मैथिली और हिंदी साहित्य के 'जनकवि' बाबा नागार्जुन (जिन्हें मैथिली में 'यात्री' जी के नाम से जाना जाता है) अपनी कविताओं में धरती की सौंधी महक और जन-जीवन का यथार्थ चित्रण करने के लिए प्रसिद्ध हैं。
आज हम उनकी प्रसिद्ध मैथिली कविता "साओन" (Saon) का आनंद लेंगे। जिस प्रकार हिंदी में उनकी कविता 'बादल को घिरते देखा है' प्रकृति का विराट रूप दिखाती है, वैसे ही 'साओन' मिथिलांचल में वर्षा ऋतु के सौंदर्य, प्रेम और लोक-संस्कृति का एक सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। आइये, इस कविता के बोल (Lyrics) और इसके विस्तृत भावार्थ (Saon Meaning) को समझते हैं।
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| "झूलो झूलथु नन्दकिशोर..." — The divine romance of Radha-Krishna amidst the Sawan rain. |
साओन (Saon Lyrics)
कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" (Nagarjun)
परतीक कोँढ़ - करेज जुड़ाएल
बाध - बोन हरिअर भऽ गेल
प्रकृति - नटि केर अंग अंग मेँ
महाकाल टेमी दऽ देल
सर-सरिताकेँ भरल देखिकए
बिजुलत्ताकेँ सुझलइ खेल
बँसबारिक भगजोगनीं सभसँ
ओ धोछिया कए लेलक मेल
तामस उठलन्हि मेघराजकेँ
ठनका ठनकल डाँटक लेल
डूबल रहइ दोबगली लाइन
कहुना ससरल छोटकी रेल
धरतीक कोंढ़ करेज जुड़ाएल
बाध-बोन हरिअह भ’गेल।
भीजल - तीतल, ध्वैल - नहाएल
सिमसिमाह ई साओन मास
कतबो झहरल मेघ तदपि अछि
रिमझिमाह ई साओन मास
अनका लेखेँ मजगर विधुरक
पिछड़ि - पिछड़ि कँऽखसथु राधिका
कान्ह क लेल हँसाओन मास
गाइनि लोकनिक हेतु मोदमय
कोहबर महक ओछाओन मास
तीसो दिन थिक मधुश्रावणी
नवतुरिआक चुमाओन मास
भीजल - तीतल ध्वैल - नहाएल
सिमसिमाह ई साओन मास
मोट डारि मेँ मचकी बान्हल
झूलो झूलथु नन्दकिशोर
पलखति भेटन्हु नजरि बचा कएँ
नहू-नहू आवथु चितचोर
तिलक फूल सन रूचिर नासिका
मधुरी फूल जकाँ छन्हि ठोर
दूई देह छन्हि, एक परिस्थिति
एक प्राण छथि साँवर - गोर
किए कान्ह ओँधड़ेता भूपर
राधा किए बहओती नोर
आनक सुख - सोहाग देखतइ तऽ
किए हेतइ ककरो मन घोर
मोट डारिमेँ मचकी बान्हल
झूला झूलथु नन्दकिशोर
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| "बाध - बोन हरिअर भऽ गेल..." — The vibrant rebirth of nature in Mithila. |
कान पाथि केँ सुनब पहर भरि
गावथु प्रौढ़ा लोकनि मलार
भीजब हम भरि पोख पहर भरि
बदरा बरसओ मूसलधार
चोभब राढ़ी आम भदइया
शलहेशक हम करब सिङार
बिशहराक गहबर ओगरब गऽ
देखब गऽ लाबाक पथार
सूपक सूप उझिलता अइखन
पाछाँ बरू भऽ जेता देखार
बिला जेता भादबमेँ बिलकुल
मेघक लीलो अपरम्पार
कान पाथि केँ सुनब पहरभरि
गावथु प्रौढ़ा लोकनि मलार
लोचन-अंजन, जन मन रंजन
पावस ऋतु केँ करिअ प्रणाम
जनिक कृपासँ, जनिक स्नेहसँ
खेत-खेत कहवए वसुधाम
जनिक प्रतापेँ हरि विश्वंभर,
अन्नपूर्णा देवीक नाम
जनिक दया सँ वृक्ष वनस्पति
जनिक रसेँ फल-फूल ललाम
जनिकर ममतामय अनुशासन
गछने छथि ऋतुराज गुलाम
जनिक ऋणी छथि सातो सागर
जनिक प्रजा थिक सृष्टि तमाम
लोचन-अंजन, जन मन रंजन
पावस ऋतुकेँ करिअ प्रणाम
Saon Meaning & Detailed Analysis (साओन कविता का भावार्थ)
नागार्जुन (यात्री) की यह कविता केवल वर्षा ऋतु का वर्णन नहीं है, बल्कि यह मिथिला की संस्कृति, कृषि, और लोक-जीवन का एक समाजशास्त्रीय दस्तावेज (Sociological Document) है। आइए, इसके Saon meaning और विभिन्न आयामों को गहराई से समझते हैं:
1. प्रकृति का मानवीकरण और रौद्र रूप (Nature's Personification)
कवि ने प्रकृति का चित्रण अत्यंत सजीव किया है। 'परतीक कोँढ़' (बंजर धरती) का 'करेज जुड़ाएल' (हृदय शीतल होना) इस बात का प्रतीक है कि वर्षा केवल पानी नहीं, बल्कि जीवन है। बिजली (बिजुलत्ता) को एक चंचल नायिका (धोछिया) कहा गया है जो जुगनुओं (भगजोगनी) के साथ खेल रही है। यहाँ 'महाकाल' द्वारा 'टेमी' (दीपक की लौ) देने का बिम्ब अत्यंत शक्तिशाली है, जो जीवन के उद्भव को दर्शाता है।
2. लोक-जीवन और सांस्कृतिक उत्सव (Folk Life & Culture)
यात्री जी ने सावन को केवल मौसम नहीं, बल्कि उत्सवों का महीना बताया है।
- मधुश्रावणी: यह नवविवाहितों (नवतुरिया) का विशेष पर्व है, जिसे कवि ने 'चुमाओन मास' कहा है।
- राधा-कृष्ण का प्रेम: सावन में झूला झूलने की परंपरा को कवि ने अलौकिक प्रेम से जोड़ा है। 'नन्दकिशोर' और राधा का प्रसंग मानवीय प्रेम को दैवीय स्तर पर ले जाता है।
- लोक देवता: कविता में 'शलहेश' और 'बिशहरा' (विषहरी/मनसा देवी) की पूजा का उल्लेख है, जो मिथिला के दलित और पिछड़े वर्गों के प्रमुख देवता हैं। यह दिखाता है कि यात्री जी की दृष्टि कितनी व्यापक और समावेशी थी।
3. पावस ऋतु: जीवन का आधार (Monsoon as the Core of Life)
अंतिम पंक्तियों में कवि ने वर्षा (पावस) को 'अन्नपूर्णा' और 'विश्वंभर' कहा है। यह एक वैज्ञानिक सत्य भी है और आध्यात्मिक भी। वर्षा के बिना कृषि संभव नहीं, और कृषि के बिना जीवन नहीं। कवि कहते हैं कि सातों सागर और समस्त सृष्टि इस ऋतु की ऋणी है। यह कृतज्ञता का भाव ही भारतीय संस्कृति का मूल है।
इस प्रकार, 'साओन' (Saon) कविता प्रकृति, प्रेम, और समाज का एक सुंदर ताना-बाना है जो पाठक को मिथिला की मिट्टी से जोड़ देती है।
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निष्कर्ष
'साओन' (Saon) केवल बारिश की कविता नहीं है, यह मिथिला की आत्मा की अभिव्यक्ति है। यात्री जी ने इसमें प्रकृति, प्रेम और परंपरा को एक सूत्र में पिरोया है। ऐसी ही और रचनाओं के लिए साहित्यशाला से जुड़े रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'साओन' कविता के रचयिता कौन हैं?
साओन कविता के रचयिता बाबा नागार्जुन हैं, जो मैथिली में 'यात्री' उपनाम से लिखते थे।
इस कविता में किन लोक-देवताओं का उल्लेख है?
इस कविता में शलहेश (सलहेश) और बिशहरा (विषहरी/मनसा देवी) जैसे लोक-देवताओं का उल्लेख है।
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