कलकत्ता गेला उत्तर - हरिमोहन झा (मैथिली कविता का संपूर्ण भावार्थ)
जब कोई साहित्यिक दिग्गज अपनी लेखनी उठाता है, तो एक पूरी संस्कृति जाग उठती है। महान मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा द्वारा रचित 'कलकत्ता गेला उत्तर' मात्र एक कविता नहीं है; यह प्रवासी मैथिलों के लिए एक सांस्कृतिक शंखनाद है।
अपने व्यंग्य "खट्टर ककाक तरंग" के लिए विख्यात हरिमोहन झा जी ने इस कविता में अपनी गहरी भावनात्मक, देशभक्तिपूर्ण और सांस्कृतिक जड़ों का अद्भुत प्रदर्शन किया है। यह कविता कलकत्ता (अब कोलकाता) में बसे मैथिलों को संबोधित है। यह मिथिला की स्वर्णिम विरासत—ऋषि याज्ञवल्क्य के आध्यात्मिक ज्ञान से लेकर विद्यापति के मधुर गीतों तक—की यात्रा कराती है। यह आधुनिक पीढ़ी से अपनी भाषाई पहचान की रक्षा करने, एकजुट होने और आधुनिक भौतिकवाद के शोर के बीच मिथिला के गौरव को पुनर्स्थापित करने का आह्वान करती है।
📚 मिथिला की सांस्कृतिक विरासत में गहराई से उतरें:
हरिमोहन झा का यह काव्यात्मक आह्वान मैथिली साहित्य के अन्य प्रमुख स्तंभों के साथ गहराई से जुड़ता है। साहित्य की इस धरोहर को समझने के लिए इन्हें अवश्य पढ़ें:
- भाषाई अस्मिता: जिस प्रकार झा जी एकता की अपील करते हैं, उसी प्रकार आधुनिक कवि मैथिली केँ नै बान्हियौ में हमारी भाषा को स्वतंत्र रखने का आग्रह करते हैं।
- भक्ति और रहस्यवाद: महाकवि विद्यापति के अमर गीत उगना रे मोर कतय गेला में कवि और देवता के बीच के अद्भुत संबंध को महसूस करें।
- देशभक्ति: क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीयता के संगम को भारत माता की प्रेरक पंक्तियों में पढ़ें।
- युवा जागरण: कलकत्ता के युवाओं का यह आह्वान नवतुरिये आबो आंगा की ऊर्जा से मेल खाता है।
- सांस्कृतिक अनुष्ठान: इस कविता में प्रशंसित मैथिल नारियों की परंपरा को पारंपरिक गीत दुल्हिन धीरे धीरे चल्यो (मैथिली विवाह गीत) में जीवंत रूप में देखें।
कलकत्ता गेला उत्तर: पद्यांश, शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ
मिथिलाक भूमि सँ समुत्पन्न
मिथिलाक पानि सँ परिष्पन्न
ऋषि याज्ञवल्क्य ओ जनक केर
उज्ज्वल संस्कृति सौं अविच्छिन्न
हे प्रखर बुद्धि प्रतिभाक पुञ्ज
कण-कण ज्योतिक उड़इत स्फुलिंग
हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र
सादर सभक्ति शतशत प्रणाम
हे लक्ष-लक्ष मैथिल प्रणाम
जनकक ओ ब्रह्म-ज्ञान धन्य
मंडन केर कर्म-ज्ञान धन्य
वाचस्पतिक तत्त्व-ज्ञान धन्य
उदयन केर आस्तिकवाद धन्य
गंगेशक नव्य न्याय धन्य
ओ पक्षधरक शास्त्रार्थ धन्य
संतोष अयाची केर धन्य
विद्यापति कवि केर गान धन्य
राजा शिवसिंहक दान धन्य
गंगानाथक सत्कीर्त्ति धन्य
ओ अमरनाथ केर नाम धन्य
सीता सन मैथिल नारि धन्य
मैत्रेयी सन विदुषी अनन्य
विदुषी सरस्वती धन्य अमर
लखिमा ठकुराइन सेहो हमर
सभटा वैभव ई अहिंक थीक
अछि उत्तराधिकार सभटा अहींक
एक स्वर सँ बाजय तुरही
ई थीक परम अभिलाष हमर
बनि जाय एक ई लाख हमर
संग चलय पैर दू लाख हमर
संग उठय भुजा ई लाख हमर
गौतम केर गौतमस्थान धन्य
कपिलक कपिलेश्वर स्थान धन्य
उदयन केर करियन ग्राम धन्य
विद्यापतिक विसफी गाम धन्य
सभकेर बटोरि कय माटि पुण्य
करइत जाऊ चन्दन ललाम
हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र
सादर सभक्ति शतशत प्रणाम
तिरहुतक पुरातन पाग धन्य
सरिसव केर पटुआ साग धन्य
अपना देशक ओ छाँछ धन्य
ओ नैनी माड़ुर माछ धन्य
मिथिला केर मधुर मखान धन्य
ओ तुलसीफूलक धान धन्य
ओ समदाउनि केर गान धन्य
ओ तरुणी केर मुसकान धन्य
ओ महादेव केर ध्यान धन्य
ई समय भयंकर महाकाल
अति भीषण संकटक कराल
गिड़बा लय मानव-संस्कृति केँ
मुँह बौने जेना महाकाल
अणुबम केर एहि राक्षस युगमे
हर हर बम केर करु महोच्चार
पुनि दियौ जगतकेँ महामंत्र
पुनि करू शान्ति-पाठक प्रचार
मिथिलाक सत्व गुण घोरि घोरि
उन्मत्त विश्व मे दियऽ खिरा
भौतिकवादक भस्मासुर केँ
निज माथ, हाथ दय दियौ फिरा
हे बन्धु हमर ई अहिंक काज
दुदुन्भि बजाउ मैथिल समाज
पद्माक पानि मे चमकि उठय
कमलाक धार केर शान हमर
आङन रविन्द्र केर आबि गुँजय
विद्यापति केर चिर कलगान हमर
एहि नवद्वीप मे पुनः उठय
ओ पक्षधरक सम्मान हमर
हे बन्धु भार ई अछि अहींक
दायित्व सकल अपनेक थीक
ई बुझू रहू बनि सदा एक
मिथिला मैथिली केर राखि टेक
हे बंगभूमि मे रहनिहार
कलकत्ता नगरी स्थित प्रबुद्ध
छितरल फुटकल मिथिलाक पुत्र
समवेत होउ बनि कय उदार
मन्दिर बनाउ निज एहन दिव्य
फहराउ ध्वजा अतिशय विशाल
आदर्श उच्च विचारक, करू
सम्मिलित कण्ठ सौं शंखनाद
हे तपोभूमि मिथिलाक पुत्र
सादर सभक्ति शत शत प्रणाम
हे लक्ष लक्ष मैथिल प्रणाम
इस भौतिकवाद रूपी भस्मासुर को नष्ट करने का उत्तरदायित्व आपका है। कलकत्ता (बंगाल) में रहने वाले हे मैथिल समाज! अपनी दुंदुभि बजाओ, ताकि बंगाल की पद्मा नदी के पानी में हमारी कमला नदी की शान चमक उठे। रवींद्रनाथ टैगोर के आंगन (बंगाल) में महाकवि विद्यापति के मीठे गीत गूँजें और नवद्वीप में पक्षधर मिश्र का शास्त्रार्थ वाला सम्मान पुनः जागृत हो।
कलकत्ता में बिखरे हुए हे प्रबुद्ध मैथिल पुत्रों! एकजुट हो जाओ, अपनी संस्कृति का एक ऐसा दिव्य मंदिर बनाओ जिस पर मिथिला की विशाल ध्वजा फहराए। अपने उच्च आदर्शों के साथ एक सुर में अपनी अस्मिता का शंखनाद करो।
स्रोत: हरिमोहन झा रचनावली खण्ड-4 (पृष्ठ 52)
प्रकाशन: जनसीदन प्रकाशन (1999)
हरिमोहन झा की दूरदृष्टि और कविता की प्रासंगिकता
"कलकत्ता गेला उत्तर" केवल पुरानी यादों को ताज़ा करने वाली कविता नहीं है; यह सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाए रखने का एक सामाजिक घोषणा-पत्र (Sociological Blueprint) है। जब रोजगार और आधुनिक शिक्षा की तलाश में मैथिल कलकत्ता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे थे, तब अपनी जड़ों से कटने और सांस्कृतिक पतन का एक स्पष्ट डर था। हरिमोहन झा ने इस भय का सामना उन्हें अपनी अद्वितीय विरासत की याद दिलाकर किया।
गंगेश और विद्यापति के दर्शन से लेकर 'मखाना' और 'पटुआ साग' के स्वाद तक, यह कविता हमें हमारी मिट्टी से जोड़े रखती है। भौतिकवाद और सांस्कृतिक पतन के इस युग में हरिमोहन झा का यह संदेश आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है। अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपनी भाषा की रक्षा करें और मिथिला की मेधा को पूरे विश्व में आलोकित होने दें। इस कविता को साझा करें और सुनिश्चित करें कि मिथिला के गौरव का शंखनाद कभी शांत न हो!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें