सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उगह हो सूरज देव लिरिक्स: अनुराधा पौडवाल का रुला देने वाला छठ गीत!

उगह हो सूरज देव लिरिक्स (Ugaha Ho Suraj Dev Bhel Bhinsarva)

सूर्योदय का वह अलौकिक दृश्य जब लाखों हाथ एक साथ आसमान की ओर उठते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती स्वयं स्वर्ग बन गई हो। अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) जी की मर्मस्पर्शी आवाज़ में गाया गया— "उगह हे सूरज देव भेल भिनसरवा", छठ महापर्व का सबसे प्रतिष्ठित और हृदय को बेध देने वाला गीत है। यह गीत केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की सूर्य देव से की गई सीधी गुहार है।

इससे पहले हमने "अंगना में पोखरी खनायब" में देखा कि कैसे घर के आँगन को ही पवित्र घाट बना दिया जाता है। इस गीत में भगवान भास्कर के प्रति जो आस्था और ऊर्जा निहित है, उसकी तुलना सीधे तौर पर "राम की शक्ति पूजा (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)" की असीम ऊर्जा और संकल्प से की जा सकती है।

निराला जी की रचना में जहाँ भगवान राम सूर्य की उपासना कर शक्ति का आह्वान करते हैं— "होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन"— वहीं इस लोकगीत में समाज का सबसे वंचित वर्ग (निर्धन, कोढ़ी, नेत्रहीन) सूर्य देव से अपने कल्याण का आह्वान करता है। आइए, भारतीय संस्कृति के इस विश्वव्यापी गीत के बोल में डूब जाएँ।

▶️ यहाँ क्लिक करके सीधा वीडियो देखें और साथ में गाएं
उषा अर्घ्य देती महिला - उगह हे सूरज देव गीत का दृश्य
प्रातःकाल (भिनसरवा) में जल में खड़े होकर सूर्य देव के उदित होने की प्रतीक्षा करते श्रद्धालु।

🎶 उगह हो सूरज देव (मूल मैथिली-भोजपुरी लिरिक्स)

उगह हे सूरज देव भेल भिनसरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।
बड़की पुकारे देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।।

बाझिन पुकारें देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।
अन्हरा पुकारे देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।।

आ.. आ.. आ..
निर्धन पुकारे देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।
कोढ़िया पुकारे देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।।

लंगड़ा पुकारे देव दुनु कर जोरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।
उगह हे सूरज देव भेल भिनसरवा,
अरघ के रे बेरवा हो पूजन के रे बेरवा हो ।।

🎶 Ugaha Ho Suraj Dev (Hinglish Lyrics)

Uga He Suraj Dev Bhel Bhinsarva,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho |
Badki Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho ||

Baajhin Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho |
Anhara Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho ||

Aa.. Aa.. Aa..
Nirdhan Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho |
Kodhiya Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho ||

Langda Pukare Dev Dunu Kar Jorwa,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho |
Uga He Suraj Dev Bhel Bhinsarva,
Aragh Ke Re Berva Pujan Ke Re Berava Ho ||

🌸 उगह हो सूरज देव गीत का असली अर्थ और भावार्थ (Meaning & Analysis)

इस गीत की शुरुआत 'उगह हे सूरज देव भेल भिनसरवा' से होती है। यह गीत छठ पर्व की पूर्ण सामाजिक समानता (Social Equality) का सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण है। घाट पर खड़ा समाज का हर वंचित और दुखी वर्ग भगवान से एक समान भाव से प्रार्थना कर रहा है:

  • परिवार का नेतृत्व (बड़की): सबसे पहले घर की 'बड़की' (बड़ी बहू या बड़ी बहन) दोनों हाथ जोड़कर (दुनु कर जोरवा) सूर्य देव को पुकारती है, क्योंकि अर्घ्य और पूजन की वेला (बेरवा) हो चुकी है।
  • मातृत्व की करुण पुकार: इसके बाद, 'बाझिन' (निस्संतान महिला) भी दोनों हाथ जोड़कर सूर्य देव को पुकारती है, ताकि उसकी गोद भर सके और समाज के तानों से उसे मुक्ति मिले।
  • शारीरिक पीड़ा से मुक्ति: इसके बाद, 'अन्हरा' (नेत्रहीन व्यक्ति) सूर्य देव से दृष्टि की आस में प्रार्थना करता है।
  • वंचितों की पुकार (निर्धन, कोढ़िया, लंगड़ा): इसके अलावा निर्धन (गरीब), कोढ़िया (कुष्ठ रोगी) और लंगड़ा व्यक्ति भी अपने-अपने दुखों के निवारण के लिए सूर्य देव से प्रार्थना करते हैं।
✨ भाषाई और साहित्यिक सौन्दर्य (Linguistic Nuance):
इस गीत में "भिनसरवा" (Bhinsarva) शब्द का प्रयोग हुआ है, जो मुख्य रूप से भोजपुरी और बज्जिका (Bhojpuri/Bajjika) बोलियों का प्रभाव है। जबकि शुद्ध मैथिली में इसे "भिनसर" (Bhinsar) कहा जाता है। यह भाषाई मिश्रण इस बात का प्रमाण है कि छठ पूजा अवधी, भोजपुरी और मैथिली की भाषाई सीमाओं को तोड़कर एक साझी सांस्कृतिक भावना (Shared Cultural Emotion) का निर्माण करती है।
संध्या बेला में अर्घ्य देती महिला - उगह हे सूरज देव
घाट पर दीप जलाकर अपने दुखों को हरने के लिए सूर्य देव की आराधना करते हुए।

▶️ अनुराधा पौडवाल जी का यह रूहानी वीडियो देखें

❓ गीत से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र 1: "भेल भिनसरवा" (Bhel Bhinsarva) का क्या अर्थ है?

भेल भिनसरवा का अर्थ है 'सुबह (भोर) हो चुकी है'। यह मैथिली, बज्जिका और भोजपुरी भाषा का एक बहुत ही मीठा शब्द है। इस गीत में व्रती सूर्य देव से कहती हैं कि हे प्रभु, सुबह हो चुकी है, अब आप कृपया उदित होइए क्योंकि अर्घ्य का समय हो गया है।

प्र 2: इस गीत में 'कोढ़िया' और 'लंगड़ा' का उल्लेख क्यों है?

प्राचीन काल से ही वेदों में सूर्य देव को 'आरोग्य' (Health) का देवता माना गया है। गीत में यह बताया गया है कि सूर्य की उपासना से असाध्य रोग (जैसे कुष्ठ रोग) और शारीरिक अक्षमता भी ठीक हो सकती है। यह इस बात का प्रमाण है कि भगवान के दरबार में समाज का सबसे उपेक्षित वर्ग भी सीधा संवाद कर सकता है।

प्र 3: "दुनु कर जोरवा" (Dunu Kar Jorwa) का क्या तात्पर्य है?

'दुनु' का अर्थ है 'दोनों' और 'कर' का अर्थ है 'हाथ'। इसका मतलब है कि सभी भक्त अपने दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण समर्पण और परम श्रद्धा के साथ भगवान भास्कर को पुकार रहे हैं।

🙏 सूर्य देव आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें!

अनुराधा पौडवाल जी द्वारा गाया गया यह गीत भारतीय लोक-साहित्य और अतुल्य भारत की धरोहर है। प्रसार भारती और IGNCA के संरक्षण से आज हमारी मौखिक लोक-परंपराओं को पूरे विश्व में सम्मान मिल रहा है। भारत सरकार इन सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

📲 इस भावुक और सामाजिक समरसता वाले गीत को अभी WhatsApp पर शेयर करें!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ: पारंपरिक मैथिली विवाह गीत (Lyrics & Meaning) | Mithila Vivah Geet

मिथिला की संस्कृति, यहाँ के लोकगीत और यहाँ की मिठास पूरी दुनिया में अद्वितीय है। विवाह संस्कार में जब नई नवेली दुल्हन (दुलहिन) ससुराल की गलियों में कदम रखती है, तो यह गीत 'दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ' (Dulhin Dhire Dhire Chaliyau) एक मीठी हिदायत और स्वागत के रूप में गाया जाता है। 'दुल्हा धीरे-धीरे चल्यो' जैसे गीत इन्ही पारंपरिक रस्मों की शोभा बढ़ाते हैं। जिस प्रकार महाकवि विद्यापति ने मैथिली साहित्य को ऊंचाइयों पर पहुँचाया, उसी प्रकार हमारे पारंपरिक विवाह गीतों ने हमारी संस्कृति को जीवित रखा है। नीचे इस प्रसिद्ध गीत के लिरिक्स, हिंग्लिश अनुवाद और पीडीएफ डाउनलोड लिंक दिए गए हैं। Maithili Lyrics: Dulhin Dhire Dhire Chaliyau दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ ससुर गलिया, दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ ससुर गलिया। ससुर गलिया हो, भैंसूर गलिया, दुलहिन सासु सँ बोलियौ मधुर बोलिया। दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ ससुर गलिया। मधुर बोलिया हो, अनार कलिया, मधुर बोलिया हो, अनार कलिया। दुलहिन ननदि के दियौ हजार डलिया, दुलहिन धीरे-धीरे चलियौ ससुर गलिया। हजार डलिया हो, गुलाब कलिया, हजार डलिया हो, गुल...

बादल को घिरते देखा है: व्याख्या और भावार्थ (Class 11) | नागार्जुन

बादल को घिरते देखा है: व्याख्या और भावार्थ (Class 11) परिचय: हिंदी साहित्य के प्रगतिवादी कवि बाबा नागार्जुन की यह कविता ' बादल को घिरते देखा है ' प्रकृति प्रेम और यथार्थवाद का बेजोड़ उदाहरण है। यह उनके काव्य संग्रह ' युगधारा ' से ली गई है और Class 11 Hindi (Antara) पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 📥 Click Here to Download PDF Notes (Notes अंत में दिए गए हैं) 📌 परीक्षा उपयोगी: सप्रसंग व्याख्या का प्रारूप संदर्भ (Reference): प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा भाग-1' (Class 11) की कविता 'बादल को घिरते देखा है' से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रगतिवादी कवि नागार्जुन हैं। प्रसंग (Context): इन पंक्तियों में कवि ने हिमालय के सौंदर्य और बादलों के घिरने का यथार्थवादी चित्रण किया है। विशेष (Key Points): 1. भाषा सरल और तत्सम प्रधान है। 2. प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। नीचे हम पूरी कविता का Stanza-wise Meaning (पद-व्याख्या) और शब्दार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। 1. हिमालय और मा...

नागार्जुन की मैथिली कविता 'विलाप' (अर्थ सहित) | Vilap by Nagarjun

नागार्जुन की प्रसिद्ध मैथिली कविता: विलाप विलाप - Vilap बाबा नागार्जुन: मैथिली के 'यात्री' बाबा नागार्जुन (मूल नाम: वैद्यनाथ मिश्र) को हिंदी साहित्य में उनके प्रगतिशील और जनवादी लेखन के लिए जाना जाता है। 'सिंदूर तिलकित भाल' जैसी उनकी हिंदी कविताएँ जितनी प्रसिद्ध हैं, उतना ही गहरा उनका मैथिली साहित्य में 'यात्री' उपनाम से दिया गया योगदान है। मैथिली उनकी मातृभाषा थी और उनकी मैथिली कविताओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत चित्रण मिलता है। 'विलाप' कविता का परिचय नागार्जुन की 'विलाप' (Vilap) मैथिली साहित्य की एक अत्यंत मार्मिक और प्रसिद्ध कविता है। यह कविता, उनकी अन्य मैथिली कविताओं की तरह ही, सामाजिक यथार्थ पर गहरी चोट करती है। 'विलाप' का मुख्य विषय समाज की सबसे दर्दनाक कुरीतियों में से एक— बाल विवाह (Child Marriage) —और उसके फलस्वरूप मिलने वाले वैधव्य (Widowhood) की पीड़ा है। यह कविता एक ऐसी ही बाल विधवा की मनोदशा का सजीव चित्रण करती है। नान्हिटा छलौँ, दूध पिबैत रही राजा-रानीक कथा सुनैत रही घर-आँग...