मिथिला चित्रकला (Mithila Painting) केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक "दृश्य दर्शन" (Visual Philosophy) है। जिसे दुनिया आज मधुबनी पेंटिंग के नाम से जानती है, वह असल में मिथिला की स्त्रियों द्वारा सदियों से दीवारों पर लिखा गया एक मौन शास्त्र है। जब आप किसी कोहबर (Kohbar) को देखते हैं, तो आप केवल चित्र नहीं देख रहे होते, बल्कि आप एक पूरी सभ्यता की प्रार्थना को पढ़ रहे होते हैं।
अक्सर कला प्रेमियों और शोधकर्ताओं के मन में यह प्रश्न उठता है: “मिथिला पेंटिंग में मछली और कछुआ का क्या अर्थ है” (Meaning of Fish and Tortoise in Mithila Painting)? आखिर विवाह के शुभ अवसर पर यही दो जीव क्यों बनाए जाते हैं? क्या यह केवल सजावट है, या इसके पीछे कोई गहरा "लोक-विज्ञान" (Folk Science) छिपा है? इस लेख में हम इसी रहस्य से पर्दा उठाएंगे और समझेंगे कि कैसे यह कला मैथिली साहित्य और संस्कृति की आत्मा है।
1. इतिहास के दर्पण में मिथिला कला (Historical Canvas)
मिथिला पेंटिंग की जड़ें त्रेता युग तक जाती हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के समय अयोध्या से आई बारात के स्वागत के लिए पूरे नगर और विवाह मंडप को चित्रों से सजाने का आदेश दिया था। यह परंपरा Wikipedia – Madhubani Art के अनुसार, सदियों तक घरेलू दीवारों तक सीमित रही।
जिस तरह महाकवि विद्यापति की रचनाओं ने मिथिला के जनमानस को भक्ति और प्रेम का स्वर दिया, उसी तरह यहाँ की स्त्रियों ने अपनी तूलिका (Brush) से उस प्रेम को रंगों में ढाला। यह कला नश्वर दीवारों से निकलकर अब वैश्विक धरोहर बन चुकी है, फिर भी इसकी आत्मा 'कोहबर' में ही बसती है।
2. प्रतीकों का तर्क: मछली (Fish) – उर्वरता और जीवन का प्रवाह
मिथिला क्षेत्र नदियों का मायका है। यहाँ "पग-पग पोखर, माछ मखान" की कहावत प्रसिद्ध है। लेकिन कोहबर में मछली का होना केवल भोजन का संकेत नहीं है, यह एक गहरा दार्शनिक संकेत है।
(अर्थात: जहाँ मछली का चित्र है, वहाँ घर भरा रहेगा।)
- उर्वरता (Fertility): मछली की प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है। यह 'वंश-वृद्धि' का सबसे सशक्त प्राकृतिक उदाहरण है। विवाह का एक मुख्य उद्देश्य वंश को आगे बढ़ाना है। जिस तरह सोहर गीतों (Sohar) में 'ललना' (पुत्र/संतान) के दीर्घायु होने की कामना की जाती है, वैसे ही मछली का चित्र उस कामना का दृश्य रूप है।
- विष्णु का मत्स्य अवतार: जैसा कि Sarmaya Arts Foundation के शोध में बताया गया है, यह प्रतीक सृष्टि की रक्षा और पुनर्स्थापना से जुड़ा है। यह नव-दंपति को आने वाले संकटों से बचाने का कवच भी है।
3. कछुआ (Tortoise) – स्थायित्व और धैर्य
जहाँ मछली 'वेग' है, वहीं कछुआ 'ठहराव' है। विवाह गीतों में जैसे "दुल्हिन धीरे-धीरे चल्यो" गाकर वधू को संयम और धैर्य की सीख दी जाती है, कछुआ उसी संयम का प्रतीक है।
- आधार की मजबूती: समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने 'कूर्म' (कछुआ) बनकर ही मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। Bihar Museum (Official) के अनुसार, कोहबर में कछुआ इस बात का प्रतीक है कि गृहस्थी का भार उठाने के लिए पति-पत्नी को कछुए की तरह मजबूत और सहनशील होना पड़ेगा।
- दीर्घायु: कछुआ लंबी उम्र का प्रतीक है। यह आशीर्वाद है कि दांपत्य जीवन लंबा और स्थिर हो।
4. संतुलन का सिद्धांत: दोनों साथ क्यों?
मिथिला दर्शन यह मानता है कि जीवन केवल भागने (मछली) या केवल रुकने (कछुआ) से नहीं चलता। इसमें संतुलन चाहिए। FolkArtopedia इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन के रूप में भी व्याख्यायित करता है। यह वही संतुलन है जो हमें गंगेश गुंजन जी की कविता 'इजोत' में दिखता है—जहाँ प्रकाश (ज्ञान) जीवन को स्थिरता देता है।
5. आधुनिक संदर्भ और महत्व
आज जब यह कला वैश्विक हो चुकी है, तब भी इसके मूल प्रतीक नहीं बदले हैं। चाहे वह रामायण के पात्र हों या मैथिली साहित्य में कर्ण जैसा त्यागी चरित्र, मिथिला पेंटिंग हर कहानी को रेखाओं में पिरोती है। Testbook जैसे शैक्षणिक स्रोत भी मानते हैं कि यह कला भारत की "सांस्कृतिक कूटनीति" (Cultural Diplomacy) का हिस्सा बन चुकी है।
यह कला हमें याद दिलाती है कि सुंदरता बिना कारण नहीं होती, जैसा कि गुलज़ार साहब ने लिखा है "बेसबब मुस्कुरा रहा है चाँद"—वैसे ही यह कला बिना शब्दों के मुस्कुराती है और अपनी गहराई बयां करती है।
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निष्कर्ष (Conclusion)
मिथिला चित्रकला में मछली और कछुआ महज आकृतियाँ नहीं हैं; वे जीवन जीने का एक पूरा पाठ्यक्रम (Syllabus) हैं। मछली हमें सृजन और विस्तार सिखाती है, तो कछुआ हमें संयम और संरक्षण। इन दोनों का मिलन ही एक सुखी, समृद्ध और संतुलित जीवन की कुंजी है। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही हम आसमान छू सकते हैं—यही संदेश यह लोककला सदियों से देती आ रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
मछली उर्वरता (Fertility), वंश-वृद्धि और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। यह शुभता और समृद्धि का भी संकेत है।
कछुआ भगवान विष्णु के कूर्म अवतार का प्रतिनिधित्व करता है। यह स्थिरता, धैर्य और दांपत्य जीवन की लंबी आयु का प्रतीक है।
इसका इतिहास रामायण काल से जुड़ा है, जब राजा जनक ने सीता विवाह के लिए पूरे जनकपुर में चित्रकारी करवाई थी।
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