेरैए
भनसाघरमे
जारनि नहि, गैस जरैए
नीक लगैए से आब–
गाममे आब बैलगाड़ी नहि,
मोटर-गाड़ी चलैए
कटनी नहि, दाउन नहि
दलानपर खरिहान नहि
बड़द-महींस नहि,
थ्रेसर चलैए, सभ 'सुधा' पिबैए
उपटि गेल जंगल-झार
मुल्की चिड़ै, जीब-जन्तु सहित
पक्षी अभयारण्यमे शिकार होइए
आब शेष गृहस्थ
सेहो बनियाँ-मन जीबैए
आमक नवगछुली, आ
परतीमे पोखरि सन पनिझाव खुनबा
पैकार हाथे
सालक-साल लेल बेचि लेल जाइए
गाम मन सेहो आब 'बजार' बुझैए
आ से
शहरे नहि, गामोमे
'इन्वेस्ट'क प्रति लिप्सा बढ़ि रहलैए
दूरदराज फोरलेनक निकट
रहरहाँ जमीन किनल जाइए
से अपना लेल नहि,
पोता-परपोता लेल एखनो जोगबैए
पोती-परपोती एखनो हिस्साविहीन रहैए
गाम आब
ओ गाम नहि अछि
गाम मे आब बहुत किछु अछि–
सभक हाथ एंड्रॉयड फोन अछि
लैपटॉप आ रंगबिरही कोचिंग अछि
जीवनक सतरंगी सपना उड़ियाइए गामोमे
गाम आब
बाबा-परबाबाक गाम नहि रहल
हरिसिंहदेव नहि रहला मान्य आब
गाम-गाम 'पंजी'क पर्चा-पर्चा उड़ि रहलय
अंतर्जातीय संबंध मुखर अछि एमहर सेहो
गामक मुखाकृतिमे निखार अछि
चेहरा बदलल, बदलि रहल अछि सोच
ओना बूढ़-सूढ़ बेसी गाम सेबने छथि
आ देश-परदेस जीबैत संतति लेल
कबुला-उपास करैत छथि
छठि करैत छथि, चौरचन करैत छथि
सिमरिया नहाइत छथि सधवा-विधवा
दसमीमे दुर्गास्थान जाइत छथि
आ से
संततिकें एही बले
कुशक कलेप नहि लगैत छनि,
से सोचैत जीबैत छथि गामक जनीजाति
फूसक घर कमलैए
कोठापर कोठा चढ़लैए
मुदा दुख एतबय जे
लोक घरघुसना भेल जाइए,
गामोमे गामक संबंध सँ कटैए
गाममे आब बेसीतर घरारी पर
साँझो नहि पड़ैए, कुकुरो नहि कनैए !
गाम आब एहिना जीबैए
परिवर्तनकें अकानैत पियास उराहैए
ओना राजनीति
अपना बाटपर अछि
प्रपंच अपना ठामपर अछि
लोक तनावमे अधिक रहैए,
तैयो अपन सेखीकें नहि छोड़ैए
मुदा गाम सन,
गाम नहि जीबैए
नचारी-महेसबानी नहि
सोहर-बटगबनी-पराती नहि
रेकर्डेड गीतक संग
परम्पराक झाँसि छिटने
मंच तोड़ैए जट-जटिन, झिझिया
आ आयातित गीतपर लचक'बैए डाँर
गाम तैयो जीबैए
से गाम आब
गामकें एहिना क' जोगबैए...
कठिन शब्दार्थ (Glossary): करोट फेरैए = करवट बदल रहा है; भनसाघर = रसोईघर; जारनि = जलावन की लकड़ी; दाउन = बैलों से अनाज की दँवनी; पैकार = थोक व्यापारी/बिचौलिया; कबुला-उपास = मन्नत और उपवास; जनीजाति = स्त्रियाँ; घरारी = आवासीय भूखंड; साँझो नहि पड़ैए = शाम का दिया भी नहीं जलता (पलायन के कारण सूने घर)।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: वरिष्ठ कथाकार व कवि विभूती आनन्द की 'गाम, गामकेँ एहिना जोगबैए' आधुनिक मैथिली साहित्य की एक मील का पत्थर (Milestone) कविता है। यह कविता बिना किसी एकतरफा भावुकता के बदलते हुए मैथिल गाँव का समाजशास्त्रीय एक्स-रे प्रस्तुत करती है। रसोई में जलावन की जगह गैस आ गई है, बैल-भैंस की जगह पैकेटबंद 'सुधा' दूध आ गया है, और हरिसिंहदेव की प्राचीन 'पंजी' व्यवस्था टूटकर अंतर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं। किंतु इस भौतिक प्रगति के बीच तीन गहरी त्रासदियाँ भी हैं: (1) फोरलेन के पास पोते-परपोतों के लिए जमीन खरीदी जा रही है पर पोतियाँ आज भी हिस्से से वंचित हैं, (2) पक्के मकान (कोठा) तो बन गए हैं पर पलायन के कारण अधिकांश घरारियों पर शाम को दिया भी नहीं जलता और बूढ़े माता-पिता परदेस में बसे बच्चों की सलामती के लिए छठ व चौरचन कर रहे हैं, और (3) पारंपरिक नचारी, महेशवाणी, सोहर की जगह भोंपू पर आयातित रिकॉर्डेड गीत बज रहे हैं।
27. मिथिला देश निवासी हम – शेख शब्बीर अहमद 'जख्मी'
मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा
पहिरिकऽ उज्जर बर्फक कम्मल
उत्तर ठाढ़ हिमालय छै
दक्षिण दिशामे पतित पावनी
गंगा नदी विराजै छै
मधुर मनोहर मुहकेर बोली, ढेओरल नीपल बासा
मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा
पहिरन लोकक साँची धोती
पाग दोपट्टा अंगा
गंगासँ हिमगिरिधरि पसरल
केन्द्रस्थल दरभंगा
भादो रिमझिम ताल सुनाबए, देखबए साओन तमासा
मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा
ककरो जीपर अल्ला
अथवा रामक नाम छै
केओ रमौने धूनी चट्टा
पाकड़ि तऽर अविराम छै
मन्दिरमे परसादी भेटए मस्जिदमे बतासा
मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा
मिथिला देश सदासँ रहलै
भेदभावसँ दूर
मुल्ला–पण्डित सभ रहै छथि
परम्परा मशहूर
गीत मैथिली सुनबथि जख्मी साजि मनक अभिलाषा
मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा
कठिन शब्दार्थ (Glossary): उज्जर = उजला/सफेद; कम्मल = कंबल; ढेओरल नीपल बासा = मिट्टी और गोबर से लीपा-पुता स्वच्छ घर; पाग-दोपट्टा-अंगा = मिथिला का पारंपरिक परिधान; जीपर = जिह्वा (जुबान) पर।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: शेख शब्बीर अहमद 'जख्मी' का यह कालजयी गीत मिथिला के भूगोल (उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में गंगा तक और केंद्र में दरभंगा) तथा यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे सुंदर उद्घोष है। कवि गर्व से ढोल और ताशे की चोट पर कहते हैं कि यहाँ किसी की जुबान पर अल्लाह का नाम है तो किसी की जुबान पर राम का; यहाँ मंदिर में प्रसादी मिलती है और मस्जिद में बताशा—और मुल्ला हों या पंडित, दोनों को जोड़ने वाली एक ही डोर है: "मिथिला देश निवासी छी हम, मैथिली हमर भाषा।"
28. गजल (हम्हु करबै माए'क बोलीके गुनगान रे मीता) – हृदय नारायण यादव
दुनियाँक नजरिमे बढत हमरो शान रे मीता।
बनि जनक दुलारी जन्म लेलीह धीया सीया,
बढिगेल मिथिलाक नतबासँ रामक शान रे मीता।
जन्म लेलन्हि जे हमर मातृभूमिमे ज्ञानी-मुनी,
बटलनि जग सगर सर्वश्रेष्ठ-अनमोल ज्ञान रे मीता।
मातृभाषा-मैथिली, जोड्बै दुनियाँकेर भूगोलसँ
हासिल करब विश्वमे सर्वोच्च सम्मान रे मीता।
गढ़लनि जे अप्पन माटिसँ सुन्दर हमर ई तन-मन,
माँ मिथिला 'हृदय'क सबसँ पैघ भगवान रे मीता।
कठिन शब्दार्थ (Glossary): मीता = मित्र/सखा; धीया सीया = पुत्री सीता; नतबासँ = रिश्तेदारी/संबंध से; पैघ = बड़ा।
भावार्थ एवं साहित्यिक समीक्षा: हृदय नारायण यादव की यह सुमधुर ग़ज़ल इस महा-संकलन को एक आशावादी और वैश्विक शिखर पर पहुँचाती है। कवि अपने मित्र (मीता) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मिथिला के साथ रिश्तेदारी जुड़ने से स्वयं प्रभु श्रीराम की शान भी बढ़ गई थी। जिस मातृभूमि ने अपने मिट्टी-पानी से हमारा यह सुंदर तन-मन गढ़ा है, वह माँ मिथिला ही हमारे लिए सबसे बड़ी भगवान है, और हम अपनी मातृभाषा मैथिली को विश्व के भूगोल से जोड़कर उसे सर्वोच्च सम्मान दिलाएंगे।
Watch the Visual Breakdown: मैथिली कवि सम्मेलन एवं काव्य-पाठ
मैथिली कविता की वाचिक परंपरा और मंच पर उसकी जीवंत प्रस्तुति का अनुभव करने के लिए नीचे दिया गया विशेष मैथिली कवि सम्मेलन वीडियो देखें:
निष्कर्ष: मातृभाषा ही हमारी सांस्कृतिक अमरता है
इन 28 कालजयी मैथिली कविताओं और ग़ज़लों के गहन विश्लेषण से यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाता है कि मैथिली केवल अतीत के गौरवगान की भाषा नहीं है, बल्कि यह वर्तमान के सामाजिक यथार्थ, हाशिए के समाज की संवेदना और भविष्य के वैज्ञानिक-डिजिटल युग की भी समर्थ भाषा है। जैसा कि हिन्दवी के मैथिली काव्य-कोश और अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के संकलनों में भी परिलक्षित होता है, जब भारत और नेपाल के दोनों ओर के रचनाकार एक स्वर में अपनी मातृभाषा के लिए कलम उठाते हैं, तब कोई भी राजनीतिक या बाजारवादी आँधी इस भाषा की जड़ों को हिला नहीं सकती।
साहित्यशाला (Sahityashala) का यह निरंतर प्रयास है कि मिथिला की वाचिक और लिखित साहित्यिक धरोहर को सर्वोच्च गुणवत्ता और गहन अर्थ के साथ विश्व पटल पर संरक्षित किया जाए। इन 28 कविताओं में से किस कवि की पंक्तियों ने आपके हृदय को सबसे अधिक छुआ? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी प्रिय पंक्तियाँ और विचार अवश्य साझा करें!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Maithili Poems & Ghazals)
1. मातृभाषा मैथिली पर सबसे प्रसिद्ध समकालीन कविताएँ कौन-सी हैं?
समकालीन मैथिली साहित्य में मातृभाषा और सामाजिक समावेश पर मनोरञ्जन झा की 'मैथिलीकेँ नइँ बान्हियौ', देवेन्द्र मिश्र की 'ई सभक मैथिली', धीरेन्द्र प्रेमर्षि की 'प्रेमक सीमा', राजेन्द्र विमल की ग़ज़ल 'सोनितमे कलम' और गजेन्द्र गजुर की 'कोना बिसरि सकबै?' सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली रचनाएँ मानी जाती हैं।
2. 'मैथिलीकेँ नइँ बान्हियौ' कविता का मुख्य संदेश क्या है?
कवि मनोरञ्जन झा द्वारा रचित इस प्रसिद्ध कविता का मुख्य संदेश भाषा का लोकतंत्रीकरण है। कवि का कहना है कि मैथिली को केवल कुछ उच्च जातियों के दलानों तक सीमित न रखकर कामगार वर्ग, किसानों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के आँगन तक सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिए, तभी मैथिली का परचम आकाश में लहराएगा।
3. मैथिली साहित्य के आदिकवि और आधुनिक युग के प्रमुख कवि कौन हैं?
मैथिली साहित्य के सर्वोच्च स्तंभ 'मैथिल कोकिल' महाकवि विद्यापति हैं। आधुनिक युग में चंदा झा, वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (नागार्जुन), हरिमोहन झा, आरसी प्रसाद सिंह, राजकमल चौधरी, मणपद्म, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि और विभूती आनन्द प्रमुख हस्ताक्षर हैं।
4. मैथिली ग़ज़ल परंपरा की मुख्य विशेषता क्या है?
मैथिली ग़ज़ल ने उर्दू के क्लासिकल बहर और काफिया-रदीफ के अनुशासन को मिथिला की ठेठ शब्दावली, लोक-मुहावरों और सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के साथ जोड़ा है। राजेन्द्र विमल, मो. अशरफ राईन और हृदय नारायण यादव की ग़ज़लें इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
5. अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) का मैथिली भाषा आंदोलन में क्या महत्व है?
21 फरवरी को यूनेस्को द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर भारत (बिहार-झारखंड) और नेपाल (मधेश प्रदेश) में मैथिली साहित्यकारों द्वारा बड़े पैमाने पर कवि गोष्ठियों और भाषा-जागरूकता अभियानों का आयोजन किया जाता है, जिसमें प्राथमिक शिक्षा और प्रशासनिक कार्यों में मैथिली को लागू करने की माँग उठाई जाती है।
6. रंगकर्मी रञ्जु झा कौन थीं, जिन पर रमेश रञ्जन ने कविता लिखी है?
रञ्जु झा मिथिला की एक सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और अभिनेत्री थीं, जो अप्रैल 2012 में नेपाल के जनकपुर (रामानंद चौक) में मिथिला राज्य और मैथिली भाषा के अधिकारों के लिए चल रहे शांतिपूर्ण धरने के दौरान हुए बम विस्फोट में शहीद हो गई थीं।
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