चन्द्रमाक मृत्यु - हरिमोहन झा (संपूर्ण कविता पाठ एवं व्यंग्य विश्लेषण)
क्या हो जब सदियों से चला आ रहा 'चाँद' का रोमांटिक मिथक एक झटके में टूट जाए? आधुनिक विज्ञान और अंतरिक्ष अन्वेषण ने साहित्यिक उपमाओं की कैसे धज्जियां उड़ाई हैं, इसका सबसे शानदार और व्यंग्यात्मक उदाहरण है हरिमोहन झा जी की अमर रचना—'चन्द्रमाक मृत्यु' (Chandramak Mrityu)।
मैथिली गद्य और पद्य में अपने तीखे व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध हरिमोहन झा ने इस कविता में कालिदास, विद्यापति और तुलसीदास जैसे महाकवियों पर भी मीठा कटाक्ष किया है। सदियों से जिस 'चंद्रमुख' (चाँद से चेहरे) की उपमा दी जाती थी, रॉकेट युग की 'चंद्रमुखी' जब चाँद पर उतरती है तो उसे वहां केवल ऊबड़-खाबड़ गड्ढे और धूल नज़र आती है। यह कविता पारंपरिक रोमांटिसिज़्म की मृत्यु और आधुनिक यथार्थवाद (Realism) के जन्म का उद्घोष करती है। नीचे प्रस्तुत है इस युग-प्रवर्तक रचना का संपूर्ण मूल पाठ (Full Lyrics) और उसका विस्तृत पद्यांश-वार विश्लेषण।
कविता का संपूर्ण मूल पाठ (Full Poem Lyrics)
एक लात चन्द्रमा केँ मारलथिन्ह।
धुर जो! एहने उभड़-खाभड़ टेढ़े-मेढ़ टिल्हा-डाबर,
यैह हमरा मुँहक परतर करत?
हजारो वर्ष सँ कोढ़िया उपमान बनल छल।
वाल्मीकिसँ विद्यापति पर्यन्त
केहन भ्रम मे रहलाह!
एही चुहार सँ हमर उपमा दैत छलाह।
बुड़बक चकोर
कुमुदनी बताहि
सभ एकरे पाछाँ बेहाल छल।
हजारो वर्ष सँ ई लोककेँ ठकैत छल।
लाखो कोस सँ चमकैत छल
चोरक मुँह चान सन!
आइ तोहर कलइ खूजल पाथर मुँहखोद्धा।
मारि चप्पल मारि चप्पल
सोझ करबौ सरधुए!
व्यास कालिदास सूरदास तुलसीदास
सभ छलाह सोझिया
तोरा सँ ठकल गेलाह
मुखचन्द्र चन्द्रवदन जन्म भरि रटैत गेलाह
घसल रेकर्ड जकाँ उपमा दोहरबैत गेलाह।
परन्तु आबक नऽव कवि
सजग सतर्क छथि।
राकेट उड़बैत छथि।
नव-नव प्रतीक भेल
आब हमर उपमा
बल्ब सँ देल जायत
टुमाटो सँ देल जायत
रेडियो सँ देल जायत
ट्रान्जिस्टर सँ देल जायत।
और तोरा पर चलौतह
फावड़ा ओ ट्रैक्टर।
पेट तोहर फाड़ि देतौह
चानि توहर चूड़ि देतौह
ऊपर सँ बाओग करतौह
सामा ओ कोदो
ऊपर सँ रोपि देतौह
अल्हुआ ओ सुथनी
सुथनी सन मुँह नेने रहह विधुआएल।
आब कोढ़िये मुइलह
गेलौह तोहर युग
लय लिहऽ चौठिचन्द्रक भुसबा आ केरा!
📚 मैथिली कविता के अन्य उत्कृष्ट व्यंग्य और रचनाएँ:
हरिमोहन झा की यह व्यंग्यात्मक शैली उनके सामाजिक दर्शन को दर्शाती है। उनके अन्य कार्यों और मैथिली साहित्य को गहराई से समझने के लिए इन्हें अवश्य पढ़ें:
- सामाजिक विडंबना: हरिमोहन झा की कालजयी रचना अकाल, जो सूखे और समाज के लालच (दहेज) पर तीखा प्रहार करती है।
- सांस्कृतिक गौरव: प्रवासी मैथिलों को झकझोरने वाली कविता कलकत्ता गेला उत्तर।
- भाषाई स्वाभिमान: मातृभाषा के संरक्षण के लिए मैथिली केँ नै बान्हियौ का ओजस्वी संदेश।
- विद्यापति की पारंपरिक काव्य शैली: इस कविता में जिन विद्यापति पर व्यंग्य किया गया है, उनके मूल विरह गीतों को उगना रे मोर कतय गेला में पढ़ें।
चन्द्रमाक मृत्यु: पद्यांश-वार शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ (Analysis)
एक लात चन्द्रमा केँ मारलथिन्ह।
धुर जो! एहने उभड़-खाभड़ टेढ़े-मेढ़ टिल्हा-डाबर,
यैह हमरा मुँहक परतर करत?
वाल्मीकिसँ विद्यापति पर्यन्त
केहन भ्रम मे रहलाह!
एही चुहार सँ हमर उपमा दैत छलाह。
बुड़बक चकोर कुमुदनी बताहि
सभ एकरे पाछाँ बेहाल छल।
हजारो वर्ष सँ ई लोककेँ ठकैत छल।
लाखो कोस सँ चमकैत छल चोरक मुँह चान सन!
मारि चप्पल मारि चप्पल सोझ करबौ सरधुए!
व्यास कालिदास सूरदास तुलसीदास
सभ छलाह सोझिया तोरा सँ ठकल गेलाह
मुखचन्द्र चन्द्रवदन जन्म भरि रटैत गेलाह
घसल रेकर्ड जकाँ उपमा दोहरबैत गेलाह।
राकेट उड़बैत छथि।
नव-नव प्रतीक भेल
आब हमर उपमा बल्ब सँ देल जायत
टुमाटो सँ देल जायत रेडियो सँ देल जायत
ट्रान्जिस्टर सँ देल जायत।
पेट तोहर फाड़ि देतौह चानि तोहर चूड़ि देतौह
ऊपर सँ बाओग करतौह सामा ओ कोदो
ऊपर सँ रोपि देतौह अल्हुआ ओ सुथनी
सुथनी सन मुँह नेने रहह विधुआएल।
आब कोढ़िये मुइलह गेलौह तोहर युग
लय लिहऽ चौठिचन्द्रक भुसबा आ केरा!
स्रोत: हरिमोहन झा रचनावली खण्ड-4 (पृष्ठ 94)
प्रकाशन: जनसीदन प्रकाशन (1999)
निष्कर्ष: आधुनिकता और यथार्थवाद की विजय
हरिमोहन झा की यह कविता 'चन्द्रमाक मृत्यु' साहित्य में एक बहुत बड़े परिवर्तन (Paradigm Shift) को दर्शाती है। यह कविता उस प्राचीन और घिसी-पिटी (Cliché) रोमांटिक सोच की मृत्यु है, जहाँ सदियों से आँख मूंदकर किसी के चेहरे की तुलना दागदार चाँद से की जा रही थी। विज्ञान (रॉकेट) ने जैसे ही इंसान को सच्चाई से रूबरू कराया, साहित्य को भी यथार्थ की ज़मीन पर आना पड़ा।
हरिमोहन झा जी का यह व्यंग्य इतना सटीक है कि वे 'वाल्मीकि से लेकर विद्यापति' तक को लपेटे में ले लेते हैं। चाँद पर ट्रैक्टर चलाने और 'सुथनी' बोने की बात कहकर वे यह साबित करते हैं कि आज के युग में सौंदर्य से अधिक महत्त्व उपयोगिता (Utility) और यथार्थ (Reality) का है। यह कविता आज भी मैथिली साहित्य में अपने अनूठे प्रयोग और तीखे प्रहार के लिए अमर है।
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