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कलकत्ता गेला उत्तर - हरिमोहन झा (कविता भावार्थ, शब्दार्थ और संपूर्ण विश्लेषण)

कलकत्ता गेला उत्तर - हरिमोहन झा (मैथिली कविता का संपूर्ण भावार्थ)

जब कोई साहित्यिक दिग्गज अपनी लेखनी उठाता है, तो एक पूरी संस्कृति जाग उठती है। महान मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा द्वारा रचित 'कलकत्ता गेला उत्तर' मात्र एक कविता नहीं है; यह प्रवासी मैथिलों के लिए एक सांस्कृतिक शंखनाद है।

अपने व्यंग्य "खट्टर ककाक तरंग" के लिए विख्यात हरिमोहन झा जी ने इस कविता में अपनी गहरी भावनात्मक, देशभक्तिपूर्ण और सांस्कृतिक जड़ों का अद्भुत प्रदर्शन किया है। यह कविता कलकत्ता (अब कोलकाता) में बसे मैथिलों को संबोधित है। यह मिथिला की स्वर्णिम विरासत—ऋषि याज्ञवल्क्य के आध्यात्मिक ज्ञान से लेकर विद्यापति के मधुर गीतों तक—की यात्रा कराती है। यह आधुनिक पीढ़ी से अपनी भाषाई पहचान की रक्षा करने, एकजुट होने और आधुनिक भौतिकवाद के शोर के बीच मिथिला के गौरव को पुनर्स्थापित करने का आह्वान करती है।

आधुनिक मैथिली गद्य के जनक - हरिमोहन झा का चित्र
हरिमोहन झा: आधुनिक मैथिली चेतना के शिल्पकार।

कलकत्ता गेला उत्तर: पद्यांश, शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ

(1)
मिथिलाक भूमि सँ समुत्पन्न
मिथिलाक पानि सँ परिष्पन्न

ऋषि याज्ञवल्क्य ओ जनक केर
उज्ज्वल संस्कृति सौं अविच्छिन्न

हे प्रखर बुद्धि प्रतिभाक पुञ्ज
कण-कण ज्योतिक उड़इत स्फुलिंग

हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र
सादर सभक्ति शतशत प्रणाम

हे लक्ष-लक्ष मैथिल प्रणाम
कठिन शब्द: समुत्पन्न (उत्पन्न/पैदा हुआ), परिष्पन्न (पोषित/शुद्ध किया हुआ), अविच्छिन्न (निरंतर/जो कभी न टूटे), स्फुलिंग (चिंगारी)।
भावार्थ: कवि उन लाखों मैथिल पुत्रों को शत-शत प्रणाम कर रहे हैं, जिनका जन्म मिथिला की पवित्र भूमि पर हुआ है और जिनका पालन-पोषण मिथिला के जल से हुआ है। वे उन्हें याद दिलाते हैं कि वे ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक की उस महान और उज्ज्वल संस्कृति के अटूट हिस्से हैं। कवि उन्हें कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभा का भंडार (पुंज) बताते हैं, जिनके रोम-रोम में ज्ञान की चिंगारी (स्फुलिंग) उड़ती है।
(2)
जनकक ओ ब्रह्म-ज्ञान धन्य
मंडन केर कर्म-ज्ञान धन्य

वाचस्पतिक तत्त्व-ज्ञान धन्य
उदयन केर आस्तिकवाद धन्य

गंगेशक नव्य न्याय धन्य
ओ पक्षधरक शास्त्रार्थ धन्य

संतोष अयाची केर धन्य
विद्यापति कवि केर गान धन्य

राजा शिवसिंहक दान धन्य
गंगानाथक सत्कीर्त्ति धन्य

ओ अमरनाथ केर नाम धन्य
कठिन शब्द: नव्य न्याय (न्याय दर्शन की एक शाखा जिसे गंगेश उपाध्याय ने स्थापित किया), शास्त्रार्थ (धार्मिक व दार्शनिक वाद-विवाद), सत्कीर्त्ति (सच्ची ख्याति या यश)।
भावार्थ: यहाँ मिथिला के गौरवशाली इतिहास और उसके महान विचारकों का स्मरण किया गया है। राजा जनक का ब्रह्मज्ञान, मंडन मिश्र का कर्मकांड, वाचस्पति मिश्र का तत्त्वज्ञान और उदायनाचार्य का आस्तिकवाद मिथिला की बौद्धिक संपदा है। गंगेश उपाध्याय का नव्य-न्याय दर्शन, पक्षधर मिश्र का अजेय शास्त्रार्थ, अयाची मिश्र का परम संतोष, महाकवि विद्यापति के मधुर गीत, राजा शिवसिंह की दानशीलता, सर गंगानाथ झा की कीर्ति और अमरनाथ का नाम—यह सभी मिथिला की धरती को धन्य बनाते हैं।
(3)
सीता सन मैथिल नारि धन्य
मैत्रेयी सन विदुषी अनन्य

विदुषी सरस्वती धन्य अमर
लखिमा ठकुराइन सेहो हमर
कठिन शब्द: अनन्य (जिसके समान कोई दूसरा न हो), विदुषी (ज्ञानी स्त्री)।
भावार्थ: मिथिला केवल पुरुषों के ज्ञान के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी विदुषी और महान नारियों के लिए भी वंदनीय है। माता सीता जैसी पवित्र नारी, मैत्रेयी जैसी अद्वितीय विदुषी, अमर ज्ञानरूपा भारती (सरस्वती) और लखिमा ठकुराइन (रानी लखिमा) जैसी महान महिलाएँ इस भूमि का गौरव हैं।
हरिमोहन झा की 'कलकत्ता गेला उत्तर' कविता को दर्शाती मिथिला कलाकृति
स्वर्णिम विरासत का दृश्य: राजा जनक के दरबार से लेकर नव्य न्याय के विद्वानों तक।
(4)
सभटा वैभव ई अहिंक थीक

अछि उत्तराधिकार सभटा अहींक
एक स्वर सँ बाजय तुरही

ई थीक परम अभिलाष हमर
बनि जाय एक ई लाख हमर

संग चलय पैर दू लाख हमर
संग उठय भुजा ई लाख हमर
कठिन शब्द: वैभव (संपत्ति/गौरव), तुरही (एक प्रकार का वाद्य यंत्र/शंखनाद), अभिलाष (इच्छा)।
भावार्थ: कवि प्रवासियों से कहते हैं कि मिथिला का यह सारा सांस्कृतिक वैभव और गौरवशाली इतिहास आपका ही उत्तराधिकार है। मेरी परम इच्छा है कि आप सभी (लाखों मैथिल) एकजुट होकर एक स्वर में अपनी हुंकार (तुरही) भरें। हमारी लाखों आवाजें एक बन जाएं, हमारे दो लाख पैर एक साथ प्रगति के मार्ग पर चलें और हमारी लाखों भुजाएँ अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए एक साथ उठें।
(5)
गौतम केर गौतमस्थान धन्य

कपिलक कपिलेश्वर स्थान धन्य
उदयन केर करियन ग्राम धन्य

विद्यापतिक विसफी गाम धन्य
सभकेर बटोरि कय माटि पुण्य

करइत जाऊ चन्दन ललाम
हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र

सादर सभक्ति शतशत प्रणाम
कठिन शब्द: ललाम (सुंदर/श्रेष्ठ)।
भावार्थ: मिथिला के पवित्र तीर्थों और गाँवों का स्मरण करते हुए कवि कहते हैं—महर्षि गौतम का 'गौतमस्थान', मुनि कपिल का 'कपिलेश्वर स्थान', उदायनाचार्य का 'करियन' गाँव और विद्यापति का 'बिसफी' गाँव धन्य हैं। इन सभी पवित्र स्थानों की मिट्टी को इकट्ठा करके अपने माथे पर सुंदर चंदन के रूप में लगाएँ। हे तपोभूमि मिथिला के पुत्रों, आपको मेरा शत-शत प्रणाम!
(6)
तिरहुतक पुरातन पाग धन्य
सरिसव केर पटुआ साग धन्य

अपना देशक ओ छाँछ धन्य
ओ नैनी माड़ुर माछ धन्य

मिथिला केर मधुर मखान धन्य
ओ तुलसीफूलक धान धन्य

ओ समदाउनि केर गान धन्य
ओ तरुणी केर मुसकान धन्य

ओ महादेव केर ध्यान धन्य
कठिन शब्द: पाग (मैथिल पगड़ी), पटुआ साग (जूट के पत्तों का साग), माछ (मछली), समदाउनि (मिथिला का एक पारंपरिक विदाई गीत)।
भावार्थ: यह पद्यांश मिथिला के जनजीवन, खान-पान और लोक-संस्कृति की मधुर याद दिलाता है। तिरहुत (मिथिला) की वह प्राचीन पगड़ी (पाग), सरसों और पटुआ का साग, अपने गाँव की छाछ, ताजी मछलियाँ (नैनी और मांगुर), मिथिला का मीठा मखाना और तुलसीफूल धान (चावल की एक उत्तम किस्म)—यह सब कुछ धन्य और वंदनीय है। विदाई के समय गाए जाने वाले करुण 'समदाउनि' गीत, युवतियों की पवित्र मुस्कान और महादेव शिव का ध्यान, ये सभी मिथिला की पहचान हैं।
(7)
ई समय भयंकर महाकाल
अति भीषण संकटक कराल

गिड़बा लय मानव-संस्कृति केँ
मुँह बौने जेना महाकाल

अणुबम केर एहि राक्षस युगमे
हर हर बम केर करु महोच्चार

पुनि दियौ जगतकेँ महामंत्र
पुनि करू शान्ति-पाठक प्रचार

मिथिलाक सत्व गुण घोरि घोरि
उन्मत्त विश्व मे दियऽ खिरा

भौतिकवादक भस्मासुर केँ
निज माथ, हाथ दय दियौ फिरा

हे बन्धु हमर ई अहिंक काज
दुदुन्भि बजाउ मैथिल समाज

पद्माक पानि मे चमकि उठय
कमलाक धार केर शान हमर

आङन रविन्द्र केर आबि गुँजय
विद्यापति केर चिर कलगान हमर

एहि नवद्वीप मे पुनः उठय
ओ पक्षधरक सम्मान हमर

हे बन्धु भार ई अछि अहींक
दायित्व सकल अपनेक थीक

ई बुझू रहू बनि सदा एक
मिथिला मैथिली केर राखि टेक

हे बंगभूमि मे रहनिहार
कलकत्ता नगरी स्थित प्रबुद्ध

छितरल फुटकल मिथिलाक पुत्र
समवेत होउ बनि कय उदार

मन्दिर बनाउ निज एहन दिव्य
फहराउ ध्वजा अतिशय विशाल

आदर्श उच्च विचारक, करू
सम्मिलित कण्ठ सौं शंखनाद

हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र
सादर सभक्ति शत शत प्रणाम

हे लक्ष लक्ष मैथिल प्रणाम
कठिन शब्द: कराल (भयानक), अणुबम (परमाणु बम), सत्व गुण (पवित्रता/शांति का गुण), खिरा (पिलाना), दुदुन्भि (नगाड़ा), छितरल फुटकल (बिखरे हुए), समवेत (एकजुट)।
भावार्थ: अंतिम और सबसे शक्तिशाली पद्यांश में कवि कहते हैं कि वर्तमान समय महाकाल की तरह भयंकर और संकटपूर्ण है। भौतिकवाद और परमाणु बमों के इस राक्षसी युग ने मानव-संस्कृति को निगलने के लिए अपना मुँह खोल रखा है। ऐसे समय में, हे मैथिल पुत्रों! 'हर-हर महादेव' का उद्घोष करो। इस अशांत विश्व को फिर से मिथिला का शांति-पाठ और ज्ञान का महामंत्र सुनाओ।

इस भौतिकवाद रूपी भस्मासुर को नष्ट करने का उत्तरदायित्व आपका है। कलकत्ता (बंगाल) में रहने वाले हे मैथिल समाज! अपनी दुंदुभि बजाओ, ताकि बंगाल की पद्मा नदी के पानी में हमारी कमला नदी की शान चमक उठे। रवींद्रनाथ टैगोर के आंगन (बंगाल) में महाकवि विद्यापति के मीठे गीत गूँजें और नवद्वीप में पक्षधर मिश्र का शास्त्रार्थ वाला सम्मान पुनः जागृत हो।

कलकत्ता में बिखरे हुए हे प्रबुद्ध मैथिल पुत्रों! एकजुट हो जाओ, अपनी संस्कृति का एक ऐसा दिव्य मंदिर बनाओ जिस पर मिथिला की विशाल ध्वजा फहराए। अपने उच्च आदर्शों के साथ एक सुर में अपनी अस्मिता का शंखनाद करो।

स्रोत: हरिमोहन झा रचनावली खण्ड-4 (पृष्ठ 52)
प्रकाशन: जनसीदन प्रकाशन (1999)

हरिमोहन झा की दूरदृष्टि और कविता की प्रासंगिकता

"कलकत्ता गेला उत्तर" केवल पुरानी यादों को ताज़ा करने वाली कविता नहीं है; यह सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाए रखने का एक सामाजिक घोषणा-पत्र (Sociological Blueprint) है। जब रोजगार और आधुनिक शिक्षा की तलाश में मैथिल कलकत्ता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे थे, तब अपनी जड़ों से कटने और सांस्कृतिक पतन का एक स्पष्ट डर था। हरिमोहन झा ने इस भय का सामना उन्हें अपनी अद्वितीय विरासत की याद दिलाकर किया।

गंगेश और विद्यापति के दर्शन से लेकर 'मखाना' और 'पटुआ साग' के स्वाद तक, यह कविता हमें हमारी मिट्टी से जोड़े रखती है। भौतिकवाद और सांस्कृतिक पतन के इस युग में हरिमोहन झा का यह संदेश आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है। अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपनी भाषा की रक्षा करें और मिथिला की मेधा को पूरे विश्व में आलोकित होने दें। इस कविता को साझा करें और सुनिश्चित करें कि मिथिला के गौरव का शंखनाद कभी शांत न हो!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 'कलकत्ता गेला उत्तर' कविता का मुख्य विषय क्या है?
इस कविता का मुख्य विषय कलकत्ता (कोलकाता) में बसे प्रवासी मैथिलों को उनकी समृद्ध सांस्कृतिक, दार्शनिक और साहित्यिक विरासत की याद दिलाना है। कवि उनसे आग्रह करते हैं कि वे आधुनिक भौतिकवाद की चकाचौंध में अपनी पहचान न खोएं और मैथिली भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए एकजुट हों।
2. हरिमोहन झा ने कविता में किन ऐतिहासिक विभूतियों का उल्लेख किया है?
कवि ने मिथिला का गौरव बढ़ाने वाली कई महान विभूतियों का स्मरण किया है, जिनमें महर्षि याज्ञवल्क्य, राजा जनक, मंडन मिश्र, विद्यापति, उदायनाचार्य, गंगेश उपाध्याय, अयाची मिश्र तथा सीता, मैत्रेयी और लखिमा ठकुराइन जैसी महान व विदुषी नारियाँ शामिल हैं।
3. कवि ने विशेष रूप से कलकत्ता के मैथिलों को क्यों संबोधित किया?
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कलकत्ता वह प्रमुख महानगर था जहाँ मैथिल उच्च शिक्षा, छपाई प्रेस (Printing Press) और रोजगार के लिए गए थे। बंगाल ने उन्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन अपनी मूल संस्कृति को भूलने का खतरा भी मंडरा रहा था। इसलिए झा जी ने उन्हें एकजुट होने ("समवेत होउ बनि कय उदार") और तिरहुत (मिथिला) से अपना जुड़ाव बनाए रखने के लिए यह आह्वान किया।

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