महाकवि विद्यापति : शिव नचारी (एत जप-तप)
कल्पना कीजिये उस माँ की पीड़ा की, जिसने अपनी कोमल पुत्री के लिए राजकुमार सोचा था, पर द्वार पर भस्म रमाये, सर्पों की माला पहने एक जोगी आ खड़ा हुआ।
यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि लोक-व्यवहार और अध्यात्म का द्वंद्व है। 'मैथिल कोकिल' विद्यापति की यह प्रसिद्ध 'शिव नचारी' उसी वात्सल्य और चिंता का मर्मस्पर्शी चित्रण है। आइये, इस रचना का मूल पाठ, अंग्रेजी लिप्यंतरण (Lyrics) और सरल हिंदी भावार्थ पढ़ते हैं।
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| The Ascetic Shiva: A Mother's Worry |
शिव नचारी (Maithili Lyrics)
एत जप-तप हम की लागि कयलहु,
कथि लय कयल नित दान।
हमर धिया के इहो वर होयताह,
आब नहिं रहत परान।
नहिं छनि हर कें माय-बाप,
नहिं छनि सोदर भाय।
मोर धिया जओं ससुर जयती,
बइसती ककरा लग जाय।
घास काटि लऔती बसहा च्रौरती,
कुटती भांग–धथूर।
एको पल गौरी बैसहु न पौती,
रहती ठाढि हजूर।
भनहि विद्यापति सुनु हे मनाइनि,
दिढ़ करू अपन गेआन।
तीन लोक केर एहो छथि ठाकुर
गौरा देवी जान।
Shiv Nachari Lyrics (Hinglish)
(For those who read Maithili in English script)
Eta jap-tap hum ki laagi kayalhu,
Kathi lay kayal nit daan.
Hamar dhiya ke iho var hoytah,
Aab nahi rahat paraan.
Nahi chhani Har ken Maay-Baap,
Nahi chhani sodar bhaay.
Mor dhiya jao sasur jayati,
Baisati kakra lag jaay.
Ghaas kaati lauti basaha chaurti,
Kutti bhaang-dhathoor.
Eko pal Gauri baisahu na pauti,
Rahti thadhi hajoor.
Bhanahi Vidyapati sunu he Manaini,
Didh karu apan gyaan.
Teen lok ker eho chhathi Thakur,
Gaura Devi jaan.
कविता का सरल हिन्दी भावार्थ (Meaning in Hindi)
प्रसंग (Context): यह 'नचारी' विधा है, जिसमें भक्त शिव की लाचारी या उनके अजीब स्वरूप का वर्णन करता है। यहाँ माता मैना (पार्वती की माँ) शिव को दूल्हे के रूप में देखकर विलाप कर रही हैं।
भावार्थ:
- शुरुआती पंक्तियाँ: माता मैना कहती हैं—"मैंने इतना जप, तप और दान किसके लिए किया? यदि मेरी पुत्री (धिया) को ऐसा ही वर मिलना था, तो अब मेरे प्राण नहीं बचेंगे।"
- ससुराल की चिंता: वे कहती हैं कि शिव (हर) के न तो माता-पिता हैं और न ही कोई सगा भाई। मेरी बेटी जब ससुराल जाएगी, तो वह किसके पास बैठेगी? (उसका दुख सुनने वाला कोई नहीं होगा)।
- कठिन जीवन: उसे शिव के बैल (बसहा) के लिए घास काटनी पड़ेगी और दिन भर भांग-धतूरा कूटना पड़ेगा। मेरी कोमल गौरी को एक पल भी बैठने का चैन नहीं मिलेगा, वह सदा पति की सेवा में खड़ी रहेगी।
- निष्कर्ष: अंत में विद्यापति कहते हैं—"हे मनाइनि (मैना)! आप अपना ज्ञान दृढ़ करें (सत्य को पहचानें)। यह कोई साधारण योगी नहीं, बल्कि तीनों लोकों के स्वामी (त्रिभुवन ठाकुर) हैं और आपकी पुत्री साक्षात शक्ति (गौरी) हैं।"
यह भाव ठीक वैसा ही है जैसा हम विवाह गीतों में देखते हैं। यदि आप श्रृंगार रस की कविता पढ़ना चाहते हैं, तो पहिलें बदरी (Pahilen Badri) का अर्थ यहाँ पढ़ें।
कवि परिचय: विद्यापति (About the Poet)
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विद्यापति (Vidyapati) (1352–1448 ई.) को 'मैथिल कोकिल' कहा जाता है। वे मिथिला के राजा शिवसिंह के दरबारी कवि थे। उनकी रचनाएँ केवल श्रृंगार तक सीमित नहीं थीं; उन्होंने भक्ति साहित्य में भी अमिट छाप छोड़ी।
उनकी रचनाओं की गहराई को समझने के लिए, यह जानना आवश्यक है कि मैथिली साहित्य कैसे विकसित हुआ। विस्तृत जानकारी के लिए हमारा लेख Maithili Sahitya Structural Solutions अवश्य देखें।
Frequently Asked Questions (FAQ)
What is a 'Nachari' in Maithili literature?
'Nachari' is a devotional folk song dedicated to Lord Shiva. Unlike hymns that praise his power, Nachari often focuses on his unconventional lifestyle, his marriage, or a devotee's intimate complaints to him.
Why is this poem important for weddings?
In Mithila, songs like this (and Jagdamba Ghar Mein Diyara) are sung during wedding rituals to invoke the divine presence of Shiva and Parvati, reminding us that true love transcends physical appearance.
Where was Vidyapati born?
Vidyapati was born in the village of Bisfi in the Madhubani district of Mithila (Bihar). His contributions are pivotal to Indian cultural heritage.
Vidyapati’s Shiv Nachari reminds us that divinity often comes in disguises that challenge our social norms. Whether you are singing this at a wedding or studying it for academic research, the emotion remains timeless.
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