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मिथिला के धिया सिया (Mithila Ke Dhiya Siya) Lyrics & Meaning

मिथिला की मिट्टी में ऐसा क्या है जो इसे इतना पावन बनाता है?

मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र या नक्शे पर खींची गई लकीर नहीं है; यह एक जीवंत, धड़कती हुई भावना है। जब भी प्राचीन मिथिला के आम के बगीचों से हवा गुजरती है, तो वह इस मिट्टी की सबसे लाडली बेटी—माता जानकी (सीता) का नाम गुनगुनाती है। मैथिली साहित्य और संगीत का संसार भक्ति से भरा पड़ा है, लेकिन कभी-कभी कोई ऐसी रचना सामने आती है जो केवल कानों को नहीं सुनती, बल्कि सीधे आत्मा में उतर जाती है।

"मिथिला के धिया सिया" (Mithila Ke Dhiya Siya) एक ऐसी ही अमर और अलौकिक रचना है। सुरीले गायक विकाश झा की आवाज़ और मैथिली पुत्र प्रदीप की शानदार लेखनी से सजा यह गीत एक साधारण भजन की सीमाओं को लांघ जाता है। यह मिथिला की भौगोलिक भव्यता, आध्यात्मिक दिव्यता, और शिव-पार्वती तथा सीता-राम के उन शाश्वत संबंधों की एक काव्यात्मक यात्रा है जो हमारी जड़ों में बसे हैं।

आइए, इस दिव्य गीत के बोल, इसके गहरे अर्थ और मिथिला के हृदय को करीब से महसूस करें।

Ethereal digital art of Goddess Sita in traditional Maithili bridal attire for Mithila Ke Dhiya Siya lyrics
माता जानकी का दिव्य स्वरूप—मिथिला की वह लाडली बेटी जिसकी महिमा ने इस धरती को "सुरधाम" (स्वर्ग) बना दिया।

🎵 गीत के मुख्य तथ्य (Song Credits & Details)

इससे पहले कि हम इस कविता की गहराई में उतरें, उन श्रोताओं के लिए गीत का संक्षिप्त विवरण यहाँ है जो इस आध्यात्मिक रत्न को अपनी प्लेलिस्ट में शामिल करना चाहते हैं:

  • गीत का नाम: मिथिला के धिया सिया (Mithila Ke Dhiya Siya)
  • गायक: विकाश झा (Vikash Jha)
  • गीतकार: मैथिली पुत्र प्रदीप (प्रभुनारायण झा)
  • रिलीज़ वर्ष: 2020
  • भाषा: मैथिली
  • ऑनलाइन सुनें: JioSaavn पर सुनें

📜 मिथिला के धिया सिया - संपूर्ण गीत (Maithili Lyrics)

मिथिला के धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे
मिथिला कें धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे

धन्य मिथिक भूमि धर धर रिषि मुनि
दुल्हा जगतपति राम हे
मिथिला कें धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे

कमला बहथि जतए जीवछ रहथि ततए
कोशी गंगा गंडक के बथान हे
मिथिला कें धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे

हिम-गिरि केर घर गौरीक नइहर
शिवजी भेलाह मेहमान हे
मिथिला कें धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे

जज्ञ सं तपल एकर कण कण शुचि शुचि
प्रदीपक जन्मस्थान हे
मिथिला कें धिया सिया जगत जननि भेली
धरणि बनल सुरधाम हे

Cinematic landscape of ancient Mithila rivers and sages representing Maithili Lokgeet
"कमला बहथि जतए जीवछ रहथि ततए" — पवित्र नदियों और महान ऋषियों की तपस्या से सिंचित मिथिला की पावन भूमि।

✍️ भावार्थ एवं काव्यात्मक सौंदर्य (Deep Meaning & Essence)

कवि मैथिली पुत्र प्रदीप की इस रचना की सबसे बड़ी सुंदरता यह है कि यह मिथिला के भूगोल, आध्यात्म और सांस्कृतिक गौरव को एक ही धागे में पिरो देती है:

  • जगत जननी का मायका: प्रारंभिक पंक्तियाँ ही यह उद्घोष करती हैं कि चूँकि मिथिला की बेटी पूरे ब्रह्मांड की माता बनीं, इसलिए यह लौकिक धरती देवताओं के निवास (सुरधाम) में बदल गई। जब भी हम सीताराम की इस अलौकिक जोड़ी की बात करते हैं, तो हमें स्वतः ही जेहने किशोरी मोरी तेहने किशोर हे जैसी कालजयी रचनाओं का स्मरण हो आता है, जो उनके शाश्वत प्रेम का प्रतीक हैं।
  • पवित्र नदियों का संगम: इस गीत में बिहार और मिथिला की जीवनदायिनी नदियों—कमला, कोसी, गंडक और गंगा—का बेहद सुंदर वर्णन है। इस भूमि की यही जीवंतता हमारी संस्कृति को रंगों से भर देती है, जिसकी गूंज आधुनिक लोकगीतों जैसे रंगीला ई बिहार भ गेले में भी स्पष्ट सुनाई देती है।
  • शिव-पार्वती का शाश्वत संबंध: मिथिला केवल राम और सीता की भूमि नहीं है; यह शिव और माता गौरी का भी उतना ही अपना क्षेत्र है। जिस प्रकार हम माता सीता की वंदना करते हैं, उसी प्रकार मिथिला की शिव-भक्ति पारंपरिक 'महेशवाणी' में झलकती है। विद्यापति की रचना चन्द्रमुखी सन गौरी हमर छैथ और हृदय को झकझोर देने वाले गीत बाबा बैद्यनाथ हम आयल छी भिखरिया में आप इसी भक्ति को महसूस कर सकते हैं। यहाँ भगवान शिव सदैव एक पूजनीय अतिथि (मेहमान) के रूप में पूजे जाते हैं।
  • दिव्य दूल्हे का उल्लास: भगवान राम का दूल्हे के रूप में आगमन मिथिला की पहचान का एक केंद्रीय विषय है। यह गीत मैथिली शादियों के उस उल्लासपूर्ण और चुटीले माहौल (परिछन) की याद दिलाता है, जिसे चलू चलू चलू काकी जैसे पारंपरिक गीतों में खूबसूरती से पिरोया गया है।
  • महान कवियों की पावन भूमि: कवि अंत में यह घोषणा करते हैं कि इस मिट्टी का कण-कण पवित्र (शुचि) है, जो महान लेखकों और कवियों की जन्मस्थली है। मैथिली साहित्य की इस समृद्ध परंपरा को महाकवि विद्यापति जैसे अमरों ने सींचा है, जिन्होंने हमें पहिलें बदरी कुच पुन नवरंग जैसी प्रकृति और प्रेम से ओत-प्रोत रचनाएँ दी हैं। इस गीत के रचनाकार बड़े ही गर्व के साथ उसी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

🎥 इस अलौकिक गीत को यहाँ सुनें

🤔 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: "मिथिला के धिया सिया" गीत के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: "मिथिला के धिया सिया" के बेहद खूबसूरत और भावपूर्ण बोल प्रसिद्ध मैथिली कवि मैथिली पुत्र प्रदीप (प्रभुनारायण झा) द्वारा लिखे गए हैं।
प्रश्न: इस गीत को अपनी आवाज़ किसने दी है?
उत्तर: इस जादुई मैथिली गीत को 'विकाश झा' ने अपनी मधुर आवाज़ दी है, जो मिथिला क्षेत्र की भक्ति और सार को पूरी तरह से जीवंत कर देता है।
प्रश्न: इस गीत का मुख्य भावार्थ क्या है?
उत्तर: यह गीत मुख्य रूप से मिथिला की पावन भूमि की वंदना करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे माता सीता के जन्म ने मिथिला को धरती पर स्वर्ग बना दिया, और कैसे भगवान राम दूल्हे के रूप में तथा भगवान शिव शाश्वत अतिथि के रूप में इस भूमि से जुड़े हुए हैं।

मैथिली साहित्य और संस्कृति की आत्मा का संरक्षण

"मिथिला के धिया सिया" केवल कुछ संगीतमय धुनों का मेल नहीं है; यह हमारी सांस्कृतिक विरासत की धड़कन है। यह हमें याद दिलाता है कि हम कौन हैं, हमारी जड़ें कहाँ हैं, और हमारी इस पवित्र भूमि पर किस ईश्वरीय कृपा का पहरा है। इन गीतों को पढ़ने, साझा करने और समझने से ही हम मिथिला की इस गौरवशाली परंपरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रख सकते हैं।

क्या इस गीत ने आपके हृदय के तारों को झंकृत किया? इस पोस्ट को अपने प्रियजनों के साथ साझा करें और मिथिला के गौरव की गूंज को हर दिशा में फैलने दें!

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