मैथिली साहित्य आ भाषाक स्थिति पर बात करब आइ कनी जोखिम भरा अछि। हम सब 'जय मैथिली' केर नारा तऽ खूब लगाबैत छी, मुदा की हम कखनो ओहि मौन संकट के महसूस केने छी जे हमर भाषा के भीतर सँ खोखला कऽ रहल अछि?
मिथिलाक चित्रकला विश्व प्रसिद्ध भऽ रहल अछि—मिथिला पेंटिंगक इतिहास एतय गवाह अछि—मुदा साहित्यक पाठक वर्ग लुप्त प्रायः अछि।
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| पीढ़ीगत विच्छेद: जखन बुजुर्ग पोथी पढ़ैत छथि, मुदा नई पीढ़ी 'भाषिक लज्जा' केर कारण अपन जड़ि सँ कटि रहल अछि। |
ई आलेख कोनो विलाप नहि, बल्कि एकटा 'चेतावनी' (Warning) अछि। अतीत के गौरवगान सँ बाहर निकलि कऽ, आइ हम मैथिली साहित्य, समाज आ भविष्यक कठोर यथार्थ पर बात करब।
भाग 1: मैथिली साहित्य: गौरवशाली अतीत सँ ठहरल वर्तमान धरि
मैथिली साहित्य एखन जँ संकट में अछि, तऽ ई मानि लेल जाय कि ई संकट अचानक उत्पन्न नहि भेल अछि। ई संकट पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमा होइत रहल एकटा मौन, उपेक्षित आ असुविधाजनक यथार्थ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्य केर गौरवशाली अतीत पर जते-जते गर्व कएल जाइत अछि, ओतहि वर्तमान पर प्रश्न करनाय सँ हम सभ अकसर बचैत रहल छी।
मैथिली साहित्य केर इतिहास अत्यंत समृद्ध रहल अछि। ई भाषा राजदरबार सँ लऽ कऽ लोकचौपाल धरि अपन स्थान बनौने रहल। महाकवि विद्यापति केर पदावली प्रेम, भक्ति आ मानवीय अनुभूति केर उत्कृष्ट उदाहरण छथि। हुनक जीवनी आ रचनाक प्रभाव के बुझबाक लेल विद्यापति: जीवन आ रचना संसार पढ़नाय आवश्यक अछि।
आज जँ मैथिली साहित्य जीवित होइत, तऽ प्रश्न उठैत — आज केर मैथिल समाज कियँ ओहि साहित्य सँ जुड़ैत नहि अछि?
इतिहास: भाषा जखन जीवन छल
इतिहास साक्षी अछि जे मैथिली केवल “घरक भाषा” नहि छल। ई न्याय, दर्शन, प्रेम आ राजनीति केर भाषा रहल अछि। जार्ज ग्रियर्सन केर सर्वे (Survey of Maithili Literature) [Trusted Source] सेहो एहि बातक पुष्टि करैत अछि जे मिथिला क्षेत्र में संस्कृत, अवहट्ट आ मैथिली केर सह-अस्तित्व रहल, मुदा मैथिली अपन सहजता आ लोकसंवेदना के कारण जनसामान्य केर भाषा बनल।
वर्तमान: जखन साहित्य समाज सँ बात करनाइ छोड़ देलक
आज मैथिली साहित्य में जे लिखल जा रहल अछि, ओ मुख्यतः तीन श्रेणी में सीमित अछि:
- देव-केन्द्रित रचना (Devotional)
- भूतकालीन गौरवगान (Nostalgia)
- मैथिल श्रेष्ठता (Supremacy) केर आत्ममुग्ध आख्यान
ई तीनू मिलि कऽ एकटा रचनात्मक एकरसता (Creative Monotony) पैदा केने अछि। आज केर मैथिल युवा बेरोजगारी, पलायन, शहरी एकाकीपन, पहचान-संकट आ सांस्कृतिक विघटन सँ गुजरि रहल अछि। मुदा साहित्य ओहि यथार्थ के छूएत तक नहि।
“मैथिली अमर अछि” — ई वाक्य भावनात्मक अछि, विश्लेषणात्मक नहि। भाषा अमर नहि होइत; भाषा जीवित रहैत अछि जँ ओ उपयोग में रहैत अछि।
शोध के दृष्टि सँ: भाषा आ साहित्य केर जीवन-चक्र
भाषाविज्ञान आ समाजशास्त्र में ई मान्यता अछि जे भाषा तीन आधार पर जीवित रहैत अछि: पीढ़ीगत हस्तांतरण, सार्वजनिक उपयोग, आ सांस्कृतिक प्रासंगिकता। एहि विषय पर नवीनतम शोध (Research) बता रहल अछि जे मैथिली साहित्य तीसरे बिंदु पर गंभीर रूप सँ विफल रहल अछि।
भाग 2: देव, श्रेष्ठता आ रचनात्मक एकरसता
मैथिली साहित्य केर वर्तमान संकट केवल बाहरी दबाव के परिणाम नहि अछि। ई संकट बहुत हद तक आंतरिक संरचना सँ उपजल अछि।
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| संग्रहालयीय साहित्य: एक दिस गौरवशाली अतीत आ देव-स्तुति अछि, तऽ दोसर दिस आधुनिक जीवनक पीड़ा। साहित्यक दरबाजा एखन वर्तमान यथार्थ लेल बंद अछि। |
देव-केन्द्रित लेखन: आस्था सँ पलायन धरि
समस्या ओतहि शुरू होइत अछि जखन आस्था (Faith) साहित्य केर एकमात्र विषय बनि जाइत अछि। उदाहरणक लेल, विद्यापति केर नचारी 'के पतिया लय जायत रे' केवल भक्ति नहि, बल्कि विरह आ मानवीय वेदना केर उत्कृष्ट अभिव्यक्ति अछि। मुदा आइ रचल जा रहल साहित्य में ओ मानवीय स्पर्श गायब अछि, केवल कर्मकांड शेष अछि।
आलोचना सँ भय: एक बंद साहित्यिक पारिस्थितिकी
मैथिली साहित्य में आलोचना (Criticism) के परंपरा कमजोर पड़ि गेल अछि। हमरा बाबा नागार्जुन जकाँ विद्रोही तेवर केर आवश्यकता अछि, जे सत्ता आ समाज दूनू सँ प्रश्न पूछि सकथि।
भाग 3: भाषिक लज्जा आ संभावित पुनर्जागरण
मैथिली साहित्य केर संकट के अंतिम आ सबसे गंभीर आयाम समाजिक स्तर पर प्रकट होइत अछि—भाषिक लज्जा (Language Shame)।
मैथिल समाज फलि रहल अछि, मुदा मैथिली कियँ सिकुड़ैत अछि?
आज मिथिला क्षेत्र सँ बाहर मैथिल लोक अग्रणी भूमिका निभा रहल छथि। मुदा एखन ई सफलता भाषिक आत्मविश्वास में परिवर्तित नहि भेल अछि। बहुत मैथिल परिवार सभ अपन बच्चा केँ मैथिली सिखबैत नहि छथि। कारण? भय। ई भय जे मैथिली बोलला सँ बच्चा “पीछे” रहि जायत।
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| अस्तित्वक संकट: हम आधुनिकताक दौड़ में आगू तऽ बढ़ि रहल छी, मुदा पाछाँ अपन साहित्य आ संस्कृति के धूर-माटी होमय लेल छोड़ि रहल छी। |
समाधान: भावुकता नहि, रणनीति
मैथिली के पुनर्जागरण भावनात्मक नारासँ नहि, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति सँ संभव अछि:
- घर सँ शुरुआत: माता-पिता बच्चा सँ मैथिली में संवाद करें।
- नव लेखन: युवा लेखक सभ जोखिम उठाबथि। बाल विवाह जकाँ कुरीति पर पहिने लेखन भेल छल, आइ आधुनिक समस्या पर लेखन हो।
- डिजिटल मंच: पॉडकास्ट, ब्लॉग (Sahityashala.in जकाँ), आ सोशल मीडिया पर मैथिली के प्रयोग।
अंतिम निष्कर्ष: चेतावनी आ आशा
मैथिली साहित्य मरि रहल अछि—ई स्वीकार कठिन अछि, मुदा आवश्यक अछि। ई लेख विलाप नहि, चेतावनी अछि। आ चेतावनी एखन सुनल जाय, तऽ कल पुनर्जागरण संभव अछि।
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