अतत्तह भऽ गेल… (Atattah Bha Gel) - विवेकानन्द ठाकुर की मार्मिक मैथिली कविता और उसका गहरा अर्थ
क्या अपनी मातृभाषा पर गर्व करना और उसके लिए आवाज़ उठाना भयंकर अपराध है? जब आपकी अपनी मीठी बोली दूसरों के कानों में एक खटकती हुई अनजानी आवाज़ लगने लगे, तो वह पीड़ा शब्दों में कैसे बहती है?
मैथिली साहित्य केवल शृंगार और प्रेम तक सीमित नहीं है, यह अपने वजूद और भाषाई अस्मिता की एक सुलगती हुई आग भी है। प्रतिष्ठित कवि विवेकानन्द ठाकुर जी द्वारा रचित कविता "अतत्तह भऽ गेल…" (Atattah Bha Gel) एक ऐसी ही साहित्यिक हुंकार है। यह उन लोगों पर एक तीखा प्रहार है जो एक समृद्ध भाषा को दरकिनार कर, उसे बोलने वालों को "गूँगा" या बेवकूफ़ (बौक) समझते हैं।
जैसे प्रेमक नाजुक बंधन को समझना हर किसी के बस की बात नहीं होती, वैसे ही मातृभाषा की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने अपनी माटी से सच्चा प्रेम किया हो। आइए, 2011 में प्रकाशित पुस्तक 'चानन घन गछिया' से ली गई इस अद्भुत रचना को पढ़ें।
मूल मैथिली कविता: अतत्तह भऽ गेल…
जकरा मुँहमे बकार
तकरा बुझै छी बौक
अहाँ केहन छी
अकिल-खौक
नहि बूझल हो
तँ बुझि लियऽ
जे बौक अछि
सेहो बौक नहि अछि
पुछियौ ओकर मायसँ
अपन बेटाक मुँहसँ
प्रत्येक ध्वनि
ओकरा लेल सार्थक शब्द
सभक अर्थ
फरिछा देत
नीक जकाँ
जे बौक
सेहो जखन नहि बौक
तँ हम कोना बौक?
अतत्तह भऽ गेल…
ई बात अलबत्त
हमर माय
जे हमरा शब्द देलनि
से अछि सुघर
ओ जे हमरा भाषा देलनि
से अछि मधुर
तेँ अहाँ लेल बाँय-बाँय
अहाँ बाजि उठब आँय-आँय
माने फेरसँ कहू…
कतेक कहू?
कै बेर कहू?
गामसँ संसद धरि कहलहुँ
आब आओर
कतऽ-कतऽ कहू?
कोना-कोना कहू?
मुदा, हम कहब
फेर कहब
कहैत रहब
हमर शब्द बेर-बेर हैत सुघर
हमर भाषा बेर-बेर हैत मधुर
अहाँ प्रायः एकरा बेर-बेर बूझब
बाँय-बाँय
अहाँ प्रायः बेर-बेर बाजि उठब
आँय-आँय
की आँय-आँय केर उत्तर छै
ठाँय-ठाँय?
की यैह टा भाषा बुझैत छी अहाँ?
अतत्तह भऽ गेल…
रचनाकार : विवेकानन्द ठाकुर
पुस्तक : चानन घन गछिया (पृष्ठ 155), संस्करण 2011
कविता का दिल चीर देने वाला भावार्थ (Poem Meaning)
मातृभाषा का घोर अपमान और सत्ता का अंधापन
कवि शुरुआत में ही एक चुभता हुआ व्यंग्य करते हैं कि जिसके मुँह में अपनी स्पष्ट आवाज़ (बकार) है, दुनिया उसे ही गूँगा (बौक) समझती है। यह उन लोगों की ओर इशारा है जो सत्ता या बहुसंख्यक होने के अहंकार में मैथिली भाषा की समृद्ध विरासत को पूरी तरह से कुचलना चाहते हैं।
कवि समझाते हैं कि एक गूँगा बच्चा भी असल में गूँगा नहीं होता। उसकी माँ के लिए उसके मुँह से निकली हर ध्वनि एक 'सार्थक शब्द' होती है। यदि एक माँ अपने गूँगे बच्चे को समझ सकती है, तो हमारी तो अपनी एक इतनी सुघड़ और मधुर भाषा है! हम कैसे गूँगे हो गए? मैथिली की इस मिठास को यदि आप महसूस करना चाहते हैं, तो कनी हँसि केँ कहू जैसे गीतों में उस माधुर्य को अनुभव कर सकते हैं।
गाँव से संसद तक का ख़ूनी संघर्ष
"गामसँ संसद धरि कहलहुँ" — यह मात्र एक पंक्ति नहीं, बल्कि भाषा आंदोलन का एक विशाल इतिहास है। गाँव में गोबर-गोइठा पथने वाली गोइठ बिछनी महिलाओं से लेकर दिल्ली की संसद तक, हर जगह मैथिलियों ने अपनी पहचान की गुहार लगाई है। मिथिले के लोगों ने अपने हक़ के लिए अपना पूरा जीवन खपा दिया। (दुखद बात यह है कि कई महान लेखकों को भी संघर्ष करना पड़ा, जैसे 82 वर्षीय मैथिली कवि जिन्हें अपनी किताब के लिए प्रकाशक तक नहीं मिला)।
जब मैथिल भाषी अपने मीठे शब्द बोलते हैं, तो व्यवस्था उसे 'बाँय-बाँय' (निरर्थक शोर) समझकर 'आँय-आँय' (अनदेखा करना/क्या कहा?) कर देती है। और अंत में कवि सबसे खौफ़नाक सवाल पूछता है— क्या हमारे बार-बार बोलने का अंतिम उत्तर 'ठाँय-ठाँय' (बंदूक की गोली/हिंसा/दमन) है? क्या सत्ता केवल खून और दमन की ही भाषा समझती है?
चाहे वह महाकवि विद्यापति की कालजयी रचना पिया मोर बालक हो या आधुनिक काल के विवेकानन्द ठाकुर की यह विद्रोही कविता, मैथिली साहित्य ने हमेशा समाज के यथार्थ को पन्नों पर आग की तरह उकेरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'अतत्तह भऽ गेल…' कविता के रचयिता कौन हैं?
इस मार्मिक मैथिली कविता के रचनाकार प्रतिष्ठित कवि विवेकानन्द ठाकुर जी हैं, जिन्होंने मातृभाषा के हक़ के लिए अपनी कलम उठाई।
2. कविता में "ठाँय-ठाँय" शब्द का क्या खौफनाक तात्पर्य है?
"ठाँय-ठाँय" का सीधा अर्थ यहाँ हिंसा, पुलिसिया दमन और सत्ता की क्रूरता से है। कवि सवाल कर रहा है कि क्या शांतिपूर्वक अपनी भाषा के अधिकारों की माँग करने का अंतिम उत्तर केवल गोलियों की गूँज है?
3. इस कविता का मुख्य विषय (Theme) क्या है?
कविता का मुख्य विषय मातृभाषा (मैथिली) के प्रति अटूट प्रेम, भाषाई पहचान का खूनी संघर्ष, और सत्ता द्वारा भाषाई अल्पसंख्यकों की आवाज़ को बेरहमी से कुचल देने की पीड़ा है।
निष्कर्ष (Conclusion)
"अतत्तह भऽ गेल…" केवल एक कविता नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों का घोषणापत्र है जो अपनी भाषा को विलुप्त होने से बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। विवेकानन्द ठाकुर जी ने जिस सरलता और तीखेपन से गाँव की चौपाल से लेकर संसद भवन तक के बहरेपन पर प्रहार किया है, वह सचमुच रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
मातृभाषा हमारी पहचान का सबसे अहम हिस्सा है; इसे खोना अपना वजूद खोने के बराबर है। आपको यह विद्रोही कविता और इसका भावार्थ कैसा लगा? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं और मैथिली साहित्य की इस अमूल्य धरोहर को शेयर करें। अधिक बेहतरीन मैथिली कविताओं और गीतों के अर्थ के लिए Maithili Poems - SahityaShala से जुड़े रहें।
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