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कन्यादान (Kanyadan): कालीकान्त झा ‘बूच’ रचित मैथिली विदाई गीत जे अहाँक आँखि नम कऽ देत

कन्यादान (Kanyadan) - कालीकान्त झा ‘बूच’ रचित मैथिली विदाई आ बेटी विवाह कविता
'कन्यादान' - बेटीक विदाई पर पिताक हृदयक मार्मिक गान

बेटीक विदाईक ओ क्षण: जखन कठोर पिताक नोर सेहो नहि रुकैत अछि!

विवाह जीवनक सभसँ पैघ खुशीक अवसर थिक, मुदा 'विदाई' ओ पल थिक जखन सम्पूर्ण घरक हृदय फाटि जाइत अछि। मैथिली साहित्य मे बेटीकें घरक इजोरिया मानल गेल अछि। जखन ई इजोरिया अपन घर छोड़ि पराया घर जाइत अछि, तँ आँगन मे एकटा एहन अन्हार जनि (Aanhar Janni) पसारि जाइत अछि जकरा कोनो दीया नहि मेटा सकैत अछि।

जहिना हमसभ मुन्ना कक्का सासुर चलला पढ़ि कऽ सासुरक नाम पर हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ जाइत छी, ठीक ओकरे विपरीत, ख्यातिप्राप्त कवि कालीकान्त झा ‘बूच’ जीक ई मार्मिक रचना 'कन्यादान' अहाँक आँखि मे नोर आनि देत। जहिना माता-पिता छठि घाटे अरघ के बेर सन्तानक सुख लेल कातर भऽ जाइत छथि, तहिना ई कविता पिताक ओहि कातर भावकें शब्द दैत अछि जतय ओ अपन 'गौरी' सन बेटीकें 'शंकर' सन दामादक हाथ मे सौंपि रहल छथि।

कन्यादान - सम्पूर्ण मैथिली कविता (मूल पाठ)

आब बनवह विरान हय बेटी,
चूबि जयतह ई नोर,
डूबि जयतह ई ठोर,
त्यागि थीर मुसकान हय बेटी।

बेटे जकाँ तोँ जनमलह आ बढ़लह,
बेटो सँ बढिकऽ माईक मन भरलह,
काका आ काकी लगक दुलरैतिन तोँ,
अपना स्वभावे सभक मन हरलह,
बाबाक ध्यान तोँ बाबीक जान तोँ,
बापक परान हय बेटी।

तोरा जनमिते परायल अन्हरिया,
पाँजे समटलहुँ हम पसरल इजोरिया,
घऽरक कुमुदिनियाँ हम परक चननियाँ तो
ई कहऽ आयल कहौतियाक भरिया,
आई धरिक पूनम तोँ काल्हिए सँ बनि जयवह,
दुतियाक चान हय बेटी।

लैह अशीरवाद करह अचले श्रृंगार तोँ,
बनल रहह हुनक मुँग्धमनक शुद्ध हार तोँ
आशुतोष, मृत्युंजय शंकरे जमाइ हमर,
जानि गेलहुँ पुत्री नहिं गौरी अवतार तोँ,
हम कऽ देलहुँ दान,
आइ भऽ रहलै ज्ञान,
अहाँ बनि गेलहुँ हय बेटी।

स्रोत विवरण: पुस्तक: कलानिधि (पृष्ठ 89) | प्रकाशन: श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली (संस्करण: 2010) | रचनाकार: कालीकान्त झा ‘बूच’

कविताक पंक्तिबद्ध अर्थ आ मार्मिक विश्लेषण

१. घरक सूनापन आ आँसुओंक धारा

पंक्ति: "आब बनवह विरान हय बेटी, चूबि जयतह ई नोर"

कवि कहैत छथि जे हे बेटी, अहाँक जेबाक बाद ई घर बिलकुल विरान (सूना) भऽ जएत। जखन विदाईक बेरा अबैत अछि, तँ सभक आँखि सँ नोर (आँसू) खसि पड़ैत अछि आ घरक ओ 'कनी हँसि केँ कहु' वाली स्थिर मुसकान सदिखन लेल छिन जाइत अछि। ई पंक्ति सीधे पाठकक मोन पर चोट करैत अछि।

२. बेटा सँ बेसी दुलार आ बापक परान

पंक्ति: "बेटो सँ बढिकऽ माईक मन भरलह... बापक परान हय बेटी।"

मैथिल समाज मे प्रायः बेटाक मोह बेसी देखाओल जाइत अछि, मुदा कवि एतय स्पष्ट करैत छथि जे ई बेटी बेटा सँ बेसी माए-बापक सेवा कएलक। जेना मातृ गीत (Matri Geet) मे माए केर ममता अपरम्पार अछि, तहिना एतय बेटी अपन स्वभाव सँ काका, काकी, बाबा आ बाबी सभक मोन जीत लेलक अछि। ओ अपन बापक साक्षात् 'परान' (प्राण) थिक।

३. इजोरियाक आगमन आ 'दुतियाक चान' बनि जेबाक दुःख

पंक्ति: "तोरा जनमिते परायल अन्हरिया... दुतियाक चान हय बेटी।"

बाप याद करैत छथि जे जखन बेटीक जन्म भेल छल, तँ घरक सभटा अन्हार दूर भऽ गेल छल। आइ धरि ओ बेटी घरक लेल पूर्णिमाक चाँद (पूनम) छलीह। मुदा काल्हि विदाईक बाद, ओ अपन माय-बाप लेल 'दुतियाक चान' (द्वितीयाक चन्द्रमा) बनि जएतीह, जकर दर्शन मात्र कखनो काल हेतय। बेटी पराए घरक चान बनि जएत, एकर बोध भेला पर हृदय भारी भऽ जाइत अछि जेना लम्बा संघर्षक बाद 'अतत्त: भऽ गेल' स्वीकार करय पड़ैत हो।

४. साक्षात् गौरी-शंकरक रूप

पंक्ति: "आशुतोष, मृत्युंजय शंकरे जमाइ हमर, जानि गेलहुँ पुत्री नहिं गौरी अवतार तोँ"

अंतिम पंक्ति मे विदाईक दुखकें आध्यात्मिकता सँ जोड़ल गेल अछि। पिता अपन दामाद केँ शिव (आशुतोष, शंकर) मानैत छथि आ बेटीकें साक्षात् माता गौरीक अवतार। जखन कन्यादानक समय अबैत अछि, तखन पिताकें बोध होइत अछि जे ई बेटी मात्र हुनक नहि, बल्कि साक्षात् भगवती अछि जे आब अपन असली घर (पति-गृह) जा रहल अछि। ई सत्य स्वीकारि कऽ जखन ओ आशीर्वाद दैत छथि, तँ भोरक किरण जकाँ उगह हो सूरज देव सन एकटा नव जीवनक शुरुआत होइत अछि।

🌸 मुख्य सार (Emotional Takeaway)

ई कविता मात्र शब्दक जाल नहि अछि, ई प्रत्येक पिताक हृदयक धड़कन अछि। बेटीक जन्म सँ लऽ कऽ ओकरा 'गौरी' मानि कऽ 'शंकर' केर हाथ मे सौंपबाक ई आध्यात्मिक आ भावनात्मक यात्रा, साहित्यशालाक सभसँ अनमोल रचना सभ मे सँ एक अछि।

अक्सर पुछल जाए वला प्रश्न (FAQs)

१. 'कन्यादान' कविताक रचनाकार के छथि आ ई कतय सँ लेल गेल अछि?

'कन्यादान' कविताक रचना प्रसिद्ध मैथिली कवि श्री कालीकान्त झा ‘बूच’ जी द्वारा कएल गेल अछि। ई मार्मिक कविता हुनक काव्य संग्रह 'कलानिधि' (प्रकाशन वर्ष: २०१०, पृष्ठ ८९) सँ लेल गेल अछि।

२. कवि बेटीकें 'दुतियाक चान' किएक कहैत छथि?

विवाह सँ पहिने बेटी अपन माय-बापक घरक लेल 'पूनम' (पूर्णिमाक पूर्ण चन्द्रमा) समान होइत अछि, मुदा विदाईक बाद ओ सासुर चलि जाइत अछि। तखन माय-बापक लेल ओ 'दुतियाक चान' (द्वितीयाक चाँद) बनि जाइत अछि, जकरा दर्शन कखनो-कखनो (दुर्लभ) होइत अछि।

३. अंतिम पंक्ति मे दामाद आ बेटीक तुलना ककरा सँ कएल गेल अछि?

कवि दामादक तुलना भगवान शिव (आशुतोष, मृत्युंजय, शंकर) सँ आ बेटीक तुलना माता गौरी (पार्वती) सँ कएने छथि। ई कन्यादानकें एकटा पवित्र आ दैवीय कृत्यक रूप मे स्थापित करैत अछि।

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