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पिया मोर बालक, हम तरूणि गे - अर्थ, व्यंग्य और बाल विवाह | Vidyapati Geet Analysis

प्रस्तावना: विडंबना और वेदना का अद्वितीय संगम

मैथिली साहित्य के गगन में महाकवि विद्यापति ध्रुवतारे के समान चमकते हैं। उनकी लेखनी ने जहाँ एक ओर भक्ति की सरिता बहाई, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों पर इतना तीखा प्रहार किया कि वह आज भी प्रासंगिक है। जब हम विद्यापति की जीवनी और कविताओं का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि उन्होंने स्त्री-मन की उन गहराइयों को स्पर्श किया है जहाँ पीड़ा शब्द नहीं, बल्कि आह बन जाती है.

A melancholic Maithili Nayika sitting alone in the mist, symbolizing the internal burning (Dagadh Sharir) and despair described in Vidyapati's folk songs.

"पिया के देखैत मोरा दगध शरीर" – The contrast between the cold social environment and the internal fire of anguish felt by the bride.

प्रस्तुत गीत, "पिया मोर बालक, हम तरूणि गे!" केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि तत्कालीन मिथिला समाज में व्याप्त बाल-विवाह (अनमेल विवाह) की प्रथा पर एक करारा तमाचा है। यह गीत एक ऐसी 'तरुणी' (युवती) की व्यथा है जिसका विवाह एक अबोध 'बालक' से कर दिया गया है। आइए, इस कालजयी रचना के मर्म को समझें।

📜 मूल रचना

पिया मोर बालक, हम तरूणि गे!
कौन तप चुकलौं भेलौ जननि गे!
पिया मोर बालक….

पहिरि लेल सखी दछिन चीर
पिया के देखैत मोरा दगध शरीर
पिया लेल गोद कै चलली बाजार
हटिया के लोग पूछे के लागै तोहार
पिया मोर बालक……

नहीं मोरा देवर की नहीं छोट भाई
पूरब लिखल छल बलमु हमार
वाट के बटोहिया के तुहु मोरा भाई
हमरो समाद नैहर लेने जाय
पिया मोर बालक…….

कही हुन बाबा के कीनै धेनु गाय
दुधवा पिआई के पोसत जमाई
भनही विद्यापति सुनहु बृजनारि
धयरज धैरहुं मिलत मुरारी
पिया मोर बालक….

भावार्थ और गहन विश्लेषण

विद्यापति की पदावली में शृंगार और भक्ति के साथ-साथ लोक-व्यवहार का अद्भुत चित्रण मिलता है। विद्यापति की पदावली के अर्थ और सौंदर्य को समझते हुए, हम इस गीत को तीन मुख्य आयामों में देख सकते हैं: सामाजिक व्यंग्य, व्यक्तिगत कुंठा और नियति का स्वीकार

Illustration of Vidyapati's poem Piya Mor Balak showing a young woman standing beside her child husband, representing the tragedy of mismatched marriage (Anmel Vivah) and classic folk satire.

"पिया मोर बालक, हम तरूणि गे" – A visual depiction of the social irony where a young woman is married to a child, capturing the core theme of Vidyapati's satire.

1. पश्चाताप और 'जननी' बनने की विडंबना

नायिका गीत का आरम्भ ही एक प्रश्न से करती है—"कौन तप चुकलौं भेलौ जननि गे!"। यहाँ 'जननि' (माता) शब्द का प्रयोग अत्यंत व्यंग्यात्मक है। विवाह के उपरांत उसे 'पत्नी' का सुख मिलना चाहिए था, किन्तु पति के अबोध बालक होने के कारण उसकी स्थिति एक माता जैसी हो गई है। वह सोचती है कि पूर्व जन्म में उससे कौन सी तपस्या छूट गई थी, जिसका दंड उसे इस रूप में मिला है। यह भाव राम वियोग जैसे गीतों में भी दिखता है, जहाँ प्रारब्ध की प्रधानता होती है।

2. श्रृंगार और 'दगध शरीर'

नायिका ने 'दक्षिण चीर' (सुंदर साड़ी) पहनी है, जो उसके यौवन और अभिसार की तैयारी का प्रतीक है। परन्तु, जैसे ही उसकी दृष्टि अपने बाल-पति पर पड़ती है, उसका शरीर कामग्नि और क्षोभ से जलने लगता है (दगध शरीर)। जहाँ मैथिली विवाह गीतों में उल्लास होता है, वहीं यहाँ घोर निराशा है।

3. सामाजिक लज्जा और बाजार का दृश्य

इस गीत का सबसे दृश्यमान और करुण बिम्ब वह है जब नायिका पति को गोद में लेकर बाजार (हटिया) जाती है। लोग पूछते हैं—"यह बच्चा तुम्हारा कौन है?" देवर या छोटा भाई? नायिका को कड़वा घूँट पीकर स्वीकारना पड़ता है कि यह उसका 'बलमु' (पति) है। यह स्थिति मिथिला की संस्कृति में उस समय व्याप्त कुरीतियों की ओर इशारा करती है।

4. पिता पर तीखा व्यंग्य (Satire on Patriarchy)

गीत की चरम सीमा वह सन्देश है जो वह राहगीर (बटोहिया) के माध्यम से अपने पिता (नैहर) को भेजती है:

"कही हुन बाबा के कीनै धेनु गाय, दुधवा पिआई के पोसत जमाई"

यह पंक्तियाँ पितृसत्तात्मक समाज पर एक तमाचा हैं। वह कहती है कि बाबा से कहना एक दुधारू गाय खरीद लें ताकि वे दूध पिलाकर अपने दामाद को पाल सकें। यहाँ नायिका की असहायता क्रोध में बदल जाती है। हिंदी साहित्य के विद्वान भी मानते हैं कि विद्यापति की यह स्पष्टवादिता उन्हें अन्य मध्यकालीन कवियों से अलग करती है।

5. विद्यापति का आश्वासन

अंत में, कवि विद्यापति 'बृजनारि' को धैर्य रखने को कहते हैं—"धयरज धैरहुं मिलत मुरारी"। यह आश्वासन लौकिक (बालक बड़ा होगा) और पारलौकिक (ईश्वर प्राप्ति) दोनों अर्थों में लिया जा सकता है। जैसे उगना (शिव) की भक्ति में भक्त को धैर्य रखना पड़ता है, वैसे ही यहाँ भी सब्र का सन्देश है।

A woman sitting under a tree with a lit earthen lamp looking at the stars, representing the theme of patience (Dhairya) and spiritual hope in Maithili literature.

"धयरज धैरहुं मिलत मुरारी" – A symbol of the Nayika's endurance and her silent message sent to her father through the traveler (Batohiya).

📌 मुख्य बिंदु (Key Analysis)

  • व्यंग्य और करुणा: यह गीत केवल हास्य नहीं, बल्कि एक त्रासदी है जहाँ एक युवती पत्नी बनने के बजाय 'जननी' (धाय माँ) की भूमिका निभाने को विवश है।
  • सामाजिक प्रहार: 'गाय खरीदकर दामाद को पालने' वाला कथन उस समय की विवाह व्यवस्था पर सबसे तीखा प्रहार है।
  • लोक और साहित्य: विद्यापति ने इसमें 'हटिया' (बाजार) और 'बटोहिया' (राहगीर) जैसे लोक तत्वों का प्रयोग कर इसे जन-जन से जोड़ा है।

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पारंपरिक गायन

आधुनिक प्रस्तुति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: 'पिया मोर बालक' किस प्रकार का गीत है?

यह विद्यापति द्वारा रचित एक लोकगीत है जो सामाजिक कुरीतियों, विशेषकर बाल विवाह पर व्यंग्य करता है। इसे अक्सर नचारी या लोकगीत की श्रेणी में रखा जाता है।

Q2: इस गीत में नायिका किसे अपना सन्देश भेजती है?

नायिका रास्ते चलते 'बटोहिया' (राहगीर) के माध्यम से अपने पिता (नैहर) को सन्देश भेजती है और उनसे एक गाय भेजने को कहती है ताकि पति का पालन हो सके।

Q3: विद्यापति का जन्म कहाँ हुआ था?

विद्यापति का जन्म मिथिला क्षेत्र के बिस्फी गाँव में हुआ था। अधिक जानकारी के लिए विद्यापति परिचय पढ़ें।

निष्कर्ष

"पिया मोर बालक" आज भी हमें झकझोरता है। यह गीत प्रमाण है कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी है। विद्यापति की यह दृष्टि उन्हें कालजयी बनाती है। यदि आप मैथिली साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, या वित्त जगत की अन्य गहराइयों को समझना चाहते हैं, तो साहित्यशाला के अन्य लेखों को अवश्य पढ़ें।

इस गीत को गाते समय जो करुणा और हास्य का मिश्रित भाव उत्पन्न होता है, वही इसकी असली शक्ति है। यह केवल एक पत्नी की पुकार नहीं, बल्कि एक युग की विडंबना है।

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