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मुन्ना कक्का सासुर चलला: मैथिली हास्य-व्यंग्यक ई कविता पढ़ि कऽ अहाँक हँसी नहि रुकैत!

मुन्ना कक्का सासुर चलला (Munna Kakka Sasur Challa) - कालीकान्त झा ‘बूच’ रचित मैथिली हास्य-व्यंग्य कविता आ अर्थ
'मुन्ना कक्का सासुर चलला' - मैथिली साहित्यक एकटा बेजोड़ हास्य-व्यंग्य कविता

सासुर जेबाक एहन खौक, जे पोखरि मे खसा देलक!

मैथिल समाज मे "पाहुन" (दामाद) बनबाक जे आनन्द अछि, तकर वर्णन शब्द मे करब कठिन अछि। मुदा जखन सासुर जेबाक उत्सुकता पागलपनक स्तर पर पहुँचि जाय, तखन की होइत अछि? प्रसिद्ध कवि कालीकान्त झा ‘बूच’ जी अपन मैथिली कविता 'मुन्ना कक्का सासुर चलला' मे हास्य (Comedy) आ व्यंग्य (Satire) केर जे तड़का लगेने छथि, ओ पढ़ि कऽ अहाँ पेट पकड़ि कऽ हँसब।

जहिना गम्भीर भाव मे मातृ गीत (Matri Geet) माए केर असीम महिमा गबैत अछि, ठीक ओकर विपरीत ई कविता हास्य रसक चरम पर अछि। दुःखक अन्हार जनि (Aanhar Janni) केँ चीरैत, ई कविता अहाँक ठोर पर मुस्कान लाबि दैत अछि, जेना कोनो अपना 'कनी हँसि केँ कहु' गबैत हो। आउ पढ़ी, मुन्ना कक्काक सासुर जेबाक महा-अभियान!

मुन्ना कक्का सासुर चलला - सम्पूर्ण मैथिली कविता (मूल पाठ)

कच्छी कऽसि-कऽसि तहिपर धोती रऽचि रऽचि कऽ।
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

सबसँ पहिने पोखरि धँसला,
चढिते काठ उनटि कऽ खसला।
मललनि माथ माँटि करिऔटी,
ऊपर अयला झारि लंगोटी।
अधमोनी झामा सँ गत्तर-गत्तर मलि-मलि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

एते किएक बेकल हौ मुँन्ना,
तोरे एकटा सासुर की?
जतरा करऽ दिन देखबा कऽ,
बाबा जी कहि देलनि ई।
अधपहरा जखने हेतै, दू मिनट हेतै दस बजि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

ताबरतोर चलल जा रहला,
जेठक तेज विहाडि जकाँ।
रैन कतहु ने, पडे बाट मे,
साँझ लगए मुँनहारि जकाँ।
हुलसल डेग बढाबथि आगाँ हुमचि-हुमचि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

झाँपल मुँहें सासु कहलथिन,
झा हमरा बड मानै छथि।
जखन-तखन हमरो खातिर,
गरमे रसगुल्ला आनै छथि।
अझुका सबटा गुलगुल्ला थिक झा बजला हँसि-हँसि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

स्रोत विवरण: पुस्तक: कलानिधि (पृष्ठ 133) | प्रकाशन: श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली (संस्करण: 2010) | रचनाकार: कालीकान्त झा ‘बूच’

कविताक पंक्तिबद्ध अर्थ आ ठेठ मैथिली शब्दावलीक विश्लेषण

१. पोखरि मे फजीहत आ स्नानक तैयारी

पंक्ति: "कच्छी कऽसि-कऽसि... अधमोनी झामा सँ गत्तर-गत्तर मलि-मलि कऽ"

जहिना छठि घाट पर अरघ के बेर (Aragh Ke Ber) लोग सजि-धजि कऽ जाइत अछि, तहिना मुन्ना कक्का धोती-कुर्ता पहिरि कऽ सासुर लेल तैयार भेलाह। मुदा हड़बड़ी मे पोखरि किनारे काठ (लकरी) पर पैर रखिते ओ घसकि कऽ पानि मे खसि पड़लाह! ठेठ मैथिली शब्द 'करिऔटी' (कादो/कारी माटि) आ 'अधमोनी झामा' (पाको इँटाक टुकड़ा जाहि सँ देह मलल जाइत अछि) केर प्रयोग ग्रामीण हास्य केँ जीवंत कऽ दैत अछि। सासुरक भूत एहन जे माटि लागल देह केँ झामा सँ मलि-मलि कऽ साफ कएल जा रहल अछि!

२. बाबाकें व्यंग्य आ जतराक महत्ता

पंक्ति: "एते किएक बेकल हौ मुँन्ना, तोरे एकटा सासुर की?"

कक्काकें हड़बड़ी देखि कऽ गामक कोनो 'बाबा' (बुजुर्ग) व्यंग्य करैत छथिन— "कि हौ मुन्ना, एतेक बेकल (बेचैन) किएक छह? की दुनिया मे मात्र तोहरे एकटा सासुर छौ?" बाबा हुनका टोकैत कहैत छथिन जे जतरा (शुभ मुहूर्त) देखि कऽ प्रस्थान करह। जखन दस बाजि कऽ दू मिनट हेतय (शुभ बेरा), तखने जेबाक अछि। अंततः, जहिना प्रतीक्षाक बाद अतत्त: भऽ गेल (Atattah Bha Gel), मुन्ना कक्का शुभ मुहूर्त मे बिदा भेल छथि।

३. जेठक आन्ही (विहाडि) जकाँ चालि

पंक्ति: "ताबरतोर चलल जा रहला, जेठक तेज विहाडि जकाँ।"

एतय उपमा अलंकारक सुंदर प्रयोग अछि। मुन्ना कक्का एतेक तेज चलि रहल छथि जेना जेठ मासक 'विहाडि' (गरम आन्ही/लू) चलि रहल होय। बाट मे कतहु रुकैत नहि छथि। हुनका लागैत छन्हि जे उगह हो सूरज देव सँ पहिनहिये पहुँचि जाइ। हुलसल (उत्साहित) डेग (कदम) बढ़बैत ओ हुमचि-हुमचि (पूरा जोर लगा कऽ) सासुर दिस जा रहल छथि।

४. सासु मायक भ्रम आ कक्काकें हँसी (रसगुल्ला vs गुलगुल्ला)

पंक्ति: "अझुका सबटा गुलगुल्ला थिक झा बजला हँसि-हँसि कऽ"

ई कविताक क्लाइमेक्स अछि। सासुर पहुँचला पर सासु माय मुँह झाँपि कऽ (मैथिल परम्परा मे लाज सँ) गप्प मारैत छथि जे "दामाद हमरा बड्ड मानै छथि, हमरा लेल गरमा गरम रसगुल्ला आनै छथि।" मुदा वास्तविकता की छल? दामाद मुन्ना कक्का हँसैत कहलनि जे ई रसगुल्ला नहि, बाट मे कीनल "गुलगुल्ला" (सस्ता मिठाई/पकौड़ी) थिक! सासु मायक गप मारबाक आदत आ दामादक सीधापन सँ भेल ई 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' हँसी सँ लोट-पोट कऽ दैत अछि।

🤣 मुख्य सार (Why this poem is a Masterpiece)

कालीकान्त झा ‘बूच’ जी ग्रामीण मैथिल जीवनक छोट-छोट घटना केँ जे सूक्ष्मता आ व्यंग्यात्मक (Satirical) रूपें चित्रित कएल अछि, ओ अद्वितीय अछि। ई कविता देखाबैत अछि जे सासुरक नाम सँ पुरुष वर्गक मनोविज्ञान कोना काज करैत अछि। एहन बेजोड़ रचना सभ साहित्यशालाक अमूल्य निधि अछि।

अक्सर पुछल जाए वला प्रश्न (FAQs)

१. मुन्ना कक्का सासुर जेबाक लेल स्नान करबा काल की भेल?

मुन्ना कक्का हड़बड़ी मे पोखरि किनारे काठ (लकरी) पर गोड़ रखलनि जे रपटि गेल आ ओ पानि मे खसि पड़लाह। कप्पाक देह मे माटि (करिऔटी) लागि गेल, जकरा साफ करबा लेल हुनका झामा (पाको इँटाक टुकड़ा) सँ देह मलय पड़लनि।

२. कविता मे 'जेठक तेज विहाडि' केर प्रयोग किएक भेल अछि?

कवि ई उपमा (Simile) मुन्ना कक्काक सासुर जेबाक अत्यधिक तेज गतिकें दर्शाबय लेल कएल अछि। जहिना जेठ मास (ग्रीष्म ऋतु) मे भयानक आन्ही (विहाडि) चलैत अछि, तहिना कक्का बिना रुकलें, बेग सँ सासुर दिस दौगि रहल छथि।

३. सासु मायक रसगुल्लाक भ्रम कोना टूटल?

सासु माय अपन सखी-बहिनपा लग गप मारि रहल छलीह जे दामाद हुनका लेल गरमा-गरम 'रसगुल्ला' अनलनि अछि। मुदा मुन्ना कक्का हँसैत पोल खोलि देलनि जे ओ महँग रसगुल्ला नहि, बल्कि सस्ता 'गुलगुल्ला' (मैदा/आटाक मीठ पकौड़ी) थिक!

की अहाँक गाम-घर मे सेहो एहन हास्यपूर्ण घटना भेल अछि? अपन अनुभव हमरा सभकें नीचाँ कमेंट मे अवश्य बताउ! अहाँ ई मजेदार लेख English, Finance, आ Sports नेटवर्कक संगे साहित्यशालाक अन्यान्य पन्ना पर सेहो शेयर कऽ सकैत छी।

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