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प्रेयसी - Preyasi | Vaidyanath Mishra "Yatri" Maithili Poems (Lyrics & Meaning)

मैथिली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और जनकवि वैद्यनाथ मिश्रा 'यात्री' (जिन्हें हिंदी साहित्य में बाबा नागार्जुन के नाम से जाना जाता है) की कविताएँ जन-जन की भावनाओं का दर्पण हैं। उनकी मैथिली रचनाओं में 'यात्री' उपनाम से लिखी गई कविताएँ विशेष स्थान रखती हैं।

आज हम उनकी एक अत्यंत भावपूर्ण कविता "प्रेयसी" (Preyasi) का रसास्वादन करेंगे। यह कविता दीर्घकालीन वियोग के बाद प्रेमी-प्रेमिका के पुनर्मिलन और प्रेम की निश्छलता को दर्शाती है।

A rural woman expressing tears and smiles simultaneously upon her husband's return, depicting the theme of Nagarjun's Maithili poem Preyasi.
"एक आँखि कनैत अछि जग एक आँखि हँसैत!" — The profound emotion of reunion.

प्रेयसी (Preyasi)

कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री"

ठाढ़ी भेली आबि तों तैखन कहाँसँ
हे हमर हीरा, हमर मोती, हमर हे सोन !
चिन्तनाक अथाह जलमे लगौलक डुबकी
- जखन ई मोन !

उठाओल चिरकाल सँ निहुँड़ल अपन ई माथ
कान्हपर जैखन देलह तों हाथ !
हे हृदय ! हे प्राण !

तों ने रहितह संगमे
तँ क' ने सकितहुँ हिमगिरिक अभियान !
रोहिणिया आमक सुपक्क गोपी जकाँ तों
करै छह सदिकाल गमगम सजनि हमरा हेतु
सकै छथि क की हमर ओ राहु आ, की केतु
जाबत तोंहि केंद्रमे छह राति-दिन साकांक्ष ?

Madhubani style art illustration of Yatri (Nagarjun) returning to his wife, symbolizing the themes of separation and love in Maithili literature.
A tribute to the timeless wait of 'Preyasi' and the return of 'Yatri'.

चिर वियोगक आगिमे
तोरा जखन हम ठेलि बनलहुँ
परिब्राजक एसगरे ओहि बेर सखी चुपचाप
कते सहने रह तों परिताप ?

बहुत दिन पर ज्ञान एतबा भेल जे हम
केहेन निष्ठुर केहेन निर्मम, केहेन पाषाण !
हे हृदय ! हे प्राण !
अपन इच्छापर तोहर आशाक कैलियहु होम
तों बनलि रहली सदै सखि मोम !

जखन तोरा लग एलहुँ फेर,
क्षमा कैलह हमर सब अपराध
कनियो ने लगौैलह देर !
बाजि उठली सुमुखि तों बिहँसैंत -
की करबैक लै एहिना एलैऐ ह्वैत !
एक आँखि कनैत अछि जग एक आँखि हँसैत !

कोनो कारणसँ कदाचित रहै अछि जँ स्त्री-पुरुष दुइ ठाम
बढ़ल जाइत छइ सिनेह, ने ह्वैत छैक विराम !
ह्वैत एलैऐ सदै संयोग आ, कि वियोग
हमहूँ लेलहूँ भोगि, ता' भोगबाक छल जे भोग !

एकसँ दू भेलहुँ प्रियतम,
आब मिली-जुलि क' सकब
हमरा लोकनि घरबाहरक कल्याण
आउ, स्वागत
हे हृदय ! हे प्राण !

भावार्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

यह कविता यात्री जी के निजी जीवन और उनकी पत्नी के प्रति उनके गहरे प्रेम का दस्तावेज है। जब कवि लंबे समय तक घुमक्कड़ी (परिव्राजक) जीवन जीने के बाद घर लौटते हैं, तो उन्हें अपनी पत्नी के त्याग और प्रेम की गहराई का अहसास होता है।

  • विरह और पश्चाताप: कवि स्वीकार करते हैं कि वे "निष्ठुर और निर्मम" थे जो अपनी पत्नी को विरह की आग में छोड़कर चले गए। यह भाव हमें विद्यापति के विरह गीतों की याद दिलाता है।
  • नारी का त्याग: पत्नी की क्षमाशीलता और उसका मुस्कुराकर स्वागत करना भारतीय नारी की महानता को दर्शाता है। "एक आँखि कनैत अछि जग एक आँखि हँसैत" - यह पंक्ति सुख-दुःख के संगम का अद्भुत उदाहरण है।
  • पुनर्मिलन: अंत में, कवि और उनकी प्रेयसी का मिलन केवल दो शरीरों का नहीं, बल्कि 'घर-बाहर' के कल्याण का संकल्प है।

यात्री जी की कविताओं में अक्सर मिथिला की माटी की सौंधी महक होती है। उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को जानने के लिए आप हमारा यह साक्षात्कार बाबा नागार्जुन इंटरव्यू 1986 पढ़ सकते हैं।

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निष्कर्ष

'प्रेयसी' केवल एक कविता नहीं, बल्कि प्रेम की विजय है। यह सिद्ध करती है कि सच्चा प्रेम दूरियों से कम नहीं होता, बल्कि और प्रगाढ़ होता है। यदि आप साहित्य के साथ-साथ हिंदी साहित्य के इतिहास में रुचि रखते हैं, तो हमारे अन्य लेख अवश्य पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'यात्री' किसका उपनाम है?

'यात्री' वैद्यनाथ मिश्रा का उपनाम है, जिन्हें हिंदी साहित्य में 'नागार्जुन' के नाम से जाना जाता है।

'प्रेयसी' कविता का मुख्य भाव क्या है?

इस कविता का मुख्य भाव विरह के बाद प्रेमी-प्रेमिका का मिलन और प्रेम की निश्छलता है।

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