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पसेनाक गुण-धर्म - Pasenak Gun-Dharm | Vaidyanath Mishra "Yatri" (Nagarjun)

मैथिली साहित्य के आधुनिक काल के स्तम्भ वैद्यनाथ मिश्रा 'यात्री' (जिन्हें हिंदी जगत नागार्जुन के नाम से जानता है) की लेखनी सदैव शोषितों और श्रमिकों की आवाज़ रही है। उनकी कविताएँ केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण हैं।

आज हम उनकी एक अद्भुत कविता "पसेनाक गुण-धर्म" (Pasenak Gun-Dharm) का पाठ करेंगे। जहाँ विज्ञान पसीने को केवल रासायनिक तत्वों का मिश्रण मानता है, वहीं 'यात्री' जी एक रिक्शा चालक (Rickshaw Puller) और किसान के पसीने में जीवन के संघर्ष और ऊर्जा को देखते हैं। यह कविता नागार्जुन की मैथिली कविताओं के संग्रह में एक विशेष स्थान रखती है।

Pasenak Gun-Dharm - Maithili Poem on Hard Labor and Farmers by Yatri
श्रम और पसीने का मोल: यात्री जी की नज़र से।

पसेनाक गुण-धर्म

कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री"

क्षार-अम्ल
विगलनकारी, दाहक
रेचक, उर्वरक...
रिक्शाबलाक पीठ दिशुका फाटल तार-तार बनियाइन
पसेनाक अधिकांश गुण धर्मकेँ
कए रहल अछि प्रमाणित।

मोन होइए हमरा
विज्ञानक कोनो छात्रसँ जा कँए पुछिअइन-
बेशी सँ बेशी की सभ होइत छइक
पसेनाक गुण-धर्म!

रिक्शाबलाक पोठक चाम
आओर कते शुष्क श्याम हेतइ?
स्नयुतंतुक ऊर्जा आओर कते धरकतइ?
एहि नरवाहनक प्राणशक्ति आओर कते सिद्ध हेतइ?
आओर कत्ते
क्षार- अम्ल, दाहक - विगलनकारी...

भावार्थ और विश्लेषण (Poem Analysis)

इस कविता में यात्री जी ने विज्ञान और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक तीखा व्यंग्य (Satire) प्रस्तुत किया है।

  • विज्ञान बनाम जीवन: विज्ञान के लिए पसीना केवल क्षार (Base), अम्ल (Acid), और लवण का मिश्रण हो सकता है। लेकिन कवि के लिए, रिक्शा वाले की फटी बनियान उस पसीने की 'दाहक' (Burning) शक्ति का प्रमाण है।
  • श्रम का सौंदर्य: जैसे बादल को घिरते देखा है में नागार्जुन प्रकृति का वर्णन करते हैं, वैसे ही यहाँ वे 'नरवाहन' (मनुष्य रूपी वाहन/रिक्शा चालक) की 'प्राणशक्ति' का वर्णन करते हैं।
  • सामाजिक प्रश्न: कवि पूछते हैं कि आखिर एक मज़दूर की चमड़ी और कितनी 'शुष्क और श्याम' (काली और सूखी) होगी? क्या उसकी मेहनत का कोई अंत है? यह प्रश्न समाज की व्यवस्था पर एक चोट है।

यदि आप मैथिली साहित्य की जड़ों को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो महाकवि विद्यापति की रचनाओं और नभ नचारी जैसी पारंपरिक विधाओं को अवश्य पढ़ें।

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निष्कर्ष

'पसेनाक गुण-धर्म' हमें सिखाती है कि श्रम का सम्मान किसी भी वैज्ञानिक परिभाषा से बड़ा है। यात्री जी की यह दृष्टि उन्हें जन-कवि बनाती है। साहित्यशाला पर मैथिली साहित्य की ऐसी ही अमूल्य धरोहरों को पढ़ते रहें।

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