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मिथिले - Mithile | Maithili Patriotic Poem by Baba Nagarjun (Yatri) | Meaning & Lyrics

मैथिली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और जनकवि बाबा नागार्जुन (जिन्हें मैथिली में 'यात्री' जी के नाम से जाना जाता है) की कविताएँ केवल शब्द नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा हैं।

आज हम उनकी एक अद्भुत देशभक्तिपूर्ण रचना "मिथिले" (Mithile) का रसास्वादन करेंगे। इस कविता में 'यात्री' जी ने मिथिला के गौरवशाली अतीत, ऋषियों की तपस्या, विद्वानों की प्रतिभा और वर्तमान की विडंबना का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। यह कविता हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपने इतिहास पर गर्व करने की प्रेरणा देती है।

A sage meditating in ancient Mithila, representing the spiritual heritage described in Baba Nagarjun's poem 'Mithile'.
"मुनिक शान्तिमय-पर्ण कुटीमे..." — Remembering the ancient spiritual glory of Mithila.

मिथिले (Mithile)

कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री"

मुनिक शान्तिमय-पर्ण कुटीमे,
तापसीक अचपल भृकुटीमे |
साम श्रवणरत श्रुतिक पुटीमे,
छन अहाँक आवास ||
बिसरि गेल छी से हम,
किन्तु नै झाँपल अछि इतिहास |

यज्ञ धूम संकुचित नयनमे,
कामधेनु-ख़ुर खनित अयन में |
मुनिक कन्याक प्रसून चयन में,
चल आहांक आमोद ||
स्मरणों जाकर करॆए अछि छन भरि,
सभ शोकक अपनोद |

शारदा-यति जयलापमे,
विद्यापति-कविता-कलापमे |
न्यायदेव नृप-पतिक प्रतापमे,
देखिय तोर महत्व ||
जाहि सं आनो कहेइच जे अछि,
मिथिलामे किछु तत्व |

Madhubani art illustration depicting the literary and intellectual history of Mithila, featuring symbols of Vidyapati and scholars.
"विद्यापति-कविता-कलापमे..." — A tribute to the land of scholars and poets.

कीर दम्पतिक तत्वादमे,
लखिमा कृत कविताक स्वादमे |
विजयि उद्यनक जयोन्माद मे,
अछि से अद्वूत शक्ति ||
जहि सं होएछ अधर्मारिकहुकें,
तव पद पंकज मे भक्ति |

धीर अयाची सागपात मे,
पद बद्ध प्रतिभा-प्रभातमे |
चल आहाँक उत्कर्ष,
ऒखन धरि जे झाप रहल अछि ||
हमर सभक अपकर्ष |

लक्ष्मीनाथक योगध्यान मे,
कवी चंद्रक कविताक गान में |
नृप रमशेवर उच्च ज्ञानमे,
आभा अमल आहाँक ||
विद्याबल विभवक गौरवमे,
अहँ ची थोर कहांक ?

भावार्थ और विश्लेषण (Meaning & Analysis)

इस कविता में यात्री जी ने मिथिला के प्राचीन गौरव को याद करते हुए वर्तमान पीढ़ी को जगाने का प्रयास किया है।

  • ऋषि परंपरा: कवि कहते हैं कि मिथिला का वास कभी ऋषियों की पर्णकुटी और तपस्वियों की भृकुटी में था। यद्यपि हम उसे भूल गए हैं, लेकिन इतिहास इसका गवाह है।
  • विद्वता और कला: कविता में विद्यापति, वाचस्पति मिश्र (शारदा-यति), और रानी लखिमा का उल्लेख है। यह बताता है कि मिथिला ज्ञान और कला का केंद्र रही है।
  • सादगी और त्याग: 'अयाची' जैसे विद्वान, जो साग-पात खाकर भी ज्ञान की साधना में लीन रहते थे, मिथिला के नैतिक उत्कर्ष का प्रतीक हैं।
  • आत्मनिरीक्षण: अंत में, कवि दुख व्यक्त करते हैं कि ऐसा गौरवशाली अतीत होने के बावजूद आज हम अवनति (अपकर्ष) की ओर क्यों हैं?

यह कविता केवल अतीत का गान नहीं है, बल्कि 'सच है विपत्ति जब आती है' जैसी रश्मिरथी की पंक्तियों की तरह हमें संघर्ष और पुनरुत्थान के लिए प्रेरित करती है।

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निष्कर्ष

'मिथिले' कविता हमें याद दिलाती है कि हम उस महान परंपरा के वाहक हैं जहाँ शस्त्र और शास्त्र दोनों का सम्मान होता था। यात्री जी की यह रचना हर मैथिल और भारतीय के लिए एक धरोहर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'मिथिले' कविता के रचयिता कौन हैं?

'मिथिले' कविता के रचयिता बाबा नागार्जुन हैं, जो मैथिली साहित्य में 'यात्री' नाम से प्रसिद्ध हैं।

इस कविता का मुख्य विषय क्या है?

इस कविता का मुख्य विषय मिथिला की प्राचीन गरिमा, विद्वता, त्याग और सांस्कृतिक समृद्धि का स्मरण करना है।

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