चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि: एक माता की पीड़ा, वात्सल्य और मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का अमर गीत
कल्पना कीजिए उस ऐतिहासिक क्षण की, जब एक अत्यंत कोमल और चन्द्रमा के समान शीतल कन्या (गौरी) के द्वार पर भस्म रमे, जटाधारी, गले में सर्प और बाघम्बर पहने हुए भगवान शिव वर के रूप में पधारते हैं। एक माता के हृदय पर उस क्षण क्या बीतती होगी? अपनी फूल सी बच्ची के लिए एक ऐसा "बेमेल" और डरावना वर देखकर किस माँ का कलेजा नहीं फट पड़ेगा?
यह कोई साधारण लोककथा नहीं है। भगवान शिव ने यह भयंकर रूप जानबूझकर धरा था, ताकि राजपरिवार के लौकिक अहंकार को तोड़ा जा सके और उनके समर्पण की असली परीक्षा ली जा सके। इसी गहरे वात्सल्य, सदमे, और ईश्वरीय लीला के अद्भुत मनोवैज्ञानिक संगम को महाकवि विद्यापति ने अपनी कालजयी रचना "चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि" (Chandramukhi San Gauri Hamar Chhaith) में पिरोया है।
मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में इसे एक पवित्र 'महेशवाणी' (Maheshwani) के रूप में पूजा जाता है। चाहे बात मिथिला के किसी भी गाँव में होने वाले पारंपरिक विवाह (Maithili Vivah Geet) की हो, या फिर देवघर (Baba Baidyanath) में बसंत पंचमी के दिन होने वाले ऐतिहासिक शिव-तिलकोत्सव की, यह गीत आज भी पूरे वातावरण को शिवमय और भावुक कर देता है।
🎵 गीत विवरण (Song Details)
| गीत का नाम: | Chandramukhi San Gauri Hamar Chhaith (चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि) |
| रचनाकार (Poet): | Mahakavi Vidyapati (महाकवि विद्यापति) |
| विधा (Genre): | Maheshwani / Nachari / Vivah Geet (महेशवाणी / नचारी) |
| प्रसंग (Context): | Shiv-Parvati Vivah (माता मैना का विलाप) |
📝 चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि - Maithili Lyrics (मैथिली / देवनागरी)
गे माई चंद्रमुखी सन, गौड़ी हमर छथि
सुरुज सन करितौं जमाई.....
नारद के हम की रे बिगाड़लौं
जिन बूढ़ आनल जमाई,
गे माई एहेन सुनरि धिया,
तिनको केहेन पिया,
नारद आनल उठाई,
गे माई.....
परिछन चलली माई मनाईन (सुनैना)
वर देखि खसलि झमाई,
गे माई हम नै बियाहब, ईहो तपसि वर
मोरी धिया रहती कुमारी,
गे माई.....
कहथिन गौड़ी सुनू हे सदाशिव
एक बेर रूप देखाऊ,
गे माई देखी जुड़ाईत माई मनाईन
देखत नगर समाज,
गे माई.....
भनहि विद्यापति सुनु हे मनाईन
इहो थिका त्रिभुवन नाथ,
गे माई करम लिखल छल
ईहो तपसि वर
लिखल मेटल नहि जाय.....
गे माई चंद्रमुखी सन, गौड़ी हमर छथि
सुरुज सन करितौं जमाई।
🔤 Chandramukhi San Gauri Hamar Chhaith - English / Roman Lyrics
Ge maai chandramukhi san, Gauri hamar chhaith,
Suruj san karitau jamaai.....
Naarad ke hum ki re bigadlau,
Jin budh aanal jamaai,
Ge maai, ehen sunar dhiya,
Tinko kehen piya,
Naarad aanal uthaai,
Ge maai.....
Parichhan chalali maai manayin,
Var dekhi khasali jhamaai,
Ge maai, hum nai biyahab eho tapasi var,
Mori dhiya rahati kumari,
Ge maai.....
Kahthin Gauri sunu he Sadashiv,
Ek ber roop dekhaau,
Ge maai, dekhi jurayit maai manayin,
Dekhat nagar samaj,
Ge maai.....
Bhanahi Vidyapati sunu he manayin,
Eho thika tribhuwan naath,
Ge maai, karam likhal chhal, eho tapasi var,
Likhal metal nahi jaai,
Ge maai Chandramukhi san,
Gauri hamar chhaith,
Suruj san karitau jamaai.
📖 भावार्थ एवं सघन साहित्यिक विश्लेषण (Deep Literary Analysis)
यह अद्भुत नचारी और महेशवाणी मात्र एक विवाह गीत नहीं है, बल्कि यह एक माता के हृदय की उस स्वाभाविक पीड़ा, अंतर्द्वंद्व और विद्रोह को दर्शाता है, जो अपनी सुकोमल पुत्री के लिए एक बेमेल वर को देखकर उत्पन्न होती है। विद्यापति ने यहाँ वात्सल्य रस को पराकाष्ठा पर पहुँचाया है:
- प्रथम पद का मर्म: माता मैना विलाप करते हुए कहती हैं कि मेरी बेटी गौरी चंद्रमा के समान सुंदर, शीतल और लाडली है। एक माँ होने के नाते मेरी हार्दिक कामना थी कि मेरा दामाद सूर्य के समान तेजस्वी, ओजस्वी और प्रतापी होगा। लेकिन यह क्या हो गया? यहाँ विद्यापति ने 'चन्द्र' (गौरी की कोमलता) और 'सूर्य' (वर की तेजस्विता) का बेहतरीन साहित्यिक विरोधाभास प्रस्तुत किया है।
- द्वितीय पद का विद्रोह: वह क्रोधित और व्यथित होकर कहती हैं कि मैंने देवर्षि नारद (अगवान/Matchmaker) का क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने प्रतिशोध स्वरूप ऐसा बूढ़ा, जटाधारी और वैरागी दामाद मेरे द्वार पर ला खड़ा किया? मेरी इतनी सुंदर पुत्री के लिए नारद जी कैसा पति उठा लाए हैं! यह पंक्ति मिथिला की उस लोक-परंपरा को दर्शाती है जहाँ विवाह बिगड़ने पर अगुआ (Matchmaker) को उलाहना दिया जाता है।
- तृतीय पद का मानसिक आघात (The Trauma of Parichhan): जब माता मैना 'परिछन' (विवाह की वह रस्म जहाँ सास दामाद का स्वागत करती है) के लिए द्वार पर जाती हैं, तो शिव के भयंकर, बाघम्बर धारी, और भूत-प्रेतों से घिरे रूप को देखकर 'झमाई' (मूर्छित होकर) खाकर गिर पड़ती हैं। यहाँ माता का विद्रोह चरम पर पहुँचता है— "मैं अपनी बेटी को जीवन भर कुंवारी रख लूंगी, लेकिन इस तपस्वी से उसका विवाह हरगिज नहीं करूंगी।" यह उस प्राचीन काल में एक स्त्री (माता) की स्वतंत्र इच्छा (Female Agency) का अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी उद्घोष है।
- चतुर्थ पद का समन्वय: अपनी माता की यह दयनीय दशा और समाज का उपहास देखकर माता पार्वती (जो शिव के वास्तविक रूप को जानती हैं), भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि "हे सदाशिव! कृपा करके एक बार अपना वास्तविक, मनमोहक और दिव्य रूप दिखा दीजिए, ताकि मेरी माता और नगरवासियों के हृदय को शांति मिले।" पार्वती यहाँ लोक (समाज) और परलोक (ईश्वर) के बीच सेतु का कार्य कर रही हैं।
- अंतिम पद (विद्यापति का दर्शन): महाकवि विद्यापति अंत में माता मैना को समझाते हुए एक दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि "हे माता! जिन्हें आप एक साधारण, बूढ़ा और दरिद्र तपस्वी समझ कर रो रही हैं, वे वास्तव में तीनों लोकों के स्वामी (त्रिभुवन नाथ) हैं।" विधाता ने जो भाग्य में लिख दिया है, उस कर्म-लेख को कोई नहीं मिटा सकता, अतः ईश्वर की लीला को स्वीकार करें।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ (Glossary for Readers):
- मनाईन (Manayin): माता मैना (हिमालय पर्वत की पत्नी और माता पार्वती की माँ)। लोकगीतों में उच्चारण के प्रवाह के कारण कई जगह इन्हें 'सुनैना' भी गा दिया जाता है।
- खसलि झमाई (Khasali Jhamaai): घबराहट या सदमे से चक्कर खाकर गिर पड़ना (मूर्छित हो जाना)। यह एक अत्यंत ठेठ और जीवंत मैथिली मुहावरा है।
- परिछन (Parichhan): मिथिला संस्कृति में वर के दरवाजे पर आने पर स्त्रियों द्वारा किये जाने वाले स्वागत और आरती की पारंपरिक रस्म।
- थिका (Thika): हैं (सम्मानसूचक - Is/Are)।
- धिया (Dhiya): पुत्री / बेटी।
🏛 मैथिली समाज में 'माता मैना' का प्रतीक (Symbolism of Mata Maina)
विद्यापति की इस महेशवाणी को यदि हम मैथिली साहित्य की आलोचनात्मक दृष्टि से देखें, तो माता मैना केवल एक पौराणिक पात्र नहीं रह जातीं। वह मिथिला की हर उस "लोक माता" का प्रतीक बन जाती हैं, जो अपनी बेटी के सुरक्षित और सुखद भविष्य के लिए चिंतित रहती है।
१. माँ का वात्सल्य vs धर्म (Mother's Love vs. Religious Duty)
एक तरफ धर्म कहता है कि शिव ही परमेश्वर हैं, लेकिन एक माँ का वात्सल्य इस ईश्वरीय तर्क को खारिज कर देता है। मैना के लिए वह "त्रिभुवन नाथ" बाद में हैं, पहले वह एक "बूढ़ा और दरिद्र तपस्वी" हैं, जो उनकी सुकोमल बेटी के योग्य नहीं है। यह लोक (Folk) का ईश्वर (God) के सामने खड़ा होना है।
२. बेटी का भविष्य और स्त्री का विद्रोह (Daughter's Future & Rebellion)
"मोरी धिया रहती कुमारी" कहकर माता मैना तत्कालीन समाज के सबसे बड़े डर (बेटी को अविवाहित रखना) को चुनौती देती हैं। यह विद्यापति के काव्य में स्त्री सशक्तिकरण का एक अनकहा लेकिन बेहद मजबूत पहलू है।
🎥 इस गीत के लोकप्रिय श्रव्य संस्करण (Listen to the Song)
नीचे दिए गए वीडियो के माध्यम से आप इस पारंपरिक गीत का आनंद ले सकते हैं। इसे अनामिका झा, रजनी पल्लवी जैसी प्रसिद्ध गायिकाओं ने अपनी सुमधुर आवाज दी है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि' गीत की रचना किसने की है?
इस अत्यंत भावपूर्ण गीत (महेशवाणी) की रचना मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति ने 14वीं-15वीं शताब्दी में की थी।
2. यह गीत मुख्य रूप से किस अवसर पर गाया जाता है?
यह गीत मिथिलांचल में विवाह के अवसर पर, विशेषकर 'परिछन' के समय, तथा महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी (बाबा बैद्यनाथ के तिलकोत्सव) के पावन पर्व पर महिलाओं द्वारा गाया जाता है। (बाबा बैद्यनाथ से जुड़े अन्य भक्ति गीत यहाँ पढ़ें)
3. 'महेशवाणी' और 'नचारी' में क्या बुनियादी अंतर है?
यह एक बहुत ही सामान्य भ्रम है। 'नचारी' विशुद्ध रूप से भगवान शिव की भक्ति, स्तुति और वंदना के गीत होते हैं। इसके विपरीत, 'महेशवाणी' मुख्य रूप से शिव-पार्वती के पारिवारिक जीवन, उनके विवाह प्रसंग, और माता मैना के वात्सल्य, क्रोध या शिकायत पर आधारित लोकगीत होते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
"चन्द्रमुखी सन गौड़ी हमर छथि" मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही मिथिला की भावना, मातृत्व और अध्यात्म का सजीव प्रतीक है। महाकवि विद्यापति की यह रचना आज भी हमारे समाज और संस्कारों में उतनी ही प्रासंगिक और जीवित है।
आपको यह गीत और इसका गहन साहित्यिक भावार्थ कैसा लगा? कृपया नीचे कमेंट करके अपने विचार अवश्य साझा करें।
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