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इजोत लए - Ejot Lay | Gangesh Gunjan Maithili Poem (Satire on Democracy)

मैथिली साहित्य के आधुनिक स्तंभ और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता गंगेश गुंजन (Gangesh Gunjan) अपनी प्रखर लेखनी और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविताएँ केवल भावुकता का प्रदर्शन नहीं करतीं, बल्कि वे हमारे समय की 'राजनीतिक विद्रूपता' (Political Absurdity) पर एक सर्जिकल स्ट्राइक की तरह होती हैं।

आज हम उनकी बहुचर्चित कविता "इजोत लए" (Ejot Lay - प्रकाश के लिए) का गंभीर विश्लेषण करेंगे। यह कविता लोकतंत्र के गिरते स्तर, मीडिया के भ्रमजाल (Media-Maya), और 'गांधी बनाम गोधरा' के द्वंद्व को रेखांकित करती है। जिस तरह बाबा नागार्जुन ने व्यवस्था के खिलाफ हुंकार भरी थी, गंगेश गुंजन जी यहाँ व्यवस्था की 'अंधेरी रूह' का पोस्टमार्टम करते हैं।

A single lamp glowing amidst colorful darkness, symbolizing the search for truth in Gangesh Gunjan's Maithili poem Ejot Lay.
"भुक-भुक इजोत उजागर अछि..." — A flicker of truth in the colorful darkness.

इजोत लए (Ejot Lay)

कवि: गंगेश गुंजन

अन्हरिए जकाँ विचार
उतरबा-पसरबामे होइत अछि इमानदार
एहन नहि होइत अछि जे ओ अपन भगजोगनी,
तरेगन, निःशब्द सन-सन स्वर कतहु अन्तः ध’ क’
चलि अबैत अछि मनुक्खक एहि धरती पर
नापरवाह बा चलाकीमे।

....पक्ष-विपक्षक लोकतांत्रिक चरित्र जकाँ
बँटैत-बाँटैत सन कहाँ अछि अन्हार जेना
समस्त विधायिका-न्यायपालिका-कार्यपालिका,
अर्थात संसद-न्यायालय-मंत्रालय।

...भरल धरतीक कोनो मानचित्रमे
ने पवित्र अन्हार, ने पुण्यात्मा प्रकाश
ने शुद्ध रातिक सन्नाटा
ने दिनक कार्यान्दोलित ऊँच बजैत बजार
ने अखण्ड अभिप्राय जकाँ भाषा
ने शुद्ध हृदयक बोल
ने ठीकसँ नगाड़ा, ने पूरा ढोल।

.... भरि गाम पंचायत,
भरि प्रात, विधान सभा-परिषद्
भरि देश संसद, सभा
समूचा सत्र धुपछाँही संवाद-प्रतिवाद
भरि देश गाँधी, देश भरि गुजरात।
आखिर एना, ई की बात ?

...जबर्दस्त मीडिया-माया
...दारूण कार्य-कलापमे
किएक एना-घोर मट्ठा
किएक नहि किछु राफ-साफ
के अछि कोम्हर
एम्हर कि ओम्हर
बाम कि दहिन ठाढ़
साफ बुझा रहल अछि-अनदेखार

दच्छिन एक रत्तीट बामा दिस टगल
बाम टगल दहिना
मध्यमे विराजमान एक रत्तीी बामक
भुक-भुक इजोत उजागर अछि-
दक्षिणक रंग बिरंगक अन्हार।

सोचैत छी, बड़ दिनसँ सोचैत छी
ठीक-ठीक कही तँ, पचीसमे बरखक वयससँ
सोचैत आबि रहल छी-
कोनो तेहन बड़का लग्गी होइत
आ मेघमे लगा क’ झखा लितहुँ जामुन गाछी जकाँ
समस्त राति

मनुक्खक विचार भेल, दुस्सह अन्हारमे पर्यंत
एखनहुँ देखार
...प्रज्जवलित दू-तीन-चारि रंगक फकफाइत
संपूर्ण अस्तित्वकें, झाँपि क’ क’ दिअए अस्तित्वशेष
लोकक आँखि-मन आ माथमे
कतहु ने गड़ए चक्कू कि भाला जकाँ
नहि करए शोनिते शोनिताम
गोधरा ने हमरा गाम।

साहित्यिक विवेचना और भावार्थ

गंगेश गुंजन की यह कविता महज शब्दों का विन्यास नहीं है, बल्कि यह समकालीन भारतीय राजनीति और समाज का एक 'एक्स-रे' (X-Ray) है। कवि यहाँ प्रकाश (इजोत) को एक रूपक (Metaphor) की तरह इस्तेमाल करते हैं।

1. लोकतंत्र का 'रंगीन अँधेरा'

कवि कहते हैं कि प्राकृतिक अँधेरा ईमानदार होता है, वह भेदभाव नहीं करता। लेकिन हमारे लोकतंत्र का अँधेरा चालाक है। "विधायिका-न्यायपालिका-कार्यपालिका" - ये तीनों स्तंभ अब एक दूसरे में मिल गए हैं। यहाँ न तो "पवित्र अँधेरा" बचा है और न ही "पुण्यात्मा प्रकाश"। यह स्थिति रामधारी सिंह दिनकर की उस चेतावनी की याद दिलाती है जहाँ सत्ता का अहंकार विवेक को हर लेता है।

An artistic illustration of a common man searching for clarity in a confused democracy, depicting the theme of the poem Ejot Lay.
"समस्त विधायिका-न्यायपालिका-कार्यपालिका..." — The blurred lines of democracy.

2. गाँधी और गुजरात का विरोधाभास

कविता की सबसे सशक्त पंक्ति है: "भरि देश गाँधी, देश भरि गुजरात"। यह विरोधाभास (Paradox) बहुत गहरा है। एक तरफ हम गाँधी के अहिंसा के आदर्शों को पूजते हैं, दूसरी तरफ समाज में 'गोधरा' जैसी हिंसक घटनाएँ घटती हैं। कवि इस दोहरेपन से व्यथित हैं।

3. मीडिया-माया और वाम-दक्षिण का भ्रम

कवि 'मीडिया-माया' (Media Illusion) पर कटाक्ष करते हैं जिसने सच और झूठ को मिलाकर 'घोर मट्ठा' बना दिया है। वामपंथ (Left) और दक्षिणपंथ (Right) की विचारधाराएँ अब स्पष्ट नहीं हैं - "बाम कि दहिन ठाढ़"। सब कुछ धुंधला है।

4. शांति की अंतिम पुकार

अंत में, कवि एक मानवीय अपील करते हैं। उनकी इच्छा है कि कम से कम उनके गाँव में, उनके समाज में चाकू और भाले न चलें, और वह स्थान 'गोधरा' (हिंसा का प्रतीक) न बने। यह केवल एक मैथिली कविता नहीं, बल्कि रश्मिरथी के कर्ण की तरह एक योद्धा कवि की आत्म-स्वीकृति और चिंता है।

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निष्कर्ष

'इजोत लए' हमें आईना दिखाती है। गंगेश गुंजन जी ने बड़े ही सूक्ष्म तरीके से समाज के विरोधाभासों को उकेरा है। यह कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम जिस 'इजोत' (प्रकाश) की तलाश में हैं, वह बाहर नहीं, हमारे विचारों की स्पष्टता में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'इजोत लए' कविता के रचयिता कौन हैं?

इस कविता के रचयिता साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध मैथिली कवि गंगेश गुंजन हैं।

इस कविता में 'गोधरा' का उल्लेख क्यों किया गया है?

कवि ने 'गोधरा' का प्रयोग सांप्रदायिक हिंसा और अशांति के प्रतीक के रूप में किया है, यह दर्शाने के लिए कि वे अपने गाँव और समाज में ऐसी हिंसा नहीं चाहते।

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