मैथिली साहित्य के देदीप्यमान नक्षत्र कविवर सीताराम झा की लेखनी ने न केवल ज्योतिष और व्याकरण को समृद्ध किया, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को भी जगाया। उनकी प्रसिद्ध कविता "स्वदेशमहिमा" (Swadeshmahima) देशभक्ति का एक ऐसा मंत्र है जो हमें अपनी मिट्टी से जोड़ता है।
जिस प्रकार हम गणतंत्र दिवस पर हिंदी कविताएँ पढ़कर गर्व महसूस करते हैं, उसी प्रकार 'स्वदेशमहिमा' हर मैथिल के हृदय में स्वाभिमान भर देती है। इस कविता में कवि ने सिद्ध किया है कि अपनी मातृभूमि का सुख, स्वर्ग और मोक्ष (अपवर्ग) से भी बढ़कर है। आइये, इस कालजयी रचना का पाठ करें और इसका अर्थ समझें।
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| "नै बिसरै’ अछि कीर तथापि... निज नीड़" — Even in a golden cage, the soul longs for its own home. |
स्वदेशमहिमा (Swadeshmahima)
कवि: सीताराम झा
1. उत्कर्ष (Comparison)
सम्प्रति पण्डितवृन्दक हो गणना,
जहि रूप गणेशक सम्मुख,
अंडिक तेलक दीपक टेम
यथा लघु होइछ गेसक सम्मुख,
तुच्छ यथा चमरी-मृग पुच्छक
बाल सुकामिनि-केशक सम्मुख,
स्वर्ग तथा अपवर्ग दुहू सुख
होइछ तुच्छ स्वदेशक सम्मुख।
2. उदाहरण (Example)
सोनक मन्दिरमे निशि-वासर
वास, स्वयं टहलू पुनि भूपति,
भोजन दाड़िम दाख, सुधा-
रस-पान, सखा नरराजक सन्तति,
पाठ सदा हरि-नाम सभा बिच,
पाबि एते सुख-साधन सम्पति,
नै बिसरै’ अछि कीर तथापि
अहा ! निज नीड़ सम्बन्धुक संगति।
3. निष्कर्ष (Conclusion)
मैथिल वृन्द ! उठू मिलि आबहूँ
काज करू जकरा अछि जे सक,
पैर विचारि धरू सब क्यौ
तहि ठाम जतै नहि हो भय ठेसक,
पालन जे न करैछ कुल-क्रम-
आगत भाषण-भूषण-भेषक
से लघु कूकूर-कीड़हुसौं
जकरा नहि निश्छल भक्ति स्वदेशक।
कविता का भावार्थ (Meaning & Analysis)
सीताराम झा की यह कविता "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" (माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं) के सिद्धांत को प्रतिपादित करती है।
1. स्वदेश के सामने स्वर्ग भी तुच्छ है
कवि तुलना करते हुए कहते हैं कि जैसे गैस की तेज रोशनी के सामने 'अंडी' (Castor) के तेल का दीपक मद्धिम पड़ जाता है, या जैसे सुंदर स्त्री के बालों के सामने 'चमरी गाय' की पूंछ तुच्छ लगती है—ठीक वैसे ही 'स्वर्ग' और 'मोक्ष' (अपवर्ग) का सुख भी अपनी मातृभूमि (स्वदेश) के सुख के सामने अत्यंत छोटा है।
2. सोने के पिंजरे का तोता (कीर)
कवि एक तोते का उदाहरण देते हैं। भले ही उसे सोने के पिंजरे में रखा जाए, राजा स्वयं उसकी सेवा करे, खाने को अनार (दाड़िम) और अंगूर (दाख) मिले, और वह राजसभा में भगवान का नाम ले—फिर भी, वह अपने घोंसले (निज नीड़) और अपने साथियों की संगति को कभी नहीं भूलता। यह बताता है कि विदेशी विलासिता से बेहतर अपना घर है।
3. मैथिलों का आह्वान
अंतिम छंद में कवि मैथिल समाज को जगाते हैं। वे कहते हैं कि अब उठो और जिसे जो भी कार्य आता है (सक), वह देश के लिए करो। वे कठोर शब्दों में कहते हैं कि वह व्यक्ति कुत्ते और कीड़े से भी तुच्छ है, जिसके मन में अपने देश के प्रति निश्छल भक्ति नहीं है और जो अपनी कुल-परंपरा और वेशभूषा का सम्मान नहीं करता।
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| "अंडिक तेलक दीपक टेम..." — The humble light of the motherland shines brighter than foreign glitter. |
यह भाव हमें बाबा नागार्जुन की 'मिथिले' कविता की याद दिलाता है, जहाँ वे भी अतीत के गौरव को याद कर वर्तमान को जगाते हैं।
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निष्कर्ष
'स्वदेशमहिमा' हमें सिखाती है कि सुख-सुविधाएँ विदेशी हो सकती हैं, लेकिन शांति केवल अपने घर, अपने देश में मिलती है। सीताराम झा का यह संदेश आज के वैश्विक युग में और भी प्रासंगिक हो गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'स्वदेशमहिमा' कविता के कवि कौन हैं?
इस कविता के रचयिता प्रख्यात मैथिली कवि और ज्योतिषी सीताराम झा हैं।
इस कविता में 'कीर' (तोता) का उदाहरण क्यों दिया गया है?
कवि ने तोते का उदाहरण देकर समझाया है कि सोने के पिंजरे और राजसी सुख के बावजूद, जीव को अपने प्राकृतिक घर (नीड़) और स्वजनों की ही याद आती है, जो स्वदेश प्रेम का प्रतीक है।
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