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गोठ बिछनी - Goth Bichni | Vaidyanath Mishra "Yatri" (Nagarjun) Maithili Poems

मैथिली साहित्य के 'जनकवि' वैद्यनाथ मिश्रा 'यात्री' (जिन्हें हिंदी साहित्य में बाबा नागार्जुन के नाम से जाना जाता है) की लेखनी हमेशा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा को स्वर देती है। उनकी कविताएँ यथार्थवाद (Realism) का एक दर्पण हैं।

आज हम उनकी एक मर्मस्पर्शी मैथिली कविता "गोठ बिछनी" (Goth Bichni) का पाठ करेंगे। इस कविता में कवि ने 'गोठ' (जलावन/उपला) चुनने वाली एक गरीब ग्रामीण किशोरी के संघर्ष, उसकी वेशभूषा और उसके कठिन जीवन का अत्यंत करुण चित्रण किया है। यह कविता केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की एक सच्ची तस्वीर है।

Goth Bichni - Maithili Poem by Yatri (Nagarjun) depicting rural poverty
"माघक ठार, रौद बैसाखक..." - संघर्ष का प्रतीक 'गोठ बिछनी'

गोठ बिछनी (Goth Bichni)

कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री"

बीछि रहल छैं बंगोइठा तों
घूमि घामि कएँ बाध-बोनमे
पथिआ नेने भेल फिरई छैं
तिनू खूट, चारिओ कोनमे
मैल पुरान पचहथ्थी नूआ
सेहो फाटल चेफड़ी लागल
देहक रङ जमुनिआ, तइपर
मुँह माइक गोटीसँ दागल

बगड़ा जेना लगाबाए खोंता
तेहने रुच्छ केस छउ तोहर
दू छर हारी मात्र गराँमे
केहने विचित्र भेस छउ तोहर

माघक ठार, रौद बैसाखक
तोरा लेखे बड़नी' धन सन
दीन बालिके अजगुत लागए
केहेन कठिन छउ तोहर जीवन

कने ठाढ़ी हो, सुन कहने जो
नाम की थिकउ, कतए रहइ छैं
बीतभरिक भए कोन बेगतें
एते कष्ट आ दुक्ख सहई छैं

भावार्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

इस कविता में यात्री जी (नागार्जुन) ने एक 'गोठ बिछनी' (जलावन के लिए उपले/गोबर चुनने वाली लड़की) का अत्यंत सजीव और करुण चित्र खींचा है।

  • वेशभूषा और गरीबी: कवि बताते हैं कि वह लड़की फटी हुई 'पचहथ्थी नूआ' (पाँच हाथ की साड़ी/धोती) पहने हुए है, जिसमें कई जगह 'चेफड़ी' (पैबंद) लगी है। उसका रंग साँवला (जमुनिया) है और चेहरे पर चेचक (माइक गोटी) के दाग हैं। यह चित्रण गरीबी की भयावहता को दर्शाता है।
  • कठोर जीवन: उसके बाल रूखे और बिखरे हुए हैं, जैसे 'बगड़ा' (बगुला पक्षी) का घोंसला हो। गले में मात्र 'दू छर हारी' (सस्ती माला) है। चाहे माघ की कड़ाके की ठंड हो या बैशाख की चिलचिलाती धूप, वह हर मौसम में नंगे पाँव भटकती है।
  • कवि की संवेदना: अंत में, कवि संवेदना से भरकर उसे रोकते हैं और पूछते हैं— "कने ठाढ़ी हो..." (जरा रुको)। वे उसका नाम और पता पूछना चाहते हैं, यह जानने के लिए कि इतनी छोटी उम्र (बीतभरिक) में वह इतना कष्ट क्यों सह रही है?

जहाँ 'साओन' कविता में यात्री जी प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हैं, वहीं 'गोठ बिछनी' में वे सामाजिक असमानता पर चोट करते हैं। इसी तरह का विद्रोही स्वर उनकी हिंदी कविता 'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' में भी गूँजता है।

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निष्कर्ष

'गोठ बिछनी' केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक प्रश्न है जो नागार्जुन हमारी सामाजिक व्यवस्था से पूछते हैं। यह कविता हमें उन चेहरों की याद दिलाती है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'गोठ बिछनी' कविता के रचयिता कौन हैं?

इस कविता के रचयिता बाबा नागार्जुन हैं, जो मैथिली साहित्य में 'यात्री' उपनाम से लिखते थे।

'गोठ बिछनी' का क्या अर्थ है?

'गोठ' का अर्थ है जलावन के लिए सूखा हुआ गोबर (उपला) और 'बिछनी' का अर्थ है उसे चुनने या बीनने वाली।

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