मैथिली साहित्य में सामाजिक चेतना और व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर उपेन्द्र दोषी (Upendra Doshi) की कविताएँ पाठक को झकझोरने की क्षमता रखती हैं। उनकी रचना "भावी पीढ़ीक दर्द" (Bhaavik Peedhi Dard) केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।
इस कविता में कवि ने वर्तमान व्यवस्था (System) की चापलूसी, भ्रष्टाचार और उस 'कर्ज' (Debt) की बात की है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ रहे हैं। जिस तरह 'गोठ बिछनी' में गरीबी का चित्रण है, वैसे ही यहाँ 'बौद्धिक और आर्थिक दिवालियेपन' का चित्रण है। आइये, इस मर्मस्पर्शी कविता का पाठ करें और इसका अर्थ समझें।
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| "अहाँक व्यवस्था बड़ तीत..." — A satire on the bitter system. |
भावी पीढ़ीक दर्द (Bhaavik Peedhi Dard)
कवि: उपेन्द्र दोषी
मीत !
अहाँक व्यवस्था बड़ तीत-
इएह कहबा लेल
हम बेर-बेर साहस क’ क’ जाइत छी
मुदा, अहाँक कंचन-कादम्बक रसमे
ओझरा क’ हम
जिलेबीक रसमे अकबकाइत
माछी भ’ जाइत छी
अहाँक ‘जी हँ, जी हँ’क हेतु
अभ्यस्त हमर जीह
दोसरक व्यवहारक माधुर्यक
भोग कर’ नहि दैत अछि।
दोसरक यशःकाय शरीर लग
पद-धूलि जकाँ झर’ नहि दैत अधि।
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| "जिलेबीक रसमे अकबकाइत..." — Trapped in the sweet poison of a corrupt system. |
मीत !
जखन-जखन अपन पुरखाक
अरजल कर्जक दर्द
हमर दड़कल करेजमे उठैत अछि,
त’ भावी पीढ़ीक दर्द मोन पड़ि जाइत अछि
आ’ अपन दर्दक संग हम भावी पीढ़ीक
दर्दक अज्ञात पीड़ा भोग’ लगैत छी।
अतीतकें तमसक गर्तमे गोंतनिहार,
वर्तमान पर काजर पोतनिहार,
आ भविष्य पर प्रश्न-चिन्ह टँगनिहार
अहाँक दलाली नीति सभकें बूझल छैक।
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| "अरजल कर्जक दर्द..." — The heavy burden of ancestral debt on the future generation. |
राजा जनकक धरती चीड़ब आ’
सीताकें धरतीसँ उपजि
पुनि धरतीयेमे समा जाएब-
किताबक पन्ना जकाँ खूजल छैक।
तें, होइए चिकड़ि क’
गर्दमिसान क’ दी-
ओ अजन्मा भगीरथ !
पहिने पीढ़ीक उद्धार करू
तखन एहि बिकायलि धरती पर पैर धरू
ओना, अहाँक नाम,
महाजनक खातामे टिपा गेल अछि,
सूदि सहित मूर सभ लिखा गेल अछि,
जन्म लेवा सँक नाम,
महाजनक खातामे टिपा गेल अछि,
सूदि सहित मूर सभ लिखा गेल अछि,
जन्म लेवा सँ पूर्वहि अहाँक
जीवन बिका गेल अछि।
भावार्थ और साहित्यिक विश्लेषण (Poem Analysis)
उपेन्द्र दोषी की यह कविता आधुनिक समाज के नैतिक पतन और आर्थिक दासता पर एक तीखा प्रहार है। कवि अपने 'मीत' (मित्र/समाज) को संबोधित करते हुए व्यवस्था की कड़वी सच्चाई (तीत) उजागर करते हैं।
1. व्यवस्था का 'जलेबी रस' (The Trap of Corruption)
कवि कहते हैं कि वे सच बोलना चाहते हैं, लेकिन व्यवस्था का प्रलोभन (कंचन-कादम्बक रस) इतना गहरा है कि व्यक्ति 'जलेबी के रस में फंसी मक्खी' (माछी) बन जाता है। हमारी जीभ चापलूसी ('जी हाँ, जी हाँ') की इतनी आदी हो गई है कि हम सच बोलने का साहस खो चुके हैं।
2. कर्ज का दर्द और महाजन (The Burden of Debt)
कविता का सबसे दर्दनाक पहलू 'पुरखों का कर्ज' है। यहाँ 'कर्ज' केवल आर्थिक ऋण (Financial Debt) नहीं है, बल्कि नैतिक और सामाजिक गिरावट भी है। कवि कहते हैं कि जो बच्चा अभी जन्मा भी नहीं है (अजन्मा भगीरथ), उसका नाम भी 'महाजन' के खाते में लिख दिया गया है। उसका जीवन पैदा होने से पहले ही 'बिक' चुका है।
3. मिथिला की अस्मिता का ह्रास
कवि स्वदेश महिमा को याद करते हुए कहते हैं कि यह राजा जनक और सीता की धरती थी, लेकिन आज 'दलाली नीति' ने अतीत को अंधेरे में और वर्तमान को कालिख (काजर) से पोत दिया है। कवि आने वाली पीढ़ी (अजन्मा भगीरथ) का आह्वान करते हैं कि वे इस बिकी हुई धरती पर पैर रखने से पहले अपने अस्तित्व का उद्धार करें।
यह कविता गंगेश गुंजन की 'इजोत लए' की तरह ही सामाजिक अंधेरे को दिखाती है।
साहित्यशाला पर अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ
- करूणा भरल ई गीत हम्मर: मानवीय संवेदनाओं और टूटे सपनों की कविता।
- मिथिले (Mithile) - नागार्जुन: मिथिला की गौरव गाथा और सांस्कृतिक पहचान।
- महाकवि विद्यापति: जीवन और रचनाएँ: मैथिली साहित्य की नींव।
- ई सभाक मैथिली - देवेन्द्र मिश्र: भाषा के प्रति प्रेम और चिंता।
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निष्कर्ष
'भावी पीढ़ीक दर्द' एक सवाल है—क्या हम अपनी संतानों के लिए एक कर्जमुक्त और नैतिक समाज छोड़ रहे हैं? उपेन्द्र दोषी की यह रचना हमें आत्म-मंथन करने पर मजबूर करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'भावी पीढ़ीक दर्द' कविता के रचयिता कौन हैं?
इस कविता के रचयिता मैथिली कवि उपेन्द्र दोषी हैं।
कवि ने 'जिलेबीक रसमे माछी' का प्रयोग क्यों किया है?
यह एक मुहावरा है जो यह दर्शाता है कि कैसे आम आदमी भ्रष्ट व्यवस्था के प्रलोभन और जाल में फंसकर अपनी आवाज़ खो देता है।
'अजन्मा भगीरथ' से कवि का क्या तात्पर्य है?
कवि आने वाली पीढ़ी को 'भगीरथ' कहते हैं, जिनसे उम्मीद है कि वे ही इस 'बिकी हुई धरती' का उद्धार करेंगे, जैसे भगीरथ ने गंगा लाकर पूर्वजों का उद्धार किया था।
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