छीप पर रहओ नचैत - Chip Par Rahau Nachait | Maithili Poem by Baba Nagarjun (Yatri) | Meaning & Analysis
मैथिली साहित्य के शिखर पुरुष वैद्यनाथ मिश्रा 'यात्री' (जिन्हें हिंदी साहित्य में बाबा नागार्जुन के नाम से जाना जाता है) की लेखनी में केवल विद्रोह ही नहीं, बल्कि गहरा दार्शनिक चिंतन भी है। उनका जीवन और संघर्ष उनकी कविताओं में स्पष्ट झलकता है।
आज हम उनकी एक प्रतीकात्मक कविता "छीप पर रहओ नचैत" (Chip Par Rahau Nachait) का पाठ और विश्लेषण करेंगे। यह कविता 'दीप-शिखा' (Flame) और 'शलभ' (Moth) के माध्यम से जीवन, बलिदान और अस्तित्व के विलय की कथा कहती है। जहाँ उनकी कविता 'भावी पीढ़ीक दर्द' सामाजिक यथार्थ को दिखाती है, वहीं यह कविता आध्यात्मिक गहराई को छूती है।
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| "नाचथु शलभ - समाज..." — The eternal dance of sacrifice around the golden flame. |
छीप पर रहओ नचैत
कवि: वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री"
छीप पर रहओ नचैत
कनकाभ शिखा
उगिलैत रहओ स्निग्ध बाती
भरि राति मृदु - मृदु तरल ज्योति
नाचथु शलभ - समाज
उत्तेजित आबथु जाथु
होएत हमर अंगराग हुतात्मक भस्म
सगौरव सुप्रतिष्ठ हरितहि हम रहबे
दीअटिक जड़िसँ के करत बेदखल हमरा
ने जानि, कहिआ, कोन युगमेँ
भेटल छल वरदान
आकल्प हम रहल बइसल दीप देवताक कोर मेँ
भावार्थ और साहित्यिक विश्लेषण (Analysis)
इस छोटी सी कविता में यात्री जी ने जीवन की नश्वरता और अमरता के द्वंद्व को बहुत ही सुंदर प्रतीकों के माध्यम से उभारा है।
1. कनकाभ शिखा (The Golden Flame)
कवि 'छीप' (दीपक का आधार) पर नाचती हुई 'कनकाभ शिखा' (सोने जैसी चमकती लौ) का वर्णन करते हैं। यह लौ जीवन की ऊर्जा और निरंतरता का प्रतीक है। 'स्निग्ध बाती' (तेल से भीगी बाती) निरंतर प्रकाश दे रही है, जो जीवन के संघर्षों के बीच आशा की किरण है।
2. शलभ और बलिदान (The Moth's Sacrifice)
कवि कहते हैं - "नाचथु शलभ - समाज"। शलभ (पतंगे) ज्योति के आकर्षण में आते हैं और जलकर भस्म हो जाते हैं। लेकिन कवि इसे मृत्यु नहीं मानते। वे कहते हैं कि यह भस्म लौ का 'अंगराग' (शृंगार) बन जाती है। यह पंक्ति बलिदान की सार्थकता को दर्शाती है—कि महान उद्देश्य में मिट जाना ही वास्तविक जीवन है।
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| "आकल्प हम रहल बइसल..." — Resting eternally in the lap of the Light. |
3. शाश्वत अस्तित्व (Eternal Existence)
अंतिम पंक्तियों में कवि 'दीप देवता' की गोद में अपने स्थान को शाश्वत बताते हैं। "दीअटिक जड़िसँ के करत बेदखल हमरा"—यह पंक्ति अस्तित्व के उस आत्मविश्वास को दिखाती है जो 'स्वदेशमहिमा' में भी झलकता है। कवि मानते हैं कि सृजन और प्रकाश का यह संबंध युगों-युगों से चला आ रहा है और अनंत काल (आकल्प) तक रहेगा।
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- बाबा नागार्जुन: जीवन परिचय और साहित्य (Biography)
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निष्कर्ष
'छीप पर रहओ नचैत' हमें सिखाती है कि जीवन का उद्देश्य केवल जलना नहीं, बल्कि उस जलने में भी एक सार्थकता ढूँढना है। यात्री जी की यह दार्शनिक दृष्टि उन्हें मैथिली साहित्य में अद्वितीय बनाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'छीप पर रहओ नचैत' कविता के रचयिता कौन हैं?
इस कविता के रचयिता बाबा नागार्जुन हैं, जो मैथिली में 'यात्री' उपनाम से लिखते थे।
इस कविता में 'शलभ' किसका प्रतीक है?
'शलभ' (पतंगा) उन बलिदानियों और समर्पित आत्माओं का प्रतीक है जो उच्च आदर्शों (दीपक की लौ) के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।
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