मैथिली साहित्य पर जे संकट आयल अछि, ओ केवल “पाठक कम भऽ गेल छथि” जेकाँ सतही समस्या नहि अछि। हम अपन पूर्व लेख (संकट विश्लेषण) में विस्तार सँ चर्चा केने रही जे कोना ई एकटा संरचनात्मक विफलता (Structural Failure) अछि।
लेखक समाज सँ कटि गेल छथि, पाठक साहित्य सँ, आ संस्था जमीन सँ। एहि कारणेँ समाधान सेहो भावुक नहि, संस्थागत, सामाजिक आ आर्थिक स्तर पर होय के चाही।
- अभिभावक: जे बच्चा कें मैथिली सिखबैत हिचकिचा रहल छथि।
- लेखक: जे पाठक कें अभाव सँ निराश छथि।
- संस्था: जे मैथिलीक भविष्य कें लऽ कऽ चिंतित छथि।
भाग 1: जे उपाय लोकप्रिय अछि, मुदा गलत अछि
पहिने ओ उपाय सभक आलोचना जरूरी अछि जे सुनय में नीक लगैत अछि, मुदा व्यवहार में निष्फल सिद्ध भेल अछि।
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| अतीत मोह: केवल प्राचीन पोथी आ नारा सँ वर्तमानक ताला नहि खुल्त। हमरा व्यवहारिक चाभी चाही। |
1. “जय मैथिली” अभियान: नारा, नीति नहि
सब सँ लोकप्रिय उपाय अछि— “मैथिली अमर अछि”, “मैथिली हमर पहचान”। मुदा नारा व्यवहार नहि बदलैत अछि। घर में बच्चा सँ हिन्दी/अंग्रेजी में बात होइत अछि, आ मंच पर मैथिली बचावे के भाषण। सत्य ई अछि जे भाषा पहचान सँ नहि, उपयोग सँ जीवित रहैत अछि।
2. केवल विद्यापति: संग्रहालयीय साहित्य
आम सुझाव देल जाइत अछि— “विद्यापति पढ़ाउ, पुरान साहित्य बचाउ”। विद्यापति महान छथि, मुदा आइ केर युवा सवाल पूछैत अछि— हमर बेरोजगारी, पलायन आ जाति-संघर्ष कहाँ अछि? जँ साहित्य जवाब नहि देत, तऽ पाठक कियँ रहत?
3. सरकारी मान्यता पर अति-निर्भरता
बहुत लोक मानैत छथि— “सरकार जँ चाहत तऽ मैथिली बचत”। मुदा सरकार भाषा के संरक्षण दे सकैत अछि, जीवन नहि। संस्कृत कें राज्य संरक्षण भेटल, मुदा समाजिक उपयोग शून्य अछि। भाषा मंत्रालय सँ नहि, घर सँ बचैत अछि।
भाग 2: वास्तविक समाधान – जे लागू हो सकैत अछि
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| घरक भाषा-नीति: 0-10 वर्ष धरि बच्चा सँ केवल मैथिली में संवाद, यहि सँ भाषाक नीव पड़ैत अछि। |
समाधान 1: घर के भाषा-नीति (Family Language Policy)
सब सँ बड़का, सब सँ सरल समाधान। नियम: 0–10 वर्ष धरि घर में केवल मैथिली संवाद। वैज्ञानिक आधार ई अछि जे द्विभाषिक/बहुभाषिक बच्चा बौद्धिक रूप सँ अधिक सक्षम होइत अछि। ई समाधान सस्ता अछि आ तत्काल लागू हो सकैत अछि।
समाधान 2: विषयवस्तु में क्रांति (Content Shift)
मैथिली साहित्य के विषय बदलय पड़त। आज जँ बाबा नागार्जुन जिंदा रहैत, तऽ ओ “बिहार के मजदूर”, “कोचिंग सिटी कोटा”, आ “रेलवे परीक्षा” पर लिखैत। भाषा बदलल नहि जाय, विषय बदलल जाय।
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| विषयवस्तु में बदलाव: जँ साहित्य आधुनिक जीवनक रस्ता पर नहि चलत, तऽ ओ धूर बनि जायत। |
समाधान 3: साहित्य के आर्थिक मॉडल
सब सँ उपेक्षित बिंदु—पैसा। लेखक जँ भुखाइल रहत, तऽ साहित्य शौक बनि जायत।
व्यवहारिक उपाय:
- डिजिटल सब्सक्रिप्शन (₹49–₹99)
- ई–बुक आ ऑडियो स्टोरी
- लोकल साहित्यिक कार्यक्रम (टिकट आधारित)
सत्य: मुफ्त साहित्य = उपेक्षित साहित्य।
समाधान 4: आलोचना के पुनर्स्थापना
आज मैथिली में आलोचना के मतलब अछि— “ई हमरा आदमी अछि, नीक लिखलक”। डर के साहित्य जिंदा नहि रहैत। खराब रचना के खराब कहल जाय आ वरिष्ठता नहि, गुणवत्ता मापदंड हो।
समाधान 5: डिजिटल मैथिली – अनुवाद नहि, मौलिकता
सब सँ गलत डिजिटल उपाय अछि— “हिन्दी लेख के मैथिली अनुवाद”। अनुवाद उपभोग्य नहि होइत, मौलिक अनुभव होइत अछि। इंस्टाग्राम पर मैथिली माइक्रो-कविता आ यूट्यूब पर विमर्श जरूरी अछि।
भाग 3: संस्था आ समाज के भूमिका
आज बहुत संस्था अछि, मुदा पाठक नहि बनबैत अछि। संस्था के काम केवल सम्मान देनाइ नहि, बल्कि स्कूल–कॉलेज में साहित्यिक क्लब खोलनाइ आ युवा लेखक के मेंटरशिप देनाइ होबाक चाही।
अंतिम निष्कर्ष: कड़वा, मुदा आवश्यक सत्य
मैथिली साहित्य के संकट भावना, भाषण या नारा सँ नहि, बल्कि नीति, व्यवहार आ ईमानदार आत्मालोचना सँ हल होयत।
“भाषा बचावे के मतलब भाषा पर रोना नहि, भाषा में जीना होइत अछि।”
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