अकाल - हरिमोहन झा (संपूर्ण कविता पाठ एवं भावार्थ)
प्रकृति की निर्ममता और समाज के खोखलेपन का ऐसा सटीक और तीखा चित्रण साहित्य में दुर्लभ है। सूखे की भीषण त्रासदी को दहेज लोभियों और सामाजिक कुरीतियों से जोड़ना केवल हरिमोहन झा जी की पैनी दृष्टि ही कर सकती है।
मैथिली साहित्य के शिखर पुरुष हरिमोहन झा द्वारा रचित 'अकाल' (Akaal) महज़ एक प्राकृतिक आपदा का वर्णन नहीं है; यह एक गहरा सामाजिक व्यंग्य है। कवि ने बड़ी ही चतुराई से सूखे खेतों, उड़ती धूल और फटी हुई धरती की तुलना रूठे हुए दामाद, निर्लज्ज समधी, और दहेज के लोभी पिता से की है। नीचे प्रस्तुत है इस कालजयी रचना का संपूर्ण मूल पाठ (Full Lyrics) और उसका विस्तृत पद्यांश-वार विश्लेषण।
कविता का संपूर्ण मूल पाठ (Full Poem Lyrics)
मेघ पड़ायल मुँह बिधुऔने, रूसल जमाय जकाँ।
खेत पानिसँ रहित भेल, समधी केर आँखि जकाँ।
धूरि उड़ै अछि चौरोमे, बगुला केर पाँखि जकाँ।
अछि दराड़ि मुँह बौने सबतरि, बऽरक बाप जकाँ।
महगी चढ़ल माथ पर अछि सीता केर श्राप जकाँ।
धानक मूँह सुखाइत अछि, कन्यागत-प्राण जकाँ।
पेट किसानक पचकि गेल अछि, खखरी धान जकाँ।
बड़दक दाम बढ़ल जाइत अछि, बऽरक मोल जकाँ।
जन मजदूरक बात बिकाइछ, कनेयाँक बोल जकाँ।
रब्बिक आशा टूटि रहल मुनिगा केर ठारि जकाँ।
जनता मनमे उमसि रहल अछि, मैथिल नारि जकाँ।
📚 मैथिली कविता और मिथिला दर्शन की गहराइयों में जाएँ:
हरिमोहन झा की यह कविता ग्रामीण पीड़ा और सामाजिक विडंबना को दर्शाती है। मैथिली साहित्य के अन्य अनमोल रत्नों को समझने के लिए इन्हें अवश्य पढ़ें:
- सांस्कृतिक शंखनाद: हरिमोहन झा की ही एक और उत्कृष्ट रचना कलकत्ता गेला उत्तर, जो प्रवासी मैथिलों को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
- भाषाई स्वाभिमान: अपनी भाषा के प्रति प्रेम और संघर्ष को मैथिली केँ नै बान्हियौ में महसूस करें।
- भक्ति और विरह: विद्यापति के पदों में छिपी करुणा को उगना रे मोर कतय गेला में पढ़ें।
- परम्परा और समाज: इस कविता में वर्णित 'मैथिल नारि' की छवि और विवाह संस्कारों की जीवंतता को दुल्हिन धीरे धीरे चल्यो (विवाह गीत) में देखें।
- देशप्रेम और संघर्ष: अकाल और संकट के बीच राष्ट्र की वेदना भारत माता तथा युवाओं के आह्वान नवतुरिये आबो आंगा के भावों से मेल खाती है।
अकाल: पद्यांश-वार शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ (Detailed Analysis)
(2) मेघ पड़ायल मुँह बिधुऔने, रूसल जमाय जकाँ।
(4) धूरि उड़ै अछि चौरोमे, बगुला केर पाँखि जकाँ।
(6) महगी चढ़ल माथ पर अछि सीता केर श्राप जकाँ।
(8) पेट किसानक पचकि गेल अछि, खखरी धान जकाँ।
(10) जन मजदूरक बात बिकाइछ, कनेयाँक बोल जकाँ।
(12) जनता मनमे उमसि रहल अछि, मैथिल नारि जकाँ।
स्रोत: हरिमोहन झा रचनावली खण्ड-4 (पृष्ठ 56)
प्रकाशन: जनसीदन प्रकाशन (1999)
निष्कर्ष: 'अकाल' का दोहरा प्रहार
हरिमोहन झा की यह कविता 'अकाल' केवल एक प्राकृतिक आपदा का रुदन नहीं है। कवि ने अपने तीखे व्यंग्य के माध्यम से समाज को आईना दिखाया है। प्रकृति का सूखा तो शायद अगले साल की बारिश से मिट जाए, लेकिन समाज में फैला लालच, दहेज प्रथा और मानवीय संवेदनाओं का 'सूखा' अधिक भयावह है।
दहेज के लिए मुँह बाए समधी, रूठे हुए दामाद और घुटन में जीती मैथिल नारी का उपमान देकर कवि ने सिद्ध कर दिया है कि एक गरीब किसान के लिए सामाजिक व्यवस्था प्रकृति से भी ज्यादा क्रूर हो सकती है। यह कविता हमें सोचने पर विवश करती है कि असली 'अकाल' खेतों में पड़ा है या हमारी मानसिकता में?
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