प्रस्तावना: क्या आपने कभी ऐसे कवि को पढ़ा है जो संसद को "घूरे" पर फेंकने की बात करता हो, और अगले ही पल मेघदूत की कोमलता को याद करता हो? हिन्दी और मैथिली साहित्य के उस वटवृक्ष का नाम है—बाबा नागार्जुन। यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध नागार्जुन (यात्री) के संपूर्ण क्रांतिकारी जीवन, उनकी भीषण गरीबी, जेल यात्राओं और साहित्य का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है।
बाबा नागार्जुन (यात्री): मिथिला की विद्रोही आवाज़
हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ ही रचनाकार ऐसे हैं, जिन्हें किसी एक खांचे में बंद करना असंभव है। बाबा नागार्जुन उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे केवल कवि नहीं थे, न ही मात्र उपन्यासकार, विचारक या राजनीतिक लेखक। वे चलता-फिरता विरोध थे—ऐसा विरोध जो जीवन से उपजा था, किताबों से नहीं।
संन्यासी होकर भी गहरे भौतिक, मार्क्सवादी होकर भी लोकचेतना से जुड़े, संस्कृत के विद्वान होकर भी कच्ची-पक्की देहाती भाषा के उस्ताद—नागार्जुन विरोधाभासों का ऐसा संगम थे जो टकराता नहीं, बल्कि रचनात्मक ऊर्जा पैदा करता है।
नागार्जुन को पढ़ना यानी भारत को बिना किसी फिल्टर के सुनना। वह भारत नहीं जो सभागारों में सजता है, बल्कि वह भारत—जो खेतों में पसीना बहाता है, जो रेल के प्लेटफॉर्म पर सोता है, जो जेल की सलाखों के पीछे सोचता है।
मिथिला के लिए नागार्जुन सिर्फ़ लेखक नहीं, अंतःकरण की आवाज़ हैं। यह लेख बाबा नागार्जुन पर एक पूर्ण और निर्णायक मार्गदर्शिका है।
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| जनकवि का द्वंद्व: एक तरफ 'नागार्जुन' की आग है, तो दूसरी तरफ 'यात्री' की शीतलता। |
1. दो व्यक्तित्व: “नागार्जुन” और “यात्री”
बाबा नागार्जुन को समझने की पहली शर्त है—उनके दो साहित्यिक रूपों को समझना।
नागार्जुन: हिन्दी का क्रांतिकारी कवि
“नागार्जुन” के नाम से वे हिन्दी साहित्य के सबसे निर्भीक राजनीतिक कवि के रूप में सामने आते हैं। यह नागार्जुन सत्ता-विरोधी हैं, सामंती ढाँचे के विरोधी हैं, और धार्मिक व राजनीतिक पाखंड के कट्टर आलोचक हैं। उनकी कविताएँ न्याय की भीख नहीं माँगतीं—न्याय को कटघरे में खड़ा करती हैं। उदाहरण के लिए, उनकी महारानी एलिजाबेथ पर लिखी गई व्यंग्यात्मक कविता रानी हम ढोएंगे पालकी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यात्री: मिथिला का लोककवि
नागार्जुन के नीचे और भीतर 'यात्री' मौजूद हैं—मिथिला के कवि। यात्री की मैथिली कविता चुपचाप देखती है, मौसमों को सुनती है, खेत, बाढ़, श्रम और थकान को महसूस करती है। इसका सुंदर उदाहरण उनकी मैथिली कविता भारत माता और सुजन नयन मुनि में देखा जा सकता है।
यह द्वैत क्यों ज़रूरी है? यह दो नामों का खेल नहीं, बल्कि दो चेतनाओं का संतुलन है। नागार्जुन का विद्रोह, यात्री की जड़ों से पोषित है।
2. उन्हें “बाबा” क्यों कहा गया?
“बाबा” कोई साहित्यिक उपाधि नहीं थी। यह जीवन-शैली की स्वीकृति थी। नागार्जुन ने जीवन भर स्थायित्व से इनकार किया। वे आश्रमों में रहे, गाँवों में भटके, प्लेटफॉर्म पर सोए, मित्रों के यहाँ टिके, और कई बार जेल में बंद रहे।
इस फक्कड़पन की झलक उनके 1986 के दुर्लभ साक्षात्कार में मिलती है: वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' का ऐतिहासिक इंटरव्यू। उन्हें बाबा इसलिए कहा गया क्योंकि वे भौतिक लालच से मुक्त थे, नैतिक साहस से बोलते थे, और सत्ता के सामने झुकने से इनकार करते थे।
3. राजनीति, जेल और गरीबी: संघर्ष की आग
नागार्जुन का जीवन सिर्फ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि 20वीं सदी के भारत के राजनीतिक संघर्ष का दस्तावेज है। उनकी लेखनी की कीमत उन्हें जेल और गरीबी के रूप में चुकानी पड़ी।
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| सत्ता के सामने तनी हुई रीढ़: बाबा नागार्जुन ने कभी अपनी कलम को सत्ता का गुलाम नहीं बनने दिया। |
आपातकाल (Emergency) और जेल यात्राएं
नागार्जुन ने 1974-75 में जयप्रकाश नारायण (जेपी) के ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) लगाया, तो नागार्जुन उन चुनिंदा साहित्यकारों में थे जिन्होंने खुलकर विरोध किया।
- जेल का जीवन: उन्हें ‘मीसा’ (MISA) के तहत गिरफ्तार किया गया। वे हज़ारीबाग और दरभंगा जेल में रहे।
- विद्रोह नहीं रुका: जेल की सलाखों के पीछे भी उनकी कलम नहीं रुकी। वहीं से उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता "इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको, सत्ता के नशे में भूल गईं बाप को" लिखी, जो उस समय का सबसे बड़ा विद्रोही नारा बन गई।
भीषण गरीबी और आत्मसम्मान
जनकवि होना आसान नहीं था। नागार्जुन ने जीवन भर आर्थिक तंगी झेली, लेकिन कभी किसी नेता या धन्नासेठ के आगे हाथ नहीं फैलाया।
- घर की हालत: एक समय ऐसा भी आया जब घर चलाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी की बची-खुची गहने भी बेचने पड़े। वे फटे-पुराने कपड़ों में घूमते थे, पैरों में हवाई चप्पल और कंधे पर झोला ही उनकी पहचान थी।
- पुरस्कार का पैसा: जब भी उन्हें कोई साहित्य पुरस्कार मिलता, वे अक्सर वह पैसा जरूरतमंद छात्रों या बीमार मित्रों को दे देते थे। खुद के पास अक्सर अगले दिन की रोटी का भी इंतजाम नहीं होता था।
आपातकाल और आंदोलनों के दौरान लिखी गई उनकी कविता 'खिचड़ी विप्लव देखा हमने', उस दौर की राजनीतिक अराजकता और भूख का सबसे बड़ा दस्तावेज है।
4. प्रमुख कृतियाँ: नागार्जुन की वैचारिक रीढ़
- चित्रा: स्त्री-स्वातंत्र्य और कामना पर गहरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास।
- पत्रहीन नग्न गाछ: संन्यास संस्थाओं के भीतर छिपे पाखंड को बेनकाब करती साहसी कृति (साहित्य अकादमी पुरस्कृत)।
- बाबा बटेसरनाथ: नेतृत्व और आस्था का व्यंग्यात्मक विश्लेषण।
उनके स्त्री-विषयक भाव उनकी भावुक कविताओं में भी दिखते हैं, जैसे कि सिन्दूर तिलकित भाल (याद आता है)।
5. “बादल को घिरते देखा है”: एक गहन पाठ
यह कविता सतह पर प्रकृति-चित्र लगती है, लेकिन भीतर गहरा राजनीतिक बोध छुपा है। यहाँ बादल ऐतिहासिक दबाव हैं, आने वाले परिवर्तन के संकेत हैं।
बादल को घिरते देखा है (पूर्ण कविता)
(पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ पूरी कविता दी गई है)
अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मान सरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
(कविता का शेष भाग...)
कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढा बहुत किंतु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
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| बादल को घिरते देखा है: कालिदास के काल्पनिक 'मेघदूत' से परे, नागार्जुन का यथार्थवादी हिमालय। |
6. भाषा, शिल्प और निष्कर्ष
नागार्जुन संस्कृतनिष्ठ भाषा से जानबूझकर दूरी रखते हैं। उनकी हिन्दी देहाती है, बोलचाल की है, कभी-कभी असभ्य लगती है। यह अशिष्टता नहीं, राजनीतिक ईमानदारी है। वे जानते थे—सजावटी भाषा अक्सर सत्ता की दलाल होती है।
राष्ट्रीय पहचान के बावजूद नागार्जुन मिथिला से अलग नहीं हुए। यात्री मिथिला को दर्ज करते हैं। नागार्जुन मिथिला की रक्षा करते हैं। 2025 में भी नागार्जुन खतरनाक रूप से ईमानदार लगते हैं। वे सिखाते हैं—क्रोध भी नैतिक हो सकता है। बाबा नागार्जुन की पूजा नहीं की जानी चाहिए। उन्हें पढ़ा जाना चाहिए और अन्याय के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
देखें: बाबा नागार्जुन का दुर्लभ साक्षात्कार
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
नागार्जुन और यात्री में क्या अंतर है?
हिन्दी में वे 'नागार्जुन' के नाम से क्रांतिकारी कविताएं लिखते थे, जबकि मैथिली में वे 'यात्री' के नाम से अपनी जड़ों और लोक-संस्कृति पर लिखते थे।
नागार्जुन की 'बादल को घिरते देखा है' का मूल भाव क्या है?
यह कविता प्रकृति के सौंदर्य के साथ-साथ दुर्गम परिस्थितियों में जीवन के संघर्ष और आनंद को दर्शाती है। यह कालिदास की काल्पनिक दुनिया को यथार्थ के धरातल पर तौलती है।
क्या नागार्जुन कभी जेल गए थे?
हाँ, राजनीतिक आंदोलनों (विशेषकर जेपी आंदोलन और किसान संघर्ष) में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था।
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