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नब नचारी (Nab Nachari) - बाबा नागार्जुन "यात्री" | Maithili Poem

नब नचारी कविता – बाबा नागार्जुन "यात्री" की प्रसिद्ध मैथिली रचना

मैथिली साहित्य के जनकवि वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" की प्रखर व्यंग्य कविता

यहाँ प्रस्तुत है मैथिली साहित्य के महान जनकवि बाबा नागार्जुन "यात्री" जी की कालजयी और सामाजिक व्यंग्य से भरी कविता 'नब नचारी' (Nab Nachari)। यह कविता सीधे तौर पर बाबा बैद्यनाथ (भगवान शिव) को संबोधित करते हुए रची गई है, जो समाज में व्याप्त घोर गरीबी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था की विफलता पर एक तीक्ष्ण प्रहार करती है। 'यात्री' जी की यह प्रसिद्ध मैथिली कविता (Maithili Poem) अपने बेबाक और विद्रोही अंदाज़ के लिए जानी जाती है।

अगड़ाही लागउ, वज्र खसउ,
बरू किच्छु होउक...
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !

नब नचारी कविता बाबा नागार्जुन मैथिली कविता शिव संदर्भ

बेत्रेक अन्न भ’ रहल आँट नेना-भुटका
दुबरैल आंगुरें कल्लर सभ बीछए झिटुका
मकड़ाक जालसँ बेढ़ल छइ चुलहाक मूँह
थारी-गिलास सब बेचि बिकिनि खा गेलइ, ऊँह

कैंचा जकरा से, खाए भात
क’ रहल मौज से, जकरा छइ कोनो गतात
सरकारी राशन द’ रहलइए-
अन्हरागाँही चउबरदामे चाँइ-चोर

आन्हर-बहीर, बम्भोला !
तोरा पर उठैत अछि तामस हमरा बड्ड जोर
गौरी पहिरथि फाटल भूआ
कार्तिक-गणेश छथि गीड़ि रहल

उसिनल अगबे अल्हुआक पात
बइमान बापसँ की माँगथु ग’ दालि-भात
अपने पबैत छह भोग छप्पनो परकारक
अनका लेखें तँ दुर्लभ छइ आको धथूर

बुझि पड़ितहु जँ सुनितहक-
उपासल कमरथुआ केर मुइल सूर !
बरू किच्छु कह’
पचकल लोढ़ा, तों धन्न रह’

नहि आब नचारी केओ गओतहु !
जे बूड़ि हैत से बोकिअओतहु !

नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस ....
माटिक महत्तवकें चीन्हि लेलक ई देश-कोश !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !

- बाबा नागार्जुन "यात्री"

नब नचारी कविता केर भावार्थ (Meaning)

"नब नचारी" बाबा नागार्जुन की एक अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी रचना है। इस कविता में कवि भगवान शिव (बाबा बैद्यनाथ) को उलाहना दे रहे हैं। कवि कहते हैं कि तुम्हारे दरिद्र भक्त भूख से तड़प रहे हैं, बच्चों को अन्न का दाना नसीब नहीं हो रहा है और चूल्हे में मकड़ी के जाले लग गए हैं।

सरकारी राशन की व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कवि बताते हैं कि कैसे भ्रष्ट लोग गरीबों का हक मार रहे हैं। कवि शिव पर व्यंग्य करते हैं कि हे भोलेनाथ! तुम तो छप्पन भोग पा रहे हो, लेकिन यहाँ तुम्हारे ही भक्तों के लिए धतूरा तक दुर्लभ हो गया है। यह कविता मात्र ईश्वर से शिकायत नहीं है, बल्कि उस समय की (और आज की भी) चरमराती सामाजिक व्यवस्था, भुखमरी और पाखंड पर एक ज़ोरदार तमाचा है।

बाबा नागार्जुनक मैथिली साहित्य में योगदान

बाबा नागार्जुन (मूल नाम: वैद्यनाथ मिश्र) आधुनिक हिन्दी और मैथिली साहित्य के अप्रतिम हस्ताक्षर हैं। मैथिली में वे 'यात्री' उपनाम से लिखते थे। उनकी कविताओं में लोकचेतना, प्रतिरोध और ज़मीनी हक़ीक़त की गूंज सुनाई देती है। मैथिली साहित्य में उनके कविता संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 'नब नचारी' उनकी इसी विद्रोही विचारधारा का एक सशक्त उदाहरण है।

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नब नचारी कविता का सस्वर पाठ यहाँ सुनिए:

अक्सर पूछल जाए वाला प्रश्न (FAQs)

प्र. नब नचारी कविता के रचयिता कौन हैं?

उ. यह कविता मैथिली साहित्य के महान जनकवि वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (बाबा नागार्जुन) द्वारा रची गई है।

प्र. 'नब नचारी' में बाबा नागार्जुन ने किस पर व्यंग्य किया है?

उ. इस कविता में भगवान शिव (बाबा बैद्यनाथ) के माध्यम से समाज की घोर गरीबी, भ्रष्ट व्यवस्था और धार्मिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया गया है।

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