मिथिला के कोकिल और शृंगार रस के अप्रतिम चितेरे महाकवि विद्यापति की लेखनी से निकला हर शब्द, विरह की अग्नि में तपकर कुंदन बन गया है। भारतीय साहित्य में जब भी 'विप्रलंभ शृंगार' (वियोग) की चर्चा होती है, तो विद्यापति का पद "के पतिआ लए जाएत रे" (Ke Patiya Lae Jaet Re) अनायास ही हृदय को झकझोर देता है।
"Ke Patiya Lae Jaet Re..." The quintessential image of the Virahini Nayika clutching the letter she cannot send.
सावन की घनघोर घटाओं के बीच एक विरहिणी नायिका की पीड़ा, उसका एकाकीपन और संदेश भेजने की आकुलता—इस गीत में मानवीय संवेदनाओं का महासागर उमड़ता है। महाकवि विद्यापति ने इसमें न केवल लोक-जीवन की व्यथा उकेरी है, बल्कि आध्यात्मिक दर्शन का भी गहरा पुट दिया है। साहित्यशाला के इस विशेष आलेख में, हम इस कालजयी रचना का पीएचडी-स्तरीय गहन विश्लेषण, शब्दार्थ और भावार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।
मूल पद: के पतिआ लए जाएत रे
के पतिआ लए जाएत रे, मोरा पिअतम पास।
हिए नहि सहए असह दु:ख रे, भेल साओन मास॥
एकसरि भवन पिआ बिनु रे, मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दु:ख दारुन रे, जग के पतिआए॥
मोर मन हरि हर लए गेल रे, अपनो मन गेल।
गोकुल तेजि मधुपुर बस रे, कन अपजस लेल॥
विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन आस।
आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास॥
कठिन शब्दार्थ (Glossary)
- पतिआ (Patiya): पत्र, चिट्ठी या प्रेम-संदेश।
- हिए (Hiye): हृदय/दिल।
- एकसरि (Eksari): एकाकी, अकेली (Solitary)।
- अनकर (Ankar): दूसरों का, पराया।
- दारुन (Darun): दारुण, कठोर, भयानक।
- मधुपुर (Madhupur): मथुरा नगरी।
पद्य-भावार्थ (Paraphrase)
विरह की पुकार:
"अरे, ऐसा कौन है जो मेरा पत्र (संदेश) मेरे प्रियतम के पास लेकर जाएगा? सावन का महीना आ गया है और मेरा हृदय इस असह्य पीड़ा को अब सहन नहीं कर पा रहा है।"
नायिका कहती है, "इस विशाल भवन में प्रियतम के बिना मैं बिल्कुल अकेली हूँ; अब मुझसे यहाँ रहा नहीं जाता। हे सखी! विडंबना यह है कि दूसरों का दुःख कितना दारुण (कठोर) होता है, इस पर यह संसार विश्वास ही नहीं करता (Reference)।"
"श्री कृष्ण (हरि) ने मेरा मन तो हर लिया, लेकिन साथ ही वे अपना मन (यादें/सुध) भी साथ ले गए। उन्होंने गोकुल का त्याग कर मथुरा (मधुपुर) में वास कर लिया है—ऐसा करके उन्होंने कितना बड़ा अपयश (बदनामी) मोल ले लिया है!"
अंत में कवि विद्यापति आश्वासन देते हैं—"हे सुंदरी (धनि)! अपने मन में धीरज और आशा धारण करो। इसी कातिक मास में तुम्हारे मनभावन (प्रियतम) अवश्य लौटकर आएंगे।"
गहन आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis)
यह पद मैथिली साहित्य की पदावली परंपरा में विरह का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आइए, इसके विभिन्न आयामों को समझें:
1. रस-मीमांसा और विरोधाभास
इस पद में 'विप्रलंभ शृंगार' की प्रधानता है। विद्यापति ने यहाँ 'सावन' (Monsoon) का प्रयोग एक उद्दीपन विभाव के रूप में किया है। भारतीय काव्य में सावन मिलन का प्रतीक है, लेकिन यहाँ वही सावन विरह की अग्नि को भड़काने वाला बन गया है। यह 'विरोधाभासी सौंदर्य' (Aesthetic Irony) विद्यापति की विशेषता है।
2. नायिका का मनोविज्ञान और तुलनात्मक दृष्टि
यहाँ नायिका 'विरहोत्कंठिता' है। पंक्ति "सखि अनकर दु:ख दारुन रे, जग के पतिआए" में गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है—पीड़ा नितांत व्यक्तिगत होती है।
3. काल-चक्र: सावन बनाम कार्तिक
सावन 'अंधकार' का प्रतीक है, जबकि 'कार्तिक' 'प्रकाश' और 'मिलन' का। विद्यापति का यह आश्वासन कि प्रिय कार्तिक में आएँगे, केवल सांत्वना नहीं है, बल्कि भारतीय दर्शन में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संकेत भी है।
4. शब्द-शक्ति और भक्ति
"मोर मन हरि हर लए गेल" में यमक अलंकार का अद्भुत प्रयोग है। 'हरि' (कृष्ण) ने मन 'हर' (चुरा) लिया। जहाँ विद्यापति की नचारी में वैराग्य दिखता है, वहीं यहाँ प्रेम और भक्ति का अद्वैत संगम है।
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इस पद की पीड़ा को स्वर कोकिला रजनी पल्लवी और शारदा सिन्हा ने अपनी आवाज़ में जीवंत किया है:
रजनी पल्लवी (Rajni Pallavi)
लोक-गायन (Folk Version)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'के पतिआ लए जाएत रे' गीत का मुख्य भाव क्या है?
2. विद्यापति ने इस गीत में सावन का उल्लेख क्यों किया है?
3. 'हरि हर लए गेल' पंक्ति का क्या अर्थ है?
निष्कर्ष:
विद्यापति का यह पद हमें सिखाता है कि प्रेम केवल मिलन का नाम नहीं है, बल्कि प्रतीक्षा और धैर्य की साधना भी है। सावन का दुःख अस्थायी है, और कार्तिक का मिलन शाश्वत। यदि आप मैथिली साहित्य, विद्यापति की पदावली या अन्य लोकगीतों पर और गहरा अध्ययन करना चाहते हैं, तो Sahityashala.in के मुख्य पृष्ठ पर जाएँ।
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